इस शायर की मजार पर बना दिया गया था टॉयलेट, अब पुरातत्त्व विभाग ने लिया संज्ञान

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इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न…. कौन जाए ‘ज़ौक़’ पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर
ये शायरी लिखने वाला दिल्ली छोड़कर तो नही गया लेकिन आज उसे दिल्ली वालों ने भुला दिया. अब शेख इब्राहिम जौक की मजार पर वीरानी छाई है. मजार की हालत कुछ समय पहले तक तो ऐसी थी कि उनकी मजार पर टॉयलेट तक बने हुए थे, कोर्ट की दखल के बाद इसे हटवाया गया और मजार पर थोडा सा ध्यान दिया गया.  जौक अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के दरबारी शायर थे. यूं तो जौक के समय कई दूसरे भी नामी शायर हुए. लेकिन इन सभी में जौक और गालिब कहीं आगे निकल गए थे. लेकिन बदलते दौर में गालिब को जो तरजीह मिली वह किसी दूसरे शायर को उतनी नहीं मिल सकी. कहा जाता है कि जौक शहंशाह बहादुर शाह जफर के शाही शायर होने के अलावा अगर किसी दो बातों के लिए याद किए जाते हैं तो उनमें एक अपने समकालीन शायर मिर्जा गालिब से अदावत यानी शत्रुता के लिए तो दूसरा अपनी शायरी के लिए… मिर्जा गालिब के साथ जौक की अदावत इस कदर थी कि जौक ग़ालिब को नीचा दिखाने का कोई मौका नही छोड़ते थे. लेकिन कहा तो ये भी जाता है कि गालिब की शायरी पर जौक जमकर दाद देने वालों में शुमार किए जाते थे.

जौक का जन्‍म 1789 में दिल्‍ली में ही हुआथा. उनके पिता शेख मोहम्‍मद रमजान जो मुगलों की फौज में सिपाही हुआ करते था. गरीबी होने के कारण शिक्षा बहुत अच्छी नही मिली. जैसे-जैसे वो बड़े होते हुए उनका रुझान शायरी की तरफ बढ़ता चला गया। धीरे-धीरे वह इसमें काफी आगे निकल गए और महज 19 साल की उम्र में दिल्‍ली के तख्‍त पर बैठे बहादुर शाह जफर के दरबार के शाही शायर बन गए. जफर, जो कि खुद बेहतरीन शायर थे उन्‍होंने जौक का खकानी ए हिंद के खिताब से भी नवाजा..जौक तुरंत शायरी बोलने में काफी माहिर हो चले थे.. इससे उन्हें लोग पसंद करने लगे थे… जौक की शायरी की सबसे खास बात थी कि उनके हर कलाम में बेहद आम और हल्‍के फुल्‍के शब्‍द हुआ करते थे. यही वजह थी कि उन कलाम जल्‍द ही लोगों को समझ आ जाया करते थे. 1854 में जौक इंतकाल फरमा गए और शायरी की दुनिया को बुलंद सितारा कहीं खो गया.

दिल्‍ली के पहाड़गंज में आज भी जौक की मजार बनी है. लेकिन आज इस पर लोगों की निगाह कम ही जाती है.. बदहाली से भरी जौक ही मजार पर अब पुरातत्व विभाग की नजर पड़ी है या कहें कि पुरातत्व विभाग की तरफ से सुध ली गयी है. अब इसे सम्मानित तरीके से स्थापित किया जाएगा.. जौक के बारे में जानकारी के लिए बोर्ड लगाए जायेंगे जिसमें उनसे जुडी बातें और जानकारियों लिखी जायेंगी.  कुछ लोगों ने इस मजार के आस पास मुशायरा करवाने की कोशिश भी की लेकिन जगह कम होने की वजह से परमिशन नही मिली.. दरअसल मजार तक पहुँचने के लिए गलियां बेहद तंग है… मजार की दीवार तक लोगों की दीवारें घिरी हुई हैं. एएसआइ के दिल्ली मंडल के अधीक्षण पुरात्वविद डॉ. केके मोहम्मद कहते हैं कि यह स्मारक पुराना किला, कुतुबमीनार जैसे उन स्मारकों में शामिल नहीं है, जहां समारोह आदि होते हैं. उनका कहना है कि इस स्मारक के अंदर और बाहर जगह की बहुत कमी है ऐसे में समारोह आदि की स्वीकृति नहीं दी जा सकती है. मगर स्मारक का पूरा ख्याल रखा जा रहा है. उम्मीद है इब्राहिम जौक के बारें में आपको ये जानकारी पसंद आई होगी.. आप छोड़े जाते हैं उनके कुछ जबरदस्त शेर के साथ..

ऐ शम्मा तेरी उम्र तवाई है एