आयुष्मान भारत की अहमियत को क्यों नही समझ पा रहे अरविंद केजरीवाल

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25 सितम्बर 2018 को पूरे भारत में शुरू की गयी विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थय योजना आयुष्मान भारत. बजट सत्र के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस योजना की घोषणा की थी. इस योजना के तहत सरकार लगभग 50 करोड़ ज़रूरतमंद लोगों को 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करायेगी. वो गरीब जो छोटी-छोटी बीमारियों का इलाज़ भी मुश्किल से करवा पाते थे.


क्रिटिकल हार्ट डिजीज से पीड़ित रांची की एक बच्ची आलिया, पानीपत की एक 80साल की महिला, जो गंभीर रूप से सेप्टिक घाव से पीड़ित, बिहार के औरंगाबाद के 59 वर्षीय एक चाय विक्रेता को मुंह का कैंसर,तो वहीं महाराष्ट्र के सतारा से पता चला कि एक 60 साल का दर्जी छाती में दर्द के कारण भर्ती कराया गया…और वही झारखंड के एक युवा देवीलाल नायक को टूटे हुए कूल्हे के साथ…– आप जानते है इन सब में समानता क्या है? इन सभी को प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना जिसे (आमतौर पर आयुष्मान भारत योजना के रूप में जाना जाता है) के तहत बेस्ट सरकारी और प्राइवेट हॉस्पिटल्स में नि:शुल्क इलाज किया गया है ..इसमे ऊपर बताए गए पाँचों का ही नहीं, बल्कि मोदी सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुधार तक पहुँचने वाले 13,37,267 लोग (28 फरवरी 2019 तक) इसके बेनिफिसिय्री रहे हैं.. एक डॉक्टर होने के नाते मैं देखती हूँ , कि किस तरह लोग हेल्थ रिलेटेड प्रोब्लम्स से निपटने के लिए किस किस तरह की चुनौतियों का सामना करते है .. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हमारे देश के 62.58% लोग अपने स्वयं के स्वास्थ्य और अस्पताल में भर्ती होने के खर्च का भुगतान करते हैं और हेल्थ केयर की किसी भी पालिसी में कवर नहीं होते हैं। अपनी आय और बचत का उपयोग करने के अलावा, लोग अपनी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसे उधार लेते हैं या अपनी [संपत्ति] प्रॉपर्टी बेचते हैं.. स्थिति इतनी गंभीर थी कि स्वास्थ्य और दवाओं पर खर्च के कारण जनसंख्या का एक बड़ा प्रतिशत हर साल गरीबी रेखा से नीचे धकेल दिया जाता है।


पिछले 15 सालों में हेल्थ पर बढ़ते हुए खर्चे को UPA ने पूरी तरह से नजरंदाज कर दिया और लाखों परिवार इसके चलते और गरीब हो गए. पूरा देश इस बात पर जोर दे रहा था कि एक ठोस कदम उठाया जाये ताकि भारत संविधान के Article 21(राईट तो लाइफ) के अंदर स्वास्थ्य का अधिकार एक मौलिक अधिकार के रूप में नागरिकों को मिल सके. इस सच्चाई को ध्यान में रखते हुए और ग़रीबों के ऊपर अस्पतालों के चक्कर लगाने के चलते आर्थिक बोझ को कम करने के लिए और सभी तक अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं को सभी वर्गों तक पहुँचाने के लिए मोदी सरकार आयुष्मान भारत जैसी एक बहुत बड़ी योजना लेकर आई है. ये योजना सभी को स्वास्थ्य के साथ यूनाइटेड नेशंस के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल नंबर तीन जिसका लक्ष्य mortility रेट कम करना, महामारी यानि एपिड़ेमिक्स को कम करना, सभी के पास सस्ती ज़रूरी दवाइयाँ उपलब्ध कराना और हेल्थ के ऊपर सरकारी खर्च बढ़ाना है, इस दिशा में ये योजना भारत कि गति को बहुत तेज़ी देने का काम करेगी.

