एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराना कितना आसान और कितना मुश्किल?

लोकसभा चुनाव 2019 का शंखनाद हो चुका है..चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है..7 चरणों में 11 अप्रैल से लेकर 19 मई तक चुनाव होंगे. सभी 7 चरणों के रिजलट 23 मई को आएंगे। इन सबके बीच एक सवाल ऐसा है जो कितनी बार उठ चुका है। पूरे देश में हर पांच साल में एक ही बार में लोकसभा और तमाम विधानसभाओं के चुनाव करा लेने का विचार काफी समय से राजनीतिक गलियारे में है. इसलिए आईए जानते है कि क्यों लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ नहीं करा सकते है और क्यों करा सकते है, इन दोनों पक्षों पर चर्चा करेंगे और साथ ही यह भी देखेंगे कि इसके पक्ष में क्या तर्क दिए जाते हैं..

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के पक्ष में अहम रूप से 4 तर्क दिए जा सकते हैं.

1.हर पांच साल में देश के सारे चुनाव एक साथ करा लेने से चुनाव खर्च की बचत होगी.

यह सही है कि भारत में चुनाव एक बड़ी पहल है. मिसाल के तौर पर, 2014 के लोकसभा चुनाव के समय देश में लगभग 83 करोड़ वोटर थे. उस चुनाव में लगभग 9 लाख पोलिंग बूथ थे. हर बूथ के हिसाब से मतदान कर्मचारियों और सुरक्षा बलों की तैनाती से लेकर मतगणना तक को शामिल करें, तो यह सचमुच महंगा है.

2.बार-बार चुनाव होते रहने से देश लगातार चुनावी ढर्रे में रहता है और सरकारों के लिए विकास के काम करने में बाधा आती है.

चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की घोषणा के बाद सरकार ऐसी कोई नई घोषणा नहीं कर सकती, जिसके बारे में चुनाव आयोग को लगता है कि उससे मतदाताओं के फैसले पर असर पड़ सकता है. चुनाव की घोषणा आम तौर पर, मतदान के नोटिफिकेशन से 21 दिन पहले की जाती है. हालांकि इसमें तमाम दलों और प्रत्याशियों पर कुछ पाबंदियां हैं, लेकिन इसका ज्यादा बोझ सत्ताधारी दल पर है, ताकि उन्हें दूसरे दलों के मुकाबले बढ़त न हासिल हो. इसे ‘मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट’ कहा गया है.

3.बार-बार चुनाव होते रहने से जाति और धर्म के विवाद लगातार गर्म रहते हैं क्योंकि राजनीतिक दल अपने फायदे में चुनावी गोलबंदी करने के लिए इन मुद्दों को उछालते रहते हैं.

4.बार-बार चुनाव होने से करप्शन बढ़ता है.

भारत में चुनाव बड़े पैमाने पर पैसे का खेल बन चुका है. चुनाव आयोग की यह सबसे बड़ी चिंता भी है. इसे रोकने में तमाम संस्थाएं विफल रही हैं, जिनमें चुनाव आयोग भी शामिल है. चुनाव के समय सबसे ज्यादा पैसा मीडिया प्रबंधन में लग रहा है. यह बात राजनीतिक दलों के चुनाव खर्च के 2014 के आंकड़ों से भी साबित हुई है. जनमत को प्रभावित करने के लिए मीडिया में पेड न्यूज छापे और दिखाए जाते हैं. इसके अलावा, मतदाताओं की राय को प्रभावित करने में सक्षम लोगों तक पैसे पहुंचाए जाते हैं.

मतदाताओं को रिश्वत देने का भी चलन आम है. शराब बांटी जाती है और गिफ्ट दिए जाते हैं. इस खर्च को कॉरपोरेट जगत से लिया जाता है और बदले में कॉरपोरेट जगत राजनीतिक दलों से फायदा लेता है. बार-बार और लगातार चुनाव होने से यह भ्रष्टाचार पांच साल में एक बार होने वाली घटना की जगह, लगातार जारी चलन बन जाता है. एक बार में लोकसभा और तमाम विधानसभाओं के चुनाव करा लेने से भ्रष्टाचार सीमित समय तक ही चलेगा.

लेकिन जब हम एक राष्ट्र एक चुनाव के समर्थन में दिए जा रहे इन तर्कों को रियलिटी की कसौटी पर देखे तो पाएंगे कि इनमें बहुत कम सच्चाई है. अब उन दिक्कतों की बात, जिनकी वजह से एक राष्ट्र, एक चुनाव की पहल नादानी लगती हैं..

मान लीजिए सारे देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा के चुनाव करा दिए जाएंगे, लेकिन यदि किसी राज्य में किसी भी दल या गठबंधन को बहुमत नहीं मिला या साल दो साल बाद वहां दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ पड़ी तो उस स्थिति में कैसे निपटा जाएगा। क्या आज यह संभव है कि 2017 में गठित उत्तर प्रदेश की विधानसभा 2019 में इसलिए भंग कर दी जाए, क्योंकि लोकसभा का कार्यकाल 2019 में खत्म हो रहा है?

चुनाव में खर्च होता है, लेकिन इतने बड़े लोकतंत्र के हिसाब से यह खर्च बहुत बड़ा नहीं है. 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रति मतदाता चुनाव पर आया खर्च सिर्फ 17 रुपये था. इसलिए यह कहना सही नहीं है कि बार-बार चुनाव होने से देश का बहुत सारा पैसा बर्बाद हो जाता है.

आम चुनावों के मुद्दे और विधानसभा चुनावों के मुद्दों में भी फर्क होता है. जहां आम चुनावों में बड़े मुद्दे उठाए जाते हैं विधानसभा चुनावों में सीमित या राज्य-संबंधित मुद्दे होते हैं. इसके अलावा किसी पार्टी की अगर केंद्र या राज्य के स्तर पर लहर हो, तो उससे दोनों चुनावों पर असर पड़ सकता है. एक ही व्यक्ति का दो अलग मानसिक स्थितियों में होकर दो अलग-अलग मशीनों में वोट डालना एक पेचीदा काम साबित होगा. हालांकि कुछ खास स्थितियों में अभी भी केंद्र और कुछ राज्यों के चुनाव एक साथ होते हैं. लेकिन तमाम विधानसभाओं को एक साथ भंग करके लोकसभा के चुनाव के साथ उनका चुनाव कराना सही नहीं होगा.