“किसान पराली क्यों जलाते हैं” दावा है- इस खबर को पढने के बाद आप अच्छी तरह समझ जायेंगे

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दिल्ली की हवा जहरीली हो चुकी है.. अब धीरे धीरे साधारण होती जा रही है. लेकिन इसके लिए सबसे वजह किसानों द्वारा जलाई जा रही पराली मानी जाती है.. किसानों को जिम्मेदार ठहराया जाता है.. लेकिन क्या इसके लिए किसान जिम्मेदार हैं? ये बड़ा सवाल है और हम आज आपको जो तथ्य बताने जा रहे हैं उसके बाद आप खुद अंदाजा लगाइए कि इसके लिए सरकार कितना जिम्मेदार है.

दरअसल देखा जाए तो हरियाणा और पंजाब में पराली की परेशानी के पीछे दोनों राज्यों का एक क़ानून भी है. आपको जानकर हैरानी होगी कि हरियाणा और पंजाब के किसानों को धान की फसल कब लगाना है इसकी समय सीमा वहां की सरकार तय करती है..जैसे धान की सफल मई में लगा दी जाती है लेकिन अब सरकार ने इसे देरी से लगाने का कानून बना दिया. इस तरह से कभी मई में बोई जाने वाली धान की फ़सल अब आधा जून बीत जाने के बाद की जाती है. इसके लिए एक कानून भी बनाया गया है, जिसे भूजल संरक्षण अधिनियम क़ानून’ नाम दिया गया है

सबसे अहम बात ये कि इस क़ानून के तहत राज्य सरकार का कृषि विभाग ही किसानों को धान की फ़सल बोने का वक़्त बताता है. सरकार ऐसा इसलिए करती है, ताकि बारिश का पानी किसानों की मदद करे और किसान धान की फ़सल लगाने के लिए सबमरसिबल पम्प और दूसरी तकनीक के ज़रिये अंडरग्राउंड वॉटर कम खींचें. दरअसल धान की बुआई के लिए अधिक पानी की जरूरत पड़ती है और किसान ग्राउंड वाटर का उपयोग ना कर बारिश के पानी का उपयोग अधिक करें इसलिए धान की फसल के लिए समय सरकार तय करने लगी..

अब अगर कोई इस कानून के खिलाफ जाकर धान की फसल को उगाता है तो 10 हजार रूपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जुर्माना देना पड़ता है. एक बबार सेज्यादा कनून तोड़ने पर किसान के घर की बिजली भी काटी जा सकती है. पहले जब ये कानून पंजाब में बनाया गया था तब इसका काफी विरोध हुआ था लेकिन सरकार अड़ी रही और बाद में इसी कानून को हरियाणा सरकार ने भी लागू कर दिया. फ़सल की बुआई का वक़्त एक महीना आगे बढ़ गया और यही एक महीना फ़सल काटने में भी आगे बढ़ गया. यानी जो फ़सल पहले सितम्बर के आख़िर में और अक्टूबर की शुरुआत में काटी जाती थी, वो फ़सल अब अक्टूबर के आख़िर में और नवम्बर की शुरुआत में काटी जाने लगी है. ये वक़्त इसलिए भी किसानों के लिए नाज़ुक होता है, क्योंकि ठंड के बढ़ने से पहले किसान खेत में अगली फ़सल लगाने के लिए मजबूर है.

अब अगली फसल मतलब गेहू नवम्बर में ही लगानी होती है… अब किसानों के पास इतना वक्त नही बचता कि वे पराली को हटाए या उसकी सफाई करे क्योंकि उनके पास गेंहू बोने का वक्त काफी कम होता है.. ऐसे में उनके पास पराली को जलाने के अलावा कोई और चारा नही बचा. 

सरकार ने ग्राउंड वाटर लेबल ठीक करने के लिए ये कदम उठाया था.. क्योंकि पंजाब में किसानों को बिजली मुफ्त है तो पानी की मशीन खूब चलते हैं..ग्राउंड वाटर लेबल तो ठीक हो गया लेकिन खेती के समय में किए गये परिवर्तन से आज पूरा देश उसका खामियाजा भुगत रहा है. अब आप ही सोचिये किसान कहाँ गलत है? सरकार कहाँ गलत है?

जिन जगहों पर इसकी वजह से प्रदुषण फ़ैल रहा है उन्होंने प्रदुषण के लिए क्या क्या किया है क्या सिर्फ एक दो योजनाओं से प्रदुषण से मुक्ति मिल जायेगी..इसका जवाब शायद आपके पास भी होगा.