1947 के दंगों के बाद सरदार पटेल की इस बात ने नेहरू को बगले झांकने को कर दिया था मजबूर

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साल था 1947 और महीना था दिसम्बर

देश को आज़ादी मिल चुकी थी। यूँ तो वक्त जश्न मनाने का था क्योकि भारत माँ की लाखों संतानों ने अपना बलिदान देकर देश को अंग्रेजी चुंगल से आज़ाद करा दिया था। लेकिन देश आज़ादी की हवा को ठीक से महसूस भी कर पाता उससे पहले ही देश मे दंगे भड़क उठे। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार पटेल की लाख कोशिशो के बावजूद हालत काबू में नही आ रहे थे और स्थिति बिगड़ती जा रही थी। राजस्थान का अजेमर भी दंगे की चपेट में आने से नही बच सका और वहां भी साम्प्रदायिक दंगा हो गया। मामले की तह तक जाने के लिए सरदार पटेल ने वहां एक जांच दल को भेज दिया, लेकिन अचानक ही  प्रधानमंत्री नेहरू ने घोषणा कर दी कि दिसम्बर के आखिरी में वो खुद अजमेर जाके जांच कराएंगे। जैसे ही ये बात सरदार पटेल के पास पहुँची तो उनका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा,उन्होंने नेहरू के पद का लिहाज़ करते हुए उस वक्त  किसी तरह खुद के गुस्से को काबू कर लिया।

समय बीतता जा रहा था। नेहरू के अजमेर जाने का समय होने ही वाला था तभी नेहरू ने ऐलान कर दिया की वो खुद अजमेर नही जाएंगे बल्कि उनकी जगह उनका पर्सनल सैकेट्री अजमेर जाएगा।।

सरदार पटेल के जेहन में अब ये बात खटकने लगी थी की, जब गृह मंत्रालय की जांच टीम पहले ही अजमेर जा चुकी है तो प्रधानमंत्री का अपने पर्सनल सेकेट्री को वहां भेजने का क्या मतलब है ?? पटेल को लगा कि इसका सीधा मतलब है कि नेहरू को उनके काम पर भरोसा नही है इसलिए ऐसा किया जा रहा है।
लौह पुरुष कहे जाने वाले पटेल चुप नही बैठे और नेहरू के सामने इस बात को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज करा दी।

नेहरू ने दलील दी कि  उनके परिवार में कोई बीमार है इसलिए वो खुद नही जा पा रहे है। और जनता से मिलना भी बेहद जरूरी है इसलिए वो अपने पर्सनल सैकेट्री को वहां भेज रहे। यहां तक तो सब ठीक था लेकिन फिर लाल रंग की सदरी पहने जवाहर लाल के मुँह से कुछ ऐसा निकल गया जिसे सुनकर सरदार पटेल का चेहरा गुस्से में लाल गया।
पटेल के सामने नेहरू ने अपने कद का रौब दिखाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है और वो जहां चाहे खुद जा सकता है और जिसे चाहे कही भेज सकता है। नेहरू की बात पूरी भी नही हुई थी,पटेल ने उन्हें बीच मे रोकते हुए कहा लोकतंत्र में पीएम सबसे बड़ा बिल्कुल नही होता बल्कि अपनी बराबरी के लोगो मे पहले नंबर पर होता है। पटेल ने सीधे शब्दों में कह दिया था कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री से ये उम्मीद नही की जाती की वो अपने मंत्रियों पर हुक्म चलाएगा। अपने पद पर बैठे नेहरू ये सुनते ही एकदम झेंप गए। शायद उन्हें अंदाज़ा हो गया था कि सरकार के  गलत कामो का विरोध करने के लिए भी उनकी ही सरकार में सरदार पटेल जैसा कद्दावर जैसा नेता भी मौजूद है।


इसके बाद नेहरू ने पटेल को दुश्मन की तरह देखना शुरू कर दिया और नतीजा ये हुआ कि दोनों के सम्बंध लगातार बिगड़ते चले गए। एक वक्त ऐसा भी आ गया जब सरदार पटेल ने अपने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी। बात गांधी जी तक पहुँची तो उन्होंने नेहरू और पटेल दोनो को बातचीत के लिए बुलाया पर ये बैठक हो पाती उससे पहले ही 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हो गई। बाद में सरदार पटेल की काबिलयत के आगे नेहरू को झुकना पड़ा और उन्होंने आपसी मतभेद खत्म करने के लिए पटेल को चिट्ठी लिखी,देशहित को तवज्जो देते हुए सरदार पटेल ने भी विवादों को साइड में कर दिया और नेहरू के साथ मिलकर देश को मुश्किल हालत से निकालने में जुट गए। इस घटना ने पूरे देश के सामने पटेल की छवि को मजबूत इरादों और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले लीडर के रूप मे स्थापित कर दिया। 

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