2002 गुजरात काण्ड कि सच्चाई

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आज के राजनीती के इस एपिसोड में हम बात करेंगे एक ऐसे मुद्दे कि जो 21वि सदी भारत में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी इस घटना को कुछ मीडिया channels ने, तथाकथित बुद्दिजीवियो ने और कई राजनीतिक दलों ने खूब भुनाया. आपको लग रहा होगा हम राफेल कि बात कर रहे है. लेकिन हम बात कर रहे है 2002 गुजरात दंगों के बारे में. जी हाँ आज के इस एपिसोड में हम आपको बतायेंगे वो सच जिसे तोड़ मरोड़ के सार्वजनिक प्लेटफार्म पर दिखाया गया. जो नहीं था उसकी धारणा बनाई गयी. तथ्यों को जानबूझकर छिपाया गया. आज हम इन सभी तथ्यों के बारे में आपको बतायेंगे जिसके सारे दस्तावेज पब्लिक प्लेटफार्म पर उपलब्ध हैं.

27 फ़रवरी 2002 साबरमती एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से 4 घंटा देर से गुजरात पहुँचती है. सुबह के सात बजकर तैंतालीस मिनट हो चुके थे. ये ट्रेन अयोध्या से अहमदाबाद जा रही थी. इसमें अयोध्या से लौट रहे कारसेवक थे जो अयोध्या राम जन्मभूमि से लौट रहे थे. जैसे ही ट्रेन अपने प्लेटफार्म को छोड़ने लगी तभी अचानक किसी अनजान शख्स ने इमरजेंसी चेन खिंच कर ट्रेन को सिग्नल के पास ही रोक दिया.

और इसके बाद जो हुआ वो बहुत भयानक और निर्मम था. हैरान करने कि बात तो ये है कि साबरमती एक्सप्रेस कि घटना की चर्चा कभी किसी मीडिया या बुद्धिजीवियों ने इतनी गहरायी से की ही नहीं.

ट्रेन को करीब 2000 लोगों का एक झुण्ड घेर लेता हैं और पत्थर बाजी के बाद ट्रेन के 4 कोचों में आग लगा दी जाती है. कारसेवकों का अयोध्या से लौटना और 2000 लोगों द्वारा ट्रेन को घेर लेना, इससे ये बात साफ़ हो जाती है कि ये एक सोची समझी साजिश थी. इस साजिश के चलते 59 लोगों को जिंदा जला दिया जाता है जिसमें 27 महिलाएं और 10 बच्चे भी चपेट में आ गये. इतने बड़े हमले के बाद हिन्दू समाज में रोष पैदा हो गया. ज़रा सोचिये उन मासूमों कि चीखें जो जिंदा ही जल रहे थे और जिनकी चीखें तक कोई नहीं सुन पा रहा हो. ये वाकई एक बहुत दर्दनाक और भयानक सुबह थी.

साबरमती ट्रेन काण्ड के बाद पुरे गुजरात भर में दंगे होते रहे. जिसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों को जान और माल का नुकसान हुआ. आकड़ों कि माने तो 2002 दंगो में कुल मिला के 1044 लोग मारे जाते हैं जिनमें 750 से ज्यादा मुसलमान और 250 से ज्यादा हिन्दू थे. इस घटना के तुरंत बाद वर्तमान प्रधानमंत्री और तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे गुजरात से एक वीडियो के ज़रिये शांति बनाये रखने कि अपील की. लेकिन हालात काबू में आते आते बहुत से लोग दंगों कि चपेट में आ गये थे.

2002 के दंगे निंदनीय के साथ साथ दुर्भाग्यपूर्ण थे. किसी ने इसका समर्थन नहीं किया. लेकिन 2002 के बाद गोधरा दंगों को एक राजनेतिक रूप दे दिया गया और नरेंद मोदी और BJP का खूब मीडिया ट्रायल हुआ. नरेन्द्र मोदी का निजी तौर पर दुष्प्रचार किया गया. उन पर कई देशो ने वीसा प्रतिबन्ध भी लगाया.

