आज़ादी के लिए कालापानी की सजा काटने वाले सावरकर से कांग्रेस को क्या दिक्कत है

इस वक्त इस देश मे कई ऐसी चीजें हो रही है जो कि पहले कभी नहीं हुई थी, आज कुछ लोग और कुछ पार्टियाँ हमारे ही देश के महापुरुषों का सारे आम अपमान करने से ज़रा भी नहीं डर रहे हैं.

इतिहास को अपनी जागीर समझ बैठे कांग्रेस के स्टूडेंट्स विंग NSUI ने एक नई करतूत की है, केवल 24 घंटे पहले दिल्ली के नार्थ कैंपस में लगाई गई वीर सावरकर की प्रतिमा के साथ इन छात्रों ने बेहद ही भद्दा सलूक किया।लगता है NSUI ने फिलहाल नार्थ कैंपस को अपनी बापौती मान रखा है, क्योंकि अब तक तो कांग्रेस सिर्फ ज़ुबानी तौर पर ही हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान करती थी, लेकिन इनकी आने वाली पीढ़ी तो हद से आगे निकल गई|

उन्होंने वीर सावरकर को जूतों की माला पहनाई और उनके चेहरे पर कालिख पोत दी,

सावरकर एक देशभक्त थे, आज़ादी के लिए लड़ते हुए उन्हें अंग्रेजों ने कला पानी की सज़ा सुना दी थी, आज़ादी के लिए लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानी के चेहरे पे अगर कांग्रेस कालिख पोत रही है तो निश्चित है कि वो आज भी अंग्रेजों की ही हिमायती है और आजादी का श्रेय नेहरु गाँधी के परिवार के अलावा किसी और को देने को तैयार नहीं है. ये इस देश के इतिहास और समाज दोनों के ही साथ नाइंसाफ़ी है। सावरकर को 1910 में हेग के अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय ने एक नहीं, बल्कि दो-दो जन्‍मों के कारावास की सजा सुनाई थी। उन्‍हें 50 वर्ष की सजा सुनाई गई, उन्हें काला पानी सजा काटने अंडमान भेज दिया गया, जबकि इस देश की आज़ादी के इकलौते ठेकेदार माने जाने वाले नेहरु को हमेशा ही सबसे छोटे वक्त की सजा दी जाती थी.

भारत का दुर्भाग्‍य देखिए, भारत की युवा पीढ़ी यह तक नहीं जानती कि वीर सावरकर को आखिर दो जन्‍मों के कालापानी की सजा क्‍यों मिली थी, जबकि हमारे इतिहास की पुस्‍तकों में तो आजादी की पूरी लड़ाई गांधी-नेहरू के नाम कर दी गई है। तो फिर आपने कभी सोचा कि जब देश को आजाद कराने की पूरी लड़ाई गांधी-नेहरू ने लड़ी तो विनायक दामोदर सावरकर को कालापानी की सजा क्‍यों दी गई?  उनकी गलती थी कि उन्होंने कलम उठा ली थी, काला पानी की सजा कटते वक्त उन्हें कलम कागज़ तक से वंचित रखा जाता था, उन्होंने कालकोठरी की दीवारों को अपना कागज़ और अपने नाखूनों को ही कलम बना लिया था, और अपने जीवन के 14 साल उस अँधेरे में काट दिए. जबकि नेहरु जी भारत ने जेलों को बहुत काम ही वक्त बिताते थे, लेकिन उन चंद महीनों में भी सबको ख़त लिखा करते थे….

अगर कांग्रेस को सावरकर के हिन्दूवादी होने से दिक्कत है, तो हां सावरकर हिंदूवादी थे, सावरकर का मानना था कि अगर इस देश को आज़ाद करने के लिए अगर हिन्दू समाज तैयार नही होगा तो ये देश कभी आज़ाद नही हो पाएगा, क्योंकि हमारे समाज की कमजोरियों से ही यहां हज़ारों सालों तक मुस्लिम आक्रांताओं का राज रहा, उन्होंने यहां के लोगों का क़त्लेआम किया, इस देश को लूटा, दरिदंगी की। सावरकर ने अपनी किताब में इस बात को सामने रखा था कि जो इस देश को गुलाम बनाने चाहता है वो भारत को आज़ाद कैसे देखना चाहेंगे, क्या वो सच मे भारत की आज़ादी चाहते थे? या फिर उनके मिल जुल कर ख़िलाफ़त करने के मकसद में उनका कोई स्वार्थ छुपा है, क्योंकि अंग्रेजों ने सिर्फ हिन्दू राजाओं के साथ ही जयत्ति नहीं कि थी, कई मुस्लिम नवाबों को भी उनके डंडे झेलने पड़े थे। उनकी अंग्रेजों से दुश्मनी सिर्फ इतनी थी कि उनकी सत्ता को वो छीन ले गए, न कि देश प्रेम के कारण। उनके लड़ने का मकसद देश मे अंग्रेजों के पहले वाली स्तिथि लाना था।

वीर सावरकर ने तो बस यही चाहता था कि हमे मुगलों और अंग्रेजों दोनो से आज़ादी मील और इस देश मे हमरा शासन हो। लेकिन, नेहरू की विचारधारा के चलते ही आखिर पश्चिम पाकिस्तान में हिन्दू गुलाम हुए, पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दू गुलाम हुए,  तो निश्चित है वीर सावरकर की अंग्रेजी हुकूमत के साथ जो लड़ाई थी वो नेहरू को कभी रास नहीं आई, और आज भी कांग्रेस उसी विचारधारा से ग्रस्त है तभी तो आज भी 370 के हटने के खिलाफ लड़ रही है।

कांग्रेस अक्सर उन्हें चाटुकार कह कर संबोधित करती है, कांग्रेस को सावरकर के एक माफ़ी नामे से तकलीफ थी, की उन्होंने अंग्रेजों के माफ़ी क्यों मांगी थी, लेकिन सावरकर ने अपनी आत्मकथा में बताया है की वो उनकी एक सोची समझी साजिश थी, ताकि उन्हों अंग्रेज़ खत लिख कर भारत भेजने की रियायत देसकें. जबकि कांग्रेस इस बात का जवाब नहीं देती की नेहरु को हमेशा इतने काम वक्त की सजा क्यों मिलती थी, अगर वो इतने ही अँगरेज़ विरोधी थे तो उनके इतने अंग्रेजी दोस्त क्यों थे, क्यों वो माउंटबैटन और उनकी पत्नी edwina के इतने करीबी हुआ करते थे, ये बातें आपको कांग्रेस कभी नहीं बताएगी. इस देश को आज़ाद करवाने में एक नेहरु का ही तो योगदान था. यहाँ अफ़सोस की बात तो ये है की आज़ाद भारत के इतिहास में भी जगह नहीं दी गई. हमारे देश के युवा पश्चिमी देश के राजाओं के बखान करते नहीं थकेंगे लेकिन अपने ही देश के महापुरुष वीर सावरकर के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं होती.