जाने, आखिर क्या है ऑपरेशन लोटस

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आजकल आपने अखबारों और टीवी चैनलों पर ऑपरेशन लोटस शब्द खूब सुना होगा. जिस सुनकर आपके दिमाग में में ये जरुर आया होगा की आखिर ये लोटस ओपरेशन है क्या, चलिए छोटे से दिमाग पे ज्यादा जोर मत डालिए, हम ही आपको बता देते है की आखिर लोटस ओपरेशन है क्या.

साल था 2008, कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए थे. 224 सदस्यों की कर्नाटक विधानसभा में किसी भी पार्टी को बहुमत नही मिला. चुनाव में काफी जोर आजमाइश के बाद भाजपा को 110 सीट, कांग्रेस 80,जेडीएस- 28 और निर्दलीय उमीदवारों को 6 सीट मिली थी.

चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी होने के चलते राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने भाजपा को सरकार बनाने का निमन्त्रण दे दिया. बाद में भाजपा के विधायको ने सर्वसम्मति से बी.एस. येदियुरप्पा को विधायक दल का नेता चुना लिया यानी ये तय हो गया की अब राज्य के मुख्यमन्त्री येदियुरप्पा ही बनेगे. भाजपा के पास बहुमत तो नही था लेकिन वो कहते है ना की सत्ता की मलाई सबको भाति है इसलिए ६ निर्दलीय भी भाजपा के पाले में आ गए. सरकार भले ही बन चुकी थी लेकिन येदियुरप्पा को सत्ता जाने का डर सता रहा था . इस बार सत्ता पक्ष काफी सटीकता के साथ रणनीतिक चक्रव्यूह तैयार करने में जुटा था. पूरी भारतीय जनता पार्टी इस बात को बखूबी जानती थी की उसकी जरा सी लापरवाही उसे २००७ की तरह सत्ता से दूर कर सकती थी. भाजपा प्रदेश में स्थिर सरकार की पक्षधर थी .,इसके लिए जरूरी था प्रदेश में अपने दम पर कमल खिलाना. दुविधा की परिस्थिति से निपटने के लिए और बहुमत पाने के लिए बीजेपी ने ‘ऑपरेशन लोटस’ फॉर्मूले को अपनाया ।

हालांकि शुरुआत में ‘ऑपरेशन लोटस’ भाजपा के चुनाव प्रचार का हिस्सा था, जिसमें घर-घर जाकर भाजपा की नीतियों के बारे में बात करना शामिल था। लेकिन बाद में इसका नाम जोड़-तोड़ करके सरकार बनाने से जुड़ गया और इसे ‘ऑपरेशन लोटस’ फॉर्मूला कहा जाने लगा। अब इसे सत्ता पक्ष की तरफ से दिया गया लालच कहे या फिर अन्य पार्टियों के विधायको का सत्ता के प्रति मोह, कारण कुछ भी रहा हो ७ विपक्षी दलों के विधायक भाजपा के सम्पर्क में आ गये. अब अगर ये लोग सीधे सीधे भाजपा की जोइनिंग करते तो दल-बदल कानून के तहत विधानसभा से उनकी सदस्यता खत्म हो जाती इसके लिए सातो विधायको ने पहले तो अपनी पार्टी से इस्तीफा दिया और बाद में भाजपा के साथ आ गये, उनके भाजपा ज्वाइन करने के ६ महीने के भीतर ही प्रदेश में उपचुनाव होने तय थे. भाजपा ने भी मौके पर चौका मारते हुए सभी को उपचुनाव में उतार दिया. येदियुरप्पा की किस्मत बढिया निकली और उपचुनाव में खड़े सात उमीदवारो में से पांच जीत गए. अब भाजपा के पास खुद के ही ११५ विधायक हो चुके थे यानी बहुमत से दो सीट ज्यादा, तो इस तरह से भाजपा ने प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली. फ़िलहाल भीं प्रदेश में ठीक वैसी ही स्थिति है,

भाजपा को इस बार पूर्ण बहुमत के लिए कुल आठ विधायकों की जरूरत है. विपक्षी लगातार आरोप लगा रहे है की भाजपा फिर से लोटस ओपरेशन चला रही है. जबकि येदियुरप्पा एसा कुछ करने कि सम्भावना से साफ़ इनकार क्र रहे है. देखना दिलचस्प रहेगा की कर्नाटक में फिर से कोई “ऑपरेशन लोटस” चलता है या विधायको की खरीद फरोख्त वाली बात गलत ही साबित होती है.

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