लेकिन अंततोगत्वा सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम कि रिपोर्ट के आधार पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट दे दी. इस पूरे घटनाक्रम में नरेन्द्र मोदी पर लगाये गए मुख्य आरोप थे ये.

पहला, नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में साबरमती एक्सप्रेस में जली लाशों को साबरमती से अहमदाबाद ट्रान्सफर करा के दंगों को भड़काया.
दूसरा, मोदी ने हिन्दू भीड़ को खुली छुट दी कि वो दंगा कर सके.
तीसरा, गुलबर्ग सोसाइटी नरसंघार में पूर्व कांग्रेस संसद एहसान जाफरी का भीड़ द्वारा जिंदा जला देना मोदी के संरक्षण में हुआ. इस केस को सांसद कि बीवी ज़किया जाफरी ने सुप्रीम कोर्ट में लड़ा था.
चौथा, राजू रामचंद्रन कि रिपोर्ट. सुप्रीम कोर्ट ने इस केस पर राजू रामचंद्रन को अमिकस क्यूरी नियुक्त किया था. अमिकस क्युरी लैटिन का शब्द है जिसका मतलब होता है कोर्ट का मित्र. राजु रामचंद्रन ने गुजरात के IPS अफसर संजीव भट कि गवाही के आधार पर नरेन्द्र मोदी के ऊपर प्रॉसिक्यूशन चलाने कि अपील सुप्रीम कोर्ट में की थी.
पांचवां, दंगे पीड़ितों के राहत के लिए मोदी ने कोई कार्य नहीं किया.
अब जो हम आपको बताने जा रहे हो वो पूरे दस्तावेज आधारित तथ्य है तो आपको हमारे आगे के वीडियो को बहुत ध्यान से सुनना होगा.
पहला आरोप कि नरेन्द्र मोदी ने जली हुई शवों को गोधरा से अहमदाबाद क्यों ट्रांसफर करवाया. इस आरोप पर नरेन्द्र मोदी ने सुप्रीम कोर्ट गठित SIT को बताया कि ट्रेन गोधरा से अहमदाबाद जा रही थी. और मृतक परिजनों कि शवों उनके घर तक पहुंचाना ज़रूरी था. साथ ही साथ गोधरा में माहौल वैसे ही बहुत आक्रोश पूर्ण था. अगर लाशें गोधरा में ही राखी जाती तो ज़ाहिर तौर पर वहां भीड़ बदती और तनाव भी बढ़ जाता. इसी को ध्यान में रखते हुए सभी लाशों को अहमदाबाद सिविल अस्पताल ले जाने के बजाये सोला सिविल अस्पताल ले जाया गया. अहमदाबाद कि आबादी ज्यादा थी और सोला सिविल अस्पताल एक जंगल जैसी जगह में स्थित था. तो जाहिर है कि कानूनी और नैतिक तौर पर प्रशासन और शासन का यह सही कदम था.

दूसरे आरोप कि नरेन्द्र मोदी ने भीड़ को खुली छूट दी. नरेन्द्र मोदी ने भीड़ को छुट बिलकुल नहीं दी. जबकि पूरी कोशिश कि गयी कि दंगा ज्यादा न भड़के. 27 फ़रवरी को दंगा शुरू होता है और बिना विलंब 27 फ़रवरी दोपहर को ही नरेन्द्र मोदी आर्मी को बुला लेते हैं. आर्मी अहमदाबाद में नहीं थी तो इसके लिए आर्मी को एयरलिफ्ट कराया गया. इस बात कि पुष्टि गुजरात कोर्ट ने भी कि है. साथ ही एक बार दिगविजय सिंह ने नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा करते हुए नरेन्द्र मोदी पर दंगो को काबू न करने का आरोप लगाया था जिसके बाद नरेन्द्र मोदी ने जवाब में कहा था कि उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार , राजस्थान सरकार और महाराष्ट्र सरकार को तुरंत पुलिस बल भेजने के लिए फैक्स किया था और इन तीनों राज्यों ने पुलिस भेजने से मना कर दिया था. गौर करने कि बात यह है कि उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिगविजय सिंह ही थे और राजस्थान और महाराष्ट्र में भी कांग्रेस कि सरकार थी.

