कारगिल के इस शेर को पाकिस्तानियों ने “शेरखान” नाम क्यों दिया?

161

इस जाबांज को भारत में शेरशाह और पाकिस्तान में शेरखान के नाम जाना जाता है. अगर मैं युद्ध में मरता हूं तब भी तिरंगे में लिपटा आऊंगा और अगर जीतकर आता हूं, तब अपने ऊपर तिरंगा तपेटकर आऊंगा, देश सेवा का ऐसा मौका कम ही लोगों को मिल पाता है। ये बातें कही थी शेरशाह ने यानी कि कप्तान बिक्रम बत्रा ने.. कैप्टन बिक्रम बत्रा मात्र 24 साल की उम्र में 7 जुलाई को देश के लिए अपनी जान न्योछवर कर दी थी. इस मौके पर पूरे देश में उन्हें याद किया जाता है/ कारगिल युद्ध के हीरो रहे कैप्टन विक्रम बत्रा की बहादुरी के कारण ही उन्हें भारतीय सेना ने शेरशाह तो पाकिस्तानी सेना ने शेरखान नाम दिया था..कैप्टन बित्रा की बहादुरी को देखते हुए ही कै. विक्रम बत्रा को भारत सरकार ने परमवीर चक्र से अलंकृत किया था। शहीद कैप्टन बत्रा के कहे गए ये अंतिम शब्द आज युवा पीढ़ी को प्रेरणा देते हैं। उनको ‘कारगिल का शेर’ भी कहा जाता है।


कैप्टन विक्रम बत्रा की अगुवाई में सेना ने दुश्मन की नाक के नीचे से प्वाइंट 5140 छीन लिया था। उन्होंने अकेले ही 3 घुसपैठियों को मार गिराया था। उनकी वीरता ने यूनिट के जवानों में जोश भर दिया था और प्वाइंट 5140 पर भारत का झंडा लहरा दिया। …. विक्रम बत्रा ने इस चोटी से रेडियो के जरिए अपने कमांड को विजय उद्घोष ‘ये दिल मांगे मोर’ कहा। चोटी 5140 में भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो पूरी दुनिया ने देखा जो कारगिल युद्ध की पहचान बनी..


इसके बाद विक्रम बित्रा की बहादुरी को देखते हुए और उनकी टीम को चोटी 4875 को भी कब्जे में लेने की जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद उन्होंने लेफ्टिनेंट अनुज नैयर और अपने साथियों के साथ इस मिशन पर लग गये. इस छोटी पर 80 डिग्री की चढ़ाई करनी थी. जान की परवाह न करते हुए लेफ्टिनेंट अनुज नैयर के साथ कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा।अंतिम मिशन लगभग पूरा हो चुका था जब कैप्टन अपने कनिष्ठ अधिकारी लेफ्टीनेंट नवीन को बचाने के लिए लपके। एक विस्फोट में नवीन के दोनों पैर जख्मी हो गये थे . इसी दौरान जब बत्रा अपने सहयोगी नवीन को बचाने के लिए घसीट रहे थे तभी एक गोली उनके सीने में लगी और भारत माता की जय बोलते हुए शहीद हो गये. अदम्य साहस और पराक्रम के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा को 15 अगस्त 1999 को परमवीर चक्र के सम्मान से नवाजा गया जो उनके पिता जीएल बत्रा ने प्राप्त किया।
1997 में विक्रम बत्रा को मर्चेंट नेवी से नौकरी का ऑफर मिला लेकिन उन्होंने लेफ्टिनेंट की नौकरी को चुना। 1996 में इंडियन मिलिट्री एकैडमी में मॉनेक शॉ बटालियन में उनका चयन हुआ और उन्हें जम्मू कश्मीर राइफल यूनिट, श्योपुर में बतौर लेफ्टिनेंट नियुक्त किया गया.. बत्रा पढ़ाई के दौरान से ही एनसीसी कैडेट से जुड़े हुए थे.. यहीं से वे सेना में जाकर देश सेवा के प्रेरित हुए थे.


7 जुलाई को हर साल विक्रम बत्रा के शहीद दिवस के रूप में मनया जाता है. the चौपाल भी विक्रम बत्रा को सलाम करता है, अभिनन्दन करता है. डीएवी कालेज की शान परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा की बायोपिक द शेरशाह ऑफ़ कारगिल ..बन रही है। जिसमें अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा कैप्टन विक्रम बत्रा का रोल निभा रहे हैं। फिल्म के कुछ सीन पंजाब यूनिवर्सिटी में फिल्माए जा चुके हैं, जबकि डीएवी कालेज में अगले दो महीने में फिल्म की शूटिंग का शेड्यूल है। अगले साल यह फिल्म रिलीज होगी।