अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत टूटने से पाकिस्तान बेचैन लेकिन भारत को राहत

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18 सालों से अफगानिस्तान में फंसे अपनी फ़ौज को वहां से निकालने के लिए अमेरिका, तालिबान से बातचीत कर रहा था लेकिन अब ये बातचीत टूट गई है. पाकिस्तान के लिए तो ये एक बहुत बड़ा झटका है लेकिन भारत के लिए राहत की खबर है. दरअसल अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता कराने के लिए पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. पाकिस्तान का मानना है अफगानिस्तान में शांति बहाली और सत्ता में संतुलन के लिए तालिबान का होना बहुत जरूरी है. जबकि अफगानिस्तान सरकार और भारत इससे सहमत नहीं है.

अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत क्यों टूट गई

अमेरिका और तालिबान के बीच 9 राउंड की बातचीत हो चुकी थी और आखिरी राउंड की बातचीत अमेरिका के कैंप डेविड में होनी थी. लेकिन बीते दिनों काबुल में हुए आतंकी हमले में एक अमेरिकी सैनिक की मौत हो गई जिसके बाद ट्रम्प भड़क गए और उन्होंने बातचीत रद्द करते हुए कहा कि अब कोई डील नहीं होगी.

अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा कि इस मसले पर लंबे समय से बात जारी थी, लेकिन तालिबान की तरफ से लगातार वादों को तोड़ा गया. इसलिए बातचीत रद्द हो गई है और अफगानिस्तान में अमेरिका का मिशन जारी रहेगा. बातचीत रद्द होने से तालिबान भी भड़क गया और कहा कि अगर बातचीत रद्द हुई तो और जाने जायेंगी.

शांतिवार्ता से पाकिस्तान को फायदा

तालिबान को खड़ा करने में पाकिस्तान का बहुत बड़ा हाथ रहा है लेकिन 9/11 के हमले के बाद बहुत कुछ बदल गया. अफगानिस्तान में अमेरिका की मदद करने के एवज में पाकिस्तान को भारी भरकम आर्थिक सहायता मिलती रही. अमेरिका और तालिबान में समझौता करा कर पाकिस्तान, अमेरिका से कश्मीर मामले को सुलझाने में हस्तक्षेप चाहता है. ट्रम्प का बार बार कश्मीर में मध्यस्थता का जिक्र करना पाकिस्तान को खुश करने की ही कोशिश थी. पाकिस्तान ये भी चाहता था कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फ़ौज की वापसी के बाद वहां की सत्ता में तालिबान को भी प्रतिनिधित्व मिल जाए जिसके बाद वो अपरोक्ष रूप से अफगानिस्तान में हस्तक्षेप करता रहे.

अफगानिस्तान में भारत की स्थिति

अफगानिस्तान के लोग अपनी दुर्दशा के लिए पाकिस्तान को भी जिम्मेदार मानते हैं. उनका मानना है कि तालिबान को आर्थिक सहायता और हथियार पाकिस्तान ही मुहैया कराता है जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है. अगर शांति समझौते के बाद अमेरिकी फ़ौज अफगानिस्तान से हट जाती तो अफगानिस्तान एक बार फिर गृहयुद्ध की चपेट में आ सकता है और इसका असर वहां रह रहे भारतीयों पर पड़ेगा. युद्ध से बर्बाद हो चुके अफगानिस्तान में भारत बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण कार्य चला रहा है. भारत ने वहां की संसद का निर्माण किया. डैम और सड़कें भी बनाए हैं. अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत ने काफी निवेश किया है जिसका असर ये हुआ कि अफगानिस्तान, भारत के करीब आया. पाकिस्तान के अशांत क्षेत्र बलूचिस्तान की सीमा अफगानिस्तान से लगती है. पाकिस्तान को ये भी लगता है कि अगर अफगानिस्तान में भारत मजबूत हुआ तो उसे बलूचिस्तान में उसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा जो पूर्वी पाकिस्तान (अब के बांग्लादेश) में करना पड़ा था.

इसलिए अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता का रद्द होना पाकिस्तान के लिए बुरी और भारत के लिए अच्छी खबर है.