वीके मल्होत्रा जो कि BJP के तत्कालीन प्रवक्ता थे उनकी मानें तो पुलिस ने करीब 5000 टियर गैस शेल्स का उपयोग किआ और 100 लोग पुलिस फायरिंग में मारे गए. इसके साथ साथ सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित SIT और नानावटी-शाह कमीशन ने भी नरेन्द्र मोदी को निर्दोष पाया. आपको बता दें नरेन्द्र मोदी स्वतंत्र भारत के एक मात्र मुख्यमंत्री हैं जिन्हें SIT ने एक दिन में ही 10 घंटे तक सवाल जवाब किया था और जिसकी बाकायदा वीडियो रिकॉर्डिंग भी हुई थी, क्योंकि ये सब सुप्रीम कोर्ट कि निगरानी में हो रहा था.

तीसरा आरोप था गुलबर्ग सोसाइटी नरसंघार. एहसान जाफरी कि बीवी ज़किया जाफरी ने नरेन्द्र मोदी पर भीड़ को संरक्षण और उकसाने का आरोप लगाया था. मामला ये था कि गुलबर्ग सोसाइटी के सामने एक भीड़ थी जिसपर जाफरी ने बचाव में फायरिंग कर दी थी. उसके बाद बेकाबू भीड़ ने उन्हें जिन्दा जला दिया था.

SIT ने जकिया जाफरी के आरोपों पर ही सवालिया निशान उठा दिया था. ऐसा इसलिए क्योंकि पुलिस ने पहली बार जकिया से 6 मार्च 2002 को पूछताछ कि थी और उस समय जकिया ने नरेन्द्र मोदी पर कोई आरोप नहीं लगाया था. जकिया ने एक बार फिर 29 सितम्बर 2003 को नानावटी कमीशन, जो कि गुजरात में हए दंगे के लिए गठित कि थी , उसके सामने अपना बयांन दर्ज कराया लेकिन नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया. इसके बाद सितम्बर 2003 में जकिया सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देती हैं और तब भी नरेन्द्र मोदी के उपर कोई आरोप नहीं लगाती हैं. पहली बार 6 जून 2006 ज़किया जाफरी अचानक नरेन्द्र मोदी पर दंगो कि साजिश का आरोप लगाने लगती हैं. और आरोप भी SIT के मुताबिक एकदम सामान्य, अस्पष्ट और रटे रटाये थे. कोर्ट के अमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन भी SIT कि पड़ताल से सहमत था और उन्होंने माना था कि मुख्यमंत्री ने उचित कदम उठाये थे दंगो को रोकने के लिए.

चौथा आरोप था अमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन नरेन्द्र मोदी पर अभियोग चलाने कि बात कर रहे थे. ऐसा रामचंद्र इसलिए कह रहे थे क्योंकि, संजीव भट्ट IPS, जो कि स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो में डिप्टी कमिश्नर थे उन्होंने मौखिक तौर पर ऐसा दावा किया था कि नरेन्द्र मोदी ने 27 फ़रवरी को अपने आवास पर अधिकारिओ को बोला था कि दंगयियो के खिलाफ एक्शन न ले. लेकिन बाद में उस मीटिंग के सभी अधिकारिओ ने इस दावे को सिरे से ख़ारिज कर दिया था. KD चक्रवर्ती तत्कालीन DGP के अनुसार संजीव भट्ट उनके साथ कार में उस मीटिंग में गए ही नहीं थे. इस बात का सुबूत है KD चक्रवर्ती कि लागबुक. सीनियर अफसरों से जो भी मिलने आता है उनका नाम लोगबूक में लिखा जाता है और उस दिन KD चक्रवर्ती कि लागबुक में संजीव भट का नाम नहीं था. संजीव भट के दावे को 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सिरे से ख़ारिज कर दी था.

