सावरकर की देशभक्ति पर क्यों उठते हैं सवाल?

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इन दिनों विनायक दामोदर सावरकर फिर से एक बार सुर्ख़ियों में हैं. सुर्ख़ियों में होने की पहली वजह ये है कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने 10 वीं क्लास के पाठ्यक्रम में विनायक दामोदर सावरकर के जीवनी वाले हिस्से में बदलाव किया है. भाजपा सरकार के दौरान तैयार कराये गए सिलेबस में सावरकर को क्रांतिकारी, महान देशभक्त और वीर बताया गया था जबकि कांग्रेस सरकार ने उसमे बदलाव करते हुए सावरकर को जेल की यातनाओं से तंग आ कर अंग्रेजों से माफ़ी मांगने वाला बताया गया है .

इन सबके अलावा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी सावरकर के बारे में एक विवादित बयान दिया है . सावरकर की जयंती से ठीक एक दिन पहले 27 मई को बघेल ने कहा कि सबसे पहले सावरकर ने दो राष्ट्र का सिद्धांत दिया था जिसे बाद में मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनाया. उन्होंने कहा – सावरकर ने हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्र के कल्पना का बीजारोपण किया था और जिन्ना से उसपर अमल किया . बघेल के इस बयान पर बवाल मचना था और बवाल मचा भी. क्योंकि सावरकर को भाजपा और संघ परिवार वो वीर क्रांतिकारी मानता रहा है, जिनकी छवि धूमिल करने के लिए कांग्रेस के समय के इतिहासकारों ने उनके इतिहास को तोड़ मरोड़ कर देश के सामने रखा. इस बयान पर बवाल इसलिए भी मचा, क्योंकि एक तरह से बघेल ने देश के विभाजन के लिए जिन्ना का बचाव करते हुए ठीकरा सावरकर के ऊपर फोड़ने की कोशिश की.

स्वतंत्रता आन्दोलन में हज़ारों क्रांतिकारियों ने भाग लिया था लेकिन उन सब में से सिर्फ सावरकार ही ऐसे हैं उनकी मृत्यु के 53 साल बाद भी उनको लेकर विवाद खड़ा होता रहता है. सावरकर संघ से जुड़े हुए नहीं थे लेकिन इसके बावजूद भी वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत महत्त्व रखते हैं और पूजनीय हैं. माना जाता है कि इतिहास में सावरकार को वो स्थान और दर्जा नहीं दिया गया जिसके वो हकदार थे .

द आरएसएस-आइकॉन्स ऑफ़ द इंडियन राइट नाम की बहुचर्चित किताब लिखने वाले नीलांजन मुखोपाध्याय के अनुसार 1906 में महात्मा गाँधी और सावरकर की मुलाकात लन्दन में हुई थी. तब महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका में हो रहे भारतीय पर अत्याचार के खिलाफ सत्याग्रह आन्दोलन चलाना चाह रहे थे और चाहते थे कि सावरकर उसमे उनकी मदद करें, बाद में उन्ही सावरकर पर महात्मा गाँधी की हत्या में शामिल होने का आरोप लगा . हालाँकि सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया गया था.

साल 1910 में सावरकर को एक अंग्रेज अफसर जैक्सन की हत्या में शामिल होने के आरोप में लन्दन में गिरफ्तार किया गया था. सावरकर पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने लन्दन से एक पिस्टल खरीद कर नासिक में अपने भाई को भेजी जिससे से नासिक के कलेक्टर की हत्या की गई थी . पानी के जहाज से उन्हें गिरफ्तार कर भारत लाया जा रहा था लेकिन जब जहाज ने एक बंदरगाह पर लंगर डाला तो सावरकर शौचालय के पोर्ट होल से समुद्र ने कूद कर भाग निकले. सुरक्षाकर्मियों ने उनपर गोलियां चलाई लेकिन वो बच गए और तैर कर किनारे पर पहुंचे लेकिन पकड़ लिए गए और अगले 25 साल तक वो अंग्रेजों के कैदी रहें . सजा काटने के लिए उन्हें भारत के अंडमान जेल भेज दिया गया जो उस वक़्त काला पानी के नाम से मशहूर था और जिसके बारे में कल्पना करते ही लोगों की रूह काँप जाती थी.

सावरकर को सेल्युलर जेल में 13.5 गुणा 7.5 फ़ीट की कोठरी नंबर 52 में रखा गया. सेल्युलर जेल में 698 कमरे थे. सेल्युलर जेल में कैदियों को अमानवीय यातनाएं दी जाती थी. अंग्रेज अफसर बग्घी में बैठते और कैदी उनके बग्घियों को खींचते, जमीन पथरीली थी , जब कैदी बग्घी नहीं खिंच पाते तो कोड़े से उनकी पिटाई होती. कैदियों को कूनैन पिलाया जाता, खड़े खड़े उल्टियाँ करते कैदी , कभी-कभी कैदी को जेल को जेल के अपने कमरे के एक कोने में ही मल त्यागना पड़ जाता था. आप कल्पना कर सकते हैं कि किन अमानवीय परिस्थितियों में सावरकर ने अपने कैद के जीवन बिताये थे.

आज़ादी की लड़ाई में सावरकर के योगदान को कांग्रेस जिस कारण नकारती आई है और इतिहास में उनके महत्त्व को कम करने की कोशिश की है. वो है सावरकर के माफ़ी पत्र जो उन्होंने कालापानी की सजा के दौरान अंग्रेजी सरकार को लिखे . सावरकर ने 9 साल में 6 बार माफ़ीपत्र लिखे. बीबीसी में सावरकर के ऊपर छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, सावरकर के साथ ही जेल में एक कैदी थे बरिन्द्र घोष, उन्होंने लिखा था, सावरकर ने भले ही माफ़ी पत्र लिखे थे लेकिन वो जेल में कैदियों को आन्दोलन के लिए भड़काते रहते.

सावरकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था अगर मैंने जेल में हड़ताल की होती तो मुझसे भारत पत्र भेजने का अधिकार छीन लिया जाता, ये मेरी रणनीति का हिस्सा थी . बीबीसी में उसी रिपोर्ट में इंदिरा गांधी सेंटर ऑफ़ आर्ट्स के प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने कहा था – सावरकर ने कभी ये नहीं सोचा कि भविष्य में लोग उनकी माफीनामे के बारे में क्या सोचेंगे . उस वक़्त उनकी रणनीति यही थी कि अगर वो जेल से बाहर रहेंगे तो आज़ादी से काम कर सकेंगे और अपनी रणनीतियों पर अमल कर सकेंगे .

सावरकार ने नहीं सोचा था कि जिन माफ़ीनामे को वो अपनी रणनीति का हिस्सा समझ कर लिख रहे हैं .. भविष्य उसी माफीनामे को आधार बनाकर नेहरू युगीन इतिहास उन्हें उचित स्थान देने से मुंह मोड़ लेगा .