बाबूलाल गौर को जिसने बनाया मुख्यमंत्री, उसी की सियासत को कर दिया हमेशा के लिए खत्म

कहानी बाबूलाल गौर के पूरे राजनीतिक जीवन की

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मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा नाम रहे है, बाबूलाल गौर। इससे पहले कि आप बाबूलाल गौर के नाम पे गौर करे आपको इनके नाम की कहानी बता देते है। फिर बाकी की बातें करते है। दरअसल बाबू लाल गौर का असली नाम बाबूराम यादव था। इनके स्कूल में  बाबूराम यादव नाम के दो बच्चे पढ़ते थे। टीचर को बड़ी कन्फ्यूजन होती थी, तो उन्होंने इनका नाम बाबूराम गौर कर दिया क्योंकि ये क्लास में टीचर की बातों को बड़े गौर से सुना करते थे। बाद क दिनों में राजनीति में आये तो बाबूराम की जगह लोग इन्हें बाबूलाल कहने लगे। फिर ये नाम प्रचलित हुआ बाबूलाल गौर। एक बार एक यादव समाज की सभा में उन्होंने इस टॉप सीक्रेट का खुलासा किया साथ ही तंज भी कसा कि यादव लिखता तो मुख्यमंत्री बनना दूर पार्टी टिकट भी न देती। खैर ये उनकी अपनी समझ और राजनीतिक तौर तरीका था।


इसे इत्तेफ़ाक़ ही कहे कि बाबूलाल गौर यूपी में पैदा हुए लेकिन सीएम बने मध्यप्रदेश के। चूंकि इनके पिताजी भोपाल में किसी मिल में काम करते थे, तो इनका बचपन वही से शुरु हुआ।2 जून 1930 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के एक गांव नौगीर में पैदा हुए बाबू लाल गौर एक दिन मध्यप्रदेश की राजनीति के केंद्र बिंदु बन जाएंगे ये किसने सोचा था। 
राजनीतिक सफर काफी लंबा रहा है इनका। भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे है। साथ ही साथ 1946 से आरएसएस से भी जुड़ गए थे। इनकी राजनीति में सक्रियता उसी दौर से शुरू हो गयी थी। लेकिन इनकी राजनीति का सितारा चमका 2004 में। जब 1 साल पहले ही मध्यप्रदेश की सत्ता पे काबिज हुई उमा भारती पर कर्नाटक के हुबली की अदालत से एक 10 साल पुराने मामले में वारंट जारी हो गया।दरअसल 10 साल बाद 2003 में मध्यप्रदेश में उमा भारती के नेतृत्व में बीजेपी प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। अभी ढंग से उमा भारती मुख्यमंत्री पद का मतलब समझ पाती उससे पहले ये मामला सामने आ गया। उन पर इस्तीफे का दबाव बनने लगा। इतना तो तय था कि मामला इतना बड़ा नही था उन्हें बरी हो ही जाना था। हवाला कांड में जिस तरह लाल कृष्ण आडवाणी के नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया और बरी होकर वापस आये, उससे उनका कद बढ़ गया। उमा भारती को भी लगा इस्तीफा देकर कोर्ट का सामना करेंगी फिर बरी होकर लौटेंगी तो उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी। इस सोच को हवा देने वाले लोगो मे बाबूलाल गौर भी शामिल थे। जिन्होंने समझाया कि ऐसा करना उनके लिए फायदेमंद रहेगा।

 
लेकिन अब उमा भारती के सामने संकट था। आखिर मुख्यमंत्री बनाये तो किसे? इस बीच उनकी नजर बाबूलाल गौर पे पड़ी। उन्होंने उनका नाम आगे किया , इसके पीछे 2 वजह थी एक तो उमा भारती उन्हें अपना विश्वास पात्र समझती थीं। दूसरा वे पिछड़ी जाति से आते थे और उनका ग्राउंड पे कोई आधार नही था। तो इससे उमा भारती को लगा कि उनके लिए खतरा साबित नही होंगे और एक संदेश भी जाएगा कि ये सरकार पिछड़ी जातियों को साथ लेकर चल रही है। 
खैर उमा भारती ने इस्तीफा दिया लेकिन बाबूलाल गौर को उन्हें गंगाजल और 21  हाथ मे लेकर कसम दिलवाई कि जब मैं बरी होके आऊं तो सीएम की कुर्सी खाली कर देना। बाबूलाल ने कसम खा लिया और 23 अगस्त 2004 को सीएम बन गए। 


अब यहाँ से शुरू हुई एक नई राजनीतिक जंग। बाबूलाल अब एक कुशल सीएम की तरह काम करने लगे। अधिकारियों को अपने पाले में लेने लगे। खासकर उन अधिकरियों पर ज्यादा मेहरबान हुए जो उमा भारती से खुश नही थे। और अपने हिसाब से शासन चलाने लगे। उमा भारती अभी इस गुमान में थी कि उनकी वापसी बड़े जोरदार तरीके से होने वाली है। लेकिन ऐसा हुआ कुछ नही जब वो कोर्ट से बरी होकर वापस आईं तो बाबूलाल गौर ने सीएम पद छोड़ने से मना कर दिया। उमा भारती के तो पैरों तले जमीन खिसक गई। कसमें वादें प्यार वफा सब बातें है बातों का क्या। ये बात यहां भी लागू हुई। सारी कोशिशें कर ली गयी लेकिन उमा भारती दुबारा मुख्यमंत्री न बन सकीं। बाद में बाबू लाल गौर के तौर तरीकों पे भी सवाल उठने लगे। उनकी शिकायत केंद्रीय नेतृत्व को मिली। उसके बाद दिल्ली से एक फरमान गया। जिसमें मध्यम मार्ग निकाला गया। न उमा भारती न बाबूलाल गौर बल्कि उस वक़्त पार्टी में महासचिव के पद पर आसीन शिवराज सिंह चौहान के रूप में मध्यप्रदेश को एक नया मुख्यमंत्री मिला।तब से लेकर आज तक क्या हुआ ये इतिहास है। और यही राजनीति है जिसने सीएम बनाया उसी की सियासत को खत्म कर बाबूलाल ने अपनी महत्वाकांक्षा तो पूरी की, लेकिन एक सबक दे गए भविष्य की राजनीति को कि सियासत हो या निजी जिंदगी यहां कोई किसी का सगा नही। इस समाज का आधार ही स्वार्थ है।

लेखक, कवि, पत्रकार, The Chaupal के सम्पादक के रूप में कार्यरत है। सोशल मीडिया पर अपने बेबाक़ राय के लिए जाने जाते है। इनकी कविताएँ और कहानियाँ समय समय पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती है। शृंगार रस इनकी रचनाओं में पसंदीदा है। राजनैतिक मामलों और इतिहास के अच्छे जानकार है। अपने प्रशसंको में प्रोपेगैंडा क़िलर के नाम से मशहूर है।