कहानी हैदराबाद के अखंड भारत में विलय की

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हैदराबाद विलय के बारे में आप सभी ने कभी न कभी तो सुना ही होगा. 17 सितम्बर 1948 में यह विलय हुआ था. हैदराबाद को भारत में शामिल कराना बिलकुल भी आसान नहीं था और काफी चुनौतियों से भरा भी था. तो आइए जानते हैं हैदराबाद के भारत में शामिल होने की पूरी कहानी

जब ब्रिटिश भारत को छोड़ रहे थे, उस समय यहाँ के 562 रजवाड़ों में से सिर्फ़ तीन कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद को छोड़कर सभी ने भारत का हिस्सा बनने का फ़ैसला किया और ये तीन अलग राष्ट्र बनाना चाहते थे. उत्पादन की दृष्टि से हैदराबाद, देश का सबसे बड़ा राजघराना माना जाता था जिसका क्षेत्रफल इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी ज्यादा था. फिर हैदराबाद के निजाम ओसमान अली खान आसिफ ने फैसला किया कि उनका रजवाड़ा न ही भारत और न पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा. भारत छोड़ने के समय अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम को पाकिस्तान या भारत में से एक में शामिल होने का प्रस्ताव दिया और तो और अंग्रेजों ने हैदराबाद को स्वतंत्र राज्य बने रहने का भी सुझाव दिया. हैदराबाद में निजाम और सेना में ऊँचे पदों पर मुस्लिम थे लेकिन वहां वहुसंख्यक हिन्दू थे. निजाम ने ब्रिटिश सरकार से हैदराबाद को राष्ट्रमंडल देशों के अंर्तगत स्वतंत्र राजतंत्र का दर्जा देने का आग्रह किया. लेकिन ब्रिटिश निजाम के इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुए.

हैदराबाद के निजाम के ना करने के बाद भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने उनसे भारत में विलय का आग्रह किया. लेकिन निजाम ने पटेल के आग्रह को खारिज करते हुए 15 अगस्त 1947 को हैदराबाद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया. हैदराबाद के निजाम के इस कदम से पटेल चौंक गए और उन्होंने उस समय के गर्वनर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन से संपर्क किया. माउंटबेटन ने पटेल को सलाह दी कि इस चुनौती को भारत बिना बल के निपटे. प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू इस सलाह से सहमत थे और वह भी इस मसले का शांतिपूर्ण समाधान करना चाहते थे. हालांकि पटेल इससे बिल्कुल असहमत थे.

इसके बाद हैदराबाद के निजाम हथियार खरीदने और पाकिस्तान को सहयोग करने की कोशिश में लग गए. सरदार पटेल को जैसे ही पता लगा तब उन्होंने कहा कि, “हैदराबाद भारत के पेट में कैंसर के समान है और इसका समाधान सर्जरी से ही होगा” इस समय तक भारत और हैदाराबाद के बीच बातचीत खत्म हो गयी थी और भारत ने उनपर हमला करने की तैयारी कर ली थी और जब भारत के पास कोई और विकल्प नहीं था तो हैदराबाद पर कार्रवाई का फैसला किया. 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने हैदराबाद पर हमला कर दिया. भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो के नाम से जाना जाता है क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज्यादा 17 पोलो के मैदान थे. भारतीय सेना का नेतृत्व मेजर जनरल जेएन चौधरी कर रहे थे. भारतीय सेना को पहले और दूसरे दिन परेशानी हुई और फिर विरोधी सेना ने हार मान ली. 17 सितम्बर की शाम को हैदराबाद की सेना ने हथियार डाल दिए. पांच दिनों तक चली कार्रवाई में 1373 रजाकार मारे गए थे. हैदराबाद के 807 जवान भी मारे गए. भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुए.

और अब इतने सालो से अब तक हैदराबाद भारत का ख़ुशी पूर्वक हिस्सा है. और अब सभी लोग इससे याद रखते है ऑपरेशन पोलो के नाम से.