द वायर का जहरीला आर्टिकल, कश्मीर के बहाने दलितों को भड़काने की कोशिश

71

प्रोपगैंडा पोर्टल द वायर ने गुरुवार को एक आर्टिकल पब्लिश किया. इस आर्टिकल का शीर्षक था “After Kashmir, What Does the Hindu Right Have in Store for Dalits?” अगर हिंदी में कहें तो इसका शीर्षक हुआ “कश्मीर के बाद हिन्दू दलितों के साथ क्या करेगा?”

इस आर्टिकल में बहुत ही चतुराई से कश्मीर के बहाने दलितों को भड़काने और डराने की कोशिश की गई. ये दिखाया गया कि कश्मीर या यूँ कहें मुस्लिमों के बाद हिंदूवादी सरकार का अगला निशाना दलित हो सकते हैं. इस आर्टिकल को लिखा है चिन्नईया जनगम ने. चिन्नईया जनगम कनाडा के कार्लटन यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर हैं और साथ ही इन्होने Dalits and the Making of Modern India’ नाम से एक किताब भी लिखी है.

अब आते हैं द वायर में पब्लिश इनके आर्टिकल पर. इस आर्टिकल में चिन्नईया लिखते हैं कि 2014 के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी का एकमात्र एजेंडा रहा है वो सारे कदम उठाना जो बहुसंख्यक हिन्दू के पक्ष में हो ताकि चुनावी अंकगणित को मजबूत किया जा सके. चिन्नईया लिखते हैं कि 2014 के बाद से ही मुस्लिम और दलित डर के माहौल में जी रहे हैं . दलितों को कश्मीर के लिए, कश्मीर के साथ खड़ा होना चाहिए नहीं तो जैसे कश्मीर से आर्टिकल 370 और 35A को निकाल फेंक दिया गया उसी तरह एक दिन दलितों का हक़ आरक्षण भी छीन लिया जाएगा.

इस पुरे आर्टिकल में एक ऐसी फिक्शनल कहानी गढ़ी गई जो द वायर के प्रोपगैंडा फ़ैलाने के एजेंडे में फिट बैठता है. कश्मीर से आर्टिकल 370 के हटने के बाद जिसकी उम्मीद लिबरल और वामपंथियों ने की थी वो हुआ नहीं. वामपंथियों और लिबरल गैंग को उम्मीद थी कि कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के बाद देश के मुसलमान भड़क कर सड़क पर आ जायेंगे क्योंकि कश्मीर को कश्मीरियत नहीं इस्लाम का मुद्दा बना कर पेश किया जा रहा था अब तक. लेकिन उनकी उम्मीदें धराशाई हो गई तो उन्होंने मुस्लिम और दलितों का गठजोड़ खड़ा करने की कोशिश की. ये आर्टिकल इसी गठजोड़ की बता करता है.

इस आर्टिकल ने वामपंथी सोच के उस लेवल को उजागर कर दिया है जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता. इस आर्टिकल में ये साबित करने की कोशिश की गई है कि बहुसंख्यक हिन्दू समाज मुस्लिमों और दलितों को एक ही कैटेगरी का मानता है इसलिए चिन्नईया दलितों से आह्वान करते हैं कि वो कश्मीर के लिए खड़े हों. कश्मीरियों के लिए खड़े हों, नहीं तो जो भाजपा आज कश्मीरी मुसलमानों के साथ कर रही है वो कल दलितों के साथ करेगी.

बहुत ही चतुराई से द वायर के इस आर्टिकल में धारा 370 को रिजर्वेशन से जोड़ने की कोशिश की गई और प्रोपगैंडा फैलाने की कोशिश की, कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की हिंदूवादी नीतियों का अगला शिकार दलित होंगे.

आपके मन में सवाल आएगा दलित को क्यों भड़काया जा रहा है? तो इसका जवाब है 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से उनलोगों की दूकान बंद हो गई जो दशकों तक दलित वोटबैंक को अपनी बपौती समझते रहे. 2014 और 2019 के चुनाव परिणामों ने लिबरल और वामपंथियों के पैरों तले जमीन खिसका दी, तो इस गैंग ने अपना नया एजेंडा बनाया मुस्लिम और दलित गठजोड़ का. इस आर्टिकल में एक जगह लिखा है कि अमित शाह दलितों के जड़ को ही पूरी तरह ख़त्म करने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं क्योंकि दलित उनके एजेंडे और राजनीति की राह में रोड़ा हैं. इस आर्टिकल में अमित शाह के बारे में कई आपत्तिजनक बातें लिखी गई है.

जब से द वायर अस्तित्व में आया है इसका एकमात्र लक्ष्य है प्रोपगैंडा फैलाना और अपना एजेंडा चलाना. लेकिन फिक्शनल थ्योरी के जरिये प्रोपगैंडा फैलाते फैलाते द वायर ने उसी फिक्शनल थ्योरी और कहानियों को अपनी दुनिया मान ली है. उसे पता है असल दुनिया की हकीकत उसके लिए भयावह है. जिस पार्टी को सत्ता से हटाने के लिए उसने दिन रात मेहनत की हो वो फिर से सत्ता में आ जाए तो ये स्थिति भयावह तो होगी ही. इसलिए इस हकीकत को स्वीकार करने से अच्छा है उसी फिक्शनल दुनिया और थ्योरी को सच माना जाए जहाँ उसे कुछ उम्मीद दिखती है.