भारत के मुख्य न्यायधीश एच. एल. दत्तु और अरुण मिश्र कि खंडपीठ ने तो यहाँ तक कह दिया था कि संजीव भट राज्य कि विपक्षी पार्टी यानि कांग्रेस और NGO का एक टूल है यानि एक कठपुतली हैं. संजीव भट वही IPS अधिकारी हैं जिन्होंने 1996 में एक राजस्थान बेस्ड वकील को जूठे नारकोटिक्स केस में फसा दिया था और उसके बाद गुजरात हाई कोर्ट , राजस्थान हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में करीब 40 झूठी याचिकाएं दाखिल करवा दी थी ताकि उनके ऊपर एक्शन टल जाये.

पांचवा आरोप था कि पीड़ितों के लिए राहत कार्य भी गुजरात सरकार ने पर्याप्त मात्र में नहीं किए. दंगों के बाद राहत कार्य तुरंत चालू कर दिए गये थे. राहत के कार्यों के लिए एक कमेटी बनाई गयी जिसके अध्यक्ष थे तत्कालीन गुजरात के राज्यपाल जिसमें नेता प्रतिपक्ष और तमाम नामी NGO भी शामिल थे. ये अपने आप में अभूतपूर्व रहा. वैसे भारत देश में और दुनिया भर में हम जानते है कि कोई भी योजना या स्कीम 100% सफल नहीं होती और अगर इस कमेटी कि निगरानी में हुए राहत कार्य अगर 100% सफल नहीं हुए तो इसके लिए सिर्फ एक व्यक्ति तो जिम्मेदार ठहराना कहा तक जायज़ है.

इसके साथ 2006 में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव यु.सी. बन्नेर्जी कमिटी का गठन करते हैं. ये कमेटी साबरमती ट्रेन कांड को महज़ एक हादसा करार दे देती है. लेकिन गुजरात हाई कोर्ट ने इस कमेटी को इल्लीगल करार दे दिया था. वही जनवरी 2014 में जब राहुल गाँधी से पूछा गया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट दे दी है तो क्या कांग्रेस पार्टी अभी भी नरेन्द्र मोदी को दंगों का जिम्मेदार मानती है तो राहुल गाँधी कुछ नहीं बोल पाए.

अदालत सिर्फ पुख्ता सबूतों के आधार पर कार्यवाही करती है न कि किसी धारणा और अव्फाओं पर, ये बात गोधरा दंगो में भी सच थी और राफेल मामले में भी सच है. अब सबसे बड़ा सवाल है गुजरात कि घटना कि तो सारे मीडिया channels जांच पड़ताल कर ली लेकिन क्या भारतवर्ष में सिर्फ एक ही दंगा हुआ?. बड़ा सवाल ये है 1992 में मुंबई में हुए दंगे, 2011 में हुए राजस्थान के भरतपुर में हुए दंगे ,2012 में असम के कोकराझार में हुई हिंसा और 2013 में हुए मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश में हुए दंगे , इनकी जांच भारतीय मीडिया कब करेगी. सारे channels के पास इतने संसाधन तो है ही कि इन दंगो के बारे में वे गहरायी से जाँच कर सके. या शायद इसीलिए अभी तक इन दंगों कि मीडिया द्वारा जांच नहीं हुई क्योंकि ये कांग्रेस या उनके सहयोगी दलों के कार्यकाल में हुए है.

इस वीडियो में बताये गये सारे तथ्यों को आप भी गूगल कर खुद देख सकते हैं. उम्मीद है आपको ये वीडियो पसंद आया होगा. राजनीति के इस एपिसोड को बनाने का हमारा उद्देश्य बस ये बताना था कि राजनीति तो आदि अनन्त काल से चली आ रही सतत प्रक्रिया है। राजा राम, श्रीकृष्ण के युग से लेकर इस युग तक हर दौर में राजनीति होती है। लेकिन राजनीति के नाम पर आने वाली पीढ़ियों को हम गलत तथ्य न दें । ये हमारी जिम्मेदारी बनती है। और हम इसे जरूर निभाएंगे।

वीडियो:

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