आयुष्मान भारत योजना इतनी व्यापक है कि इसके अंदर 1350 मेडिकल पैकेजिस हैं जिसमें सर्जरी, मेडिकल केयर, उपचार, दवाइयाँ, बीमारी का निदान और ट्रांसपोर्ट उपलब्ध है. और इसके साथ ये भी सुनिश्चित किया गया है कि कोई भी व्यक्ति खास तौर पर छोटी बच्चियाँ, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग इस योजना से वंचित न हो इसके लिए परिवार का साइज़ और परिवार के सदस्यों कि उम्र पर भी कोई लिमिट नहीं रखी गयी है. डिजिटल इंडिया के विज़न को ध्यान में रखते हुए ये स्कीम चौदह हज़ार सात सौ आठ अस्पतालों में और प्राइवेट अस्पतालों में बिलकुल कैशलेस और पेपरलेस है. अस्पतालों कि संख्या इस योजना के अंतर्गत आने वाले कुछ ही महीनों में एक लाख तक पहुँच जाएगी. साल 2022 तक जब ये योजना पूरी तरह से लागू हो जाएगी तब ये योजना सरकार द्वारा दुनिया की सबसे बड़ी हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम के रूप में सामने आएगी. जिस तरह यह एक ऐतिहासिक और बड़ी योजना है, तो स्वाभाविक है कि उसी प्रकार इसकी आलोचना भी होगी. इस योजना कि आलोचना में एक तर्क दिया जा रहा है कि ये स्कीम फाइनेंस के पहलू पर फोकस करती है, न कि हेल्थकेयर पर लेकिन इस बात में कोई सच्चाई नहीं है.

आयुष्मान भारत का सबसे अहम हिस्सा हैं डेढ़ लाख हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर्स और पूरे देश में फैले जन औषधि स्टोर्स जो कि हेल्थकेयर सेक्टर में एक गेम चेंजर होगा. इसके चलते लोगों कि पहुँच पब्लिक हेल्थकेयर का उपयोग करने में बहुत बढ़ जाएगी. इस योजना में ये भी ध्यान दिया गया है कि सस्ती दवाइयाँ जन औषधि स्टोर के ज़रिये लोगों को मुहैया करायी जा सके. जब पूरा देश इस योजना को एक परिवर्तनकारी मिशन और एक लाइफलाइन के रूप में देख रहा है वही दूसरी ओर कुछ लोग नागरिकों के स्वास्थ्य पर ओछी राजनीति कर रहे हैं. आयुष्मान भारत योजना दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के कठोर रवैये के चलते बहुत डिले हो गयी है. सबसे अहम वजह इस योजना के डिले होने की ये है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल इस योजना को अपनी पार्टी के नाम से चलाना चाहते हैं… केजरीवाल चाहते हैं कि इस योजना का नाम, मुख्यमंत्री आम आदमी स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान भारत, हो. केंद्र सरकार करीब छह महीने पहले दिल्ली सरकार को लिख चुकी है की ये ज़रूरी है कि इस योजना का नाम आयुष्मान भारत हो क्योंकि ये एक नेशनल स्कीम है नेशनल character के साथ और साथ ही राज्य सरकार आयुष्मान भारत के बाद कोई भी नाम इस्तेमाल कर सकती है. लेकिन इसके बाद भी दिल्ली सरकार ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाये हैं.


इस भयानक स्थिति के पीछे का कारण है अरविन्द केजरीवाल का स्वार्थी नेचर, जिसे प्रधानमंत्री ने अपने उदार और राजनेता के रूप में डील करने कि कोशिश की है. केंद्र सरकार ने तीन सबसे बड़े सेंट्रल गवर्नमेंट अस्पतालों को आयुष्मान भारत में सम्मिलित कर लिया है. ये तीन अस्पताल जिन्हें सीधे MOU के जरिये आयुष्मान भारत में शामिल किया है वो हैं एम्स, सफदरजंग अस्पताल और राम मनोहर लोहिया अस्पताल. दिल्ली सरकार कोई अड़चन ना पैदा कर सके इसके लिए केंद्र सरकार ने 13 निजी अस्पतालों से भी सीधा MOU करके आयुष्मान भारत में सम्मिलित किया है. साथ ही केंद्र सरकार ने दिल्ली के 45 सबसे अच्छे निजी अस्पतालों जिनमें अपोलो, फोर्टिस और मैक्स भी शामिल है और जो नेशनल अक्रेडीशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स के हिस्सा हैं, उनसे भी बातचीत की है कि वे आयुष्मान भारत का हिस्सा बने. लेकिन इसके बाद भी केजरीवाल कि दिल्ली सरकार के अस्पताल अभी तक इस योजना के हिस्सा नहीं बन सके हैं.
जब इतना गंभीर और ठोस कदम मोदी सरकार उठा रही है ताकि सरकार द्वारा दुनिया कि सबसे बड़ी हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम लोगों तक पहुँच सके तब हमें अपने आप से एक सवाल पूछना होगा कि क्या एक आदमी का अहंकार दो करोड़ दिल्ली वासियों कि सेहत से ज्यादा बड़ा है?

(ये डॉ नंदिनी शर्मा के इंग्लिश में लिखे लेख का हिंदी अनुवाद है ,
डॉ नंदिनी शर्मा दिल्ली की प्रख्यात डॉ और सोशल वर्कर है. ये लेखिका के अपने विचार है)