आखिर पीएम मोदी और जिनपिंग की मुलाक़ात के लिए महाबलीपुरम को ही क्यों चुना गया?

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के दौरे पर आ रहे हैं. शी जिनपिंग अपने दो दिवसीय भारत यात्रा पर शुक्रवार को महाबलीपुरम पहुंच रहे हैं. इस दौरान राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरी अनौपचारिक मीटिंग होगी. अब दोनों देश प्रमुखों के बीच क्या बातचीत होगी इस बारे में हम आपको आगे बतायेंगे लेकिन इससे पहले सवाल तो यही है कि आखिरकर प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की मुलाक़ात के लिए महाबलीपुरम को ही क्यों चुना गया… जैसा कि हमने देखा है कि जब भी कोई विश्व का बड़ा नेता और राष्ट्रप्रमुख आता है देश के बड़े शहरों दिल्ली, मुंबई, आगरा जैसी जगहों पर मीटिंग होती है.. बैठक होती है लेकिन इस बार दक्षिण के शहर चेन्नई के नजदीक महाबलीपुरम में आख़िरकार इस मीटिंग को क्यों आयोजित की जा रही है. दरअसल कुछ लोगों ने ऐसी धारणा बना दी है कि दक्षिण को भारत से अलग रखा जाता है या दक्षिण खुद को भारत से अलग थलग मानता था… लेकिन अब प्रधानमंत्री मोदी का फोकस तमिलनाडु की तरह बढ़ता जा रहा है. प्रधानमंत्री मोदी अपने हिंदी भाषण में भी तमिल का जिक्र करना नही भूलते हैं. तमिल कवियों, तमिल भाषा के प्रति भी प्रधानमंत्री मोदी फोकस कर रहे हैं..दरअसल तमिल और हिंदी को लेकर एक कोल्ड वार हमें देखने को मिलता है. ऐसे में इस बैठक का आयोजन कर प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से साफ़ सदेंश है कि वे पूरे भारत को महत्व देते हैं.. तमिलनाडू भी इससे अछूता नही है. इस बैठक के आयोजन के बद तमिल लोगों में प्रधानमंत्री मोदी के प्रति भरोसा जागेगा एक विश्वास बनेगा. वहीँ जब शी जिनपिंग के स्वागत के लिए प्रधानमंत्री मोदी तमिलनाडु पहुंचे तो उन्होंने चीनी, अंग्रेजी के साथ साथ तमिल में भी ट्वीट कर जानकारी दी..ऐसे में जब प्रधानमंत्री मोदी दक्षिण की तरफ फोकस कर रहे हैं तो ये एक अच्छा कदम माना जा रहा है.  

 ऐसा नही है महाबलिपूरम को सिर्फ इसी लिए चुना गया है बल्कि इस शहर का चीन से 1700 साल पुराना इतिहास रहा है. आखिर महाबलीपुरम में पीएम मोदी चीनी राष्ट्रपति को क्या दिखाना चाहते हैं और ये मुलाकात दोनों देशों के लिए कितनी अहम रहने वाली है? आइये जानते हैं.

महाबलीपुरम तमिलनाडु के प्राचीन शहरों में से एक है. जो चेन्नई से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित है..जिसका चीन से पुराना नाता है.. पुराने जमाने में महाबलीपुरम के चीन से व्यापारिक संबंध थे. उन्हीं संबंधों की याद दिलाने के लिए माना जा रहा है कि इसीलिए दोनों नेताओं के बीच मुलाकात के लिए इस शहर को चुना गया है. महाबलीपुरम तमिलनाडु में बंगाल की खाड़ी के किनारे बसा हुआ शहर है. महाबलीपुरम को सातवीं सदी में पल्लव वंश के राजा नरसिंह देव बर्मन ने बसाया था. राजा नरसिंह देव बर्मन को उस इलाके में मामल्लपुरम भी कहा जाता है इसलिए महाबलीपुरम का एक और नाम मामल्लपुरम भी है. महाबलीपुरम को बंगाल की खाड़ी के किनारे बिजनेस हब की तरह विकसित किया गया था. यहां के बंदरगाह से चीन से सामान आयात और निर्यात किया जाता था. महाबलीपुरम का चीन के साथ सदियों तक व्यापारिक संबंध रहे. ये संबंध एक हजार साल पहले तक कायम थे. पल्लव राजा के तीसरे राजकुमार बोधिधर्म बौद्ध भिक्षु बन गए थे. वो चीन में एक आयकॉन थे. उन्होंने कांचीपुरम से महाबलीपुरम होते हुए चीन की यात्रा की थी. बोधिधर्म बौद्ध धर्म के 28वें पितृपुरुष बने. पूरे चीन में इनकी जबरदस्त लोकप्रियता रही थी. इसे देखते हुए टूरिज्म डिपार्टमेंट ने उस रूट को फिर से बनाने की बात कही है, जिसपर चलकर बोधिधर्म चीन पहुंचे थे. इतिहासिक चीजों की रिसर्च से ये बात पता चली है कि तमिलनाडु के महाबलीपुरम और चीन के बीच अच्छा खासा व्यापार चलता था. मामल्लपुरम यानी महाबलीपुरम 1984 से ही एक विश्व धरोहर स्थल है..

मिली जानकारी के अनुसार इस शिखरवार्ता में ना तो कोई एमओयू साइन किया जाएगा और न ही कोई साझा बयान जारी किया जाएगा. आतंकवाद, आतंकवादियों की ट्रेनिंग, आतंकवादी संगठनों को आर्थिक सहायता और आतंकी संगठनों पर भी चर्चा हो सकती है. इस मुलाक़ात के दौरान प्रधानमंत्री मोदी जिनपिंग को तीन प्राचीन धरोहनों को दिखाएंगे. अर्जन की तपस्या स्थली, पंच रथ और तटीय मंदिरों का दर्शन कराएंगे. वैसे शी जिनपिंग की यात्रा बेहद  महत्वपूर्ण इसलिए भी मानी जा रही है क्योंकि चीन कश्मीर पर भी बयान देता रहता है.. पाकिस्तान चीन के ही नाम पर इठलाता है.. ऐसे में इस बात पर सबकी निगाहें जरूर टिकी होंगी कि क्या प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच कश्मीर पर भी बात होगी या नही?
  कश्मीर पर की जाने वाले बयानबाजी से भारत ने कड़ा सन्देश देते हुए कहा था कि कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है.. ऐसे में कोई और अन्य देश हस्तक्षेप ना करें तो अच्छा रहेगा..