क्यों पारसी और यहूदी नहीं रोते ‘Intolerance’ का रोना

0
154

बीते कुछ सालों में intolerance नाम का शब्द बहुत popular हो चला है. आए दिन बॉलीवुड celebrity और नेता  अपने बयानों में इस शब्द का बड़ी आसानी से इस्तेमाल कर देते हैं. वो कहते हैं की भारत में रह रहा अल्प संख्यक समुदाय महफूज़ नहीं है वो डरे हुआ है, अगर सच में ऐसा है तो भारत में रह रहे किसी और अल्प संख्यक समुदाय ने कभी ये बात जाहिर क्यों नहीं की? हमारे देश में सालों से रह रहे पारसी, यहूदी, Bahai और Tibeti जिनकी कुल मिला कर आबादी 1% भी नहीं हैं, अज तक उन्होंने कभी बाकियों की तरह intolerance का राग क्यों नहीं अलापा?

पारसियों ने इस्लामिक आक्रमणकारियों से बचने के लिए भारत में शरण ली, तबके राजाओं ने उनका स्वागत किया, उनके धार्मिक स्थलों का निर्माण करवाया, और हमारी ही संस्कृति में समिलित हो गए. आपको शायद जान कार हैरानी हो कि देश की कुछ माहान हस्तियाँ जैसे डॉ होमी भाभा, जेम्शेद जी टाटा और दादाभाई नारोजी भी पारसी थे. इतना ही नहीं पारसियों ने हमारे देश को चीफ जस्टिस कपाडिया, कमांडर इन चीफ जैसे मानिक शाह, अटॉर्नी जनरल सोराबजी, एयरफोर्स चीफ फली मेजर जैसे दिगाज़ प्रदान किये हैं, ना जाने क्यों उन्हें ये देश बाकियों की तरह intolerant नहीं लगता? पूरी दुनिया में नरसंहार किये जा रहे यहूदियों का खुली बाहों से स्वागत करने वाला एक मात्र देश भारत है, चाहे तिबती हो या बहाई सबको इस देश में शरण मिली यहाँ के लोगों ने उनके भी धार्मिक स्थलों का निर्माण किया ताकि वोह इस देश में असहज ना महसूस करें. ये लोग अज भी उतने ही सुरक्षित हैं जितने पहले थे, तभी तो अपनी आबादी को multiply कार पा रहे हैं.

तो आखिर क्यों भारत पर वर्त्तमान में intolerance का आरोप लग रहा है आखिर  क्यों हमें इस के साकक्ष नहीं मिल रहे. गज़नी, खिलजी और Aurangzeb जैसे आक्रमणकारियो से सालो तक प्रताड़ना झेलने के बावजूद, भारत वर्ष में आने वाले शरणार्थियों का यहाँ की आवाम ने बिना हिचक स्वागत किया. तो फिर देश की 14% आबादी को ये देश intolerant कैसे लग सकता है, जिन्हें ये लगता है की ये देश intolerant होगया है, वो लोग शायद कभी इस देश के बाहर नहीं गए हैं.

भारत में अगर सच में यह दिक्कत होती तो हमारे देश कि Minority अपनी तादात को पिछले 70 सालो में 10% से 14% तक नहीं बढ़ा पाई होती. हमारे प्रिय पडोसी देश जहाँ के वाज़िरे आज़म को भारतीय मीडिया शांति का दूत बताती है वहां आज़ादी की बाद से रह रहे हिन्दुओं की संख्या 24% से घट कार 1% हो गयी है. बंगलादेश में भी हालत कुछ ऐसे ही हैं वह हिन्दू जन संख्या 30% से घाट कार 7% होगयी हैं, इन देशो में रह रहे क्रिस्चियन, सिख और पारसी तो जैसे गायब ही हो गये हैं.

पड़ोसी देशो में अप्ल संख्यकों के साथ हो रही ज्यादती पर दृष्टि डालने की जगह हमारे देश के popular journalist और कलाकार अपने देश की इज्ज़त को मिटटी में मिलाने में लगे हुए हैं.