भारतीय मीडिया क्यों कर रही है ‘ड ताशकंत फाइल्स’ का बहिष्कार

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भारत के दूसरे प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री एक वॉर ट्रीटी पर हस्ताक्षर करने सोवियत संघ के शहर ताशकंत जाते है और वहां दुसरे ही दिन उनकी रहस्यमय तरीके से मौत हो जाती है. देश के सर्वाधिक पसंद किये जाने वाले नेता जिनका काद तो छोटा था लेकिन इरादे चट्टानों से भी ऊचे. आखिर क्या वजह थी उनके यूँ गुज़र जाने की, और क्या वजह थी की यह राज़ खोलने की किसी ने अज तक कोशिश भी नहीं की? हाल ही में आई फिल्म “द ताशकंत फाइल्स” इसी मुददे पर आधारित है.
सिर्फ 250 स्क्रीन पर रिलीज़ की गयी इस फिल्म को दर्शको से तगड़ा रेस्पोंसे मिल रहा है. फिल्म में कई दिग्गज कलाकार जैसे “नसीरुद्दीन शाह”, शवेता बासु”, “मिथुन चक्रवर्ती”, “पंजक त्रिपाठी” और “मंदिरा बेदी” जैसे कलाकार शामिल हैं.
हमारे देश के नामी मीडिया संसथान जो खुद को लोक तंत्र का चौथा स्तंब कहते हैं, वो न जाने क्यों मेहेज़ एक छोटी सी फिल्म से डरे हुए लग रहे है. तमाम चैनल इसे एक पप्रोपगैंडा फिल्म करार दे रहे है और इसका रिव्यु देने से भी बाच रहे हैं, आखिर क्या है इस फिल्म में जो इन्हें इसका रिलीज़ होना इतना नागवारा बीत रहा है.
“NDTV” ने तो मूवी को 0.5 स्टार दे डाले और मूवी को “Junk” यानी कचरे की उपाधी दी है, हालाकि इस फिल्म का IMDB पेज जिसपे इस फिल्म को 8.5 की रेटिंग मिली है, कुछ और ही बयान कर रहा है. और बाकि बचे चैनलों ने तो इसका बहिष्कार ही कर दिया है. ये वही चैनल हैं जो “Race 3” और “Namaste London” जैसी फिल्मो को दो स्टार देते हैं लेकिन ताशकंत जैसे नाजुक मुददे को उजागर करने वाली फिल्म जो की एक सच्ची घटना पर आधारित है उसको 0.5 स्टार देते हैं.
बीते कुछ दिनों में आई फिल्में जैसे “रोमियो अकबर वाल्टर “,“मणिकर्णिका”, “परमाणु” और “उरी” जैसी फिल्मो को भी इन संस्थाओं ने 2 या 2.5 स्टार से नवाज़ा था. इन फिल्मो में केवल एक ही बुरे थी की वो देश की एकता और अखंडता की बात कर रहे थे जो की शायद इनके लिब्रेअल आउटलुक को शोभा नहीं देता.
मीडिया का कर्त्तव्य होता है सच को सामने लाना और विवादित मुदो पर सवाल उठाना ताकि सच्चाई सामने आ सके लेकिन, यह इस देश की विडम्बना है की हमारी मीडिया ने ना तो हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री की मौत का सच उजागर करने की कोशिश की और न ही उस मुददे पर बनी एक फिल्म को बर्दाश्त कार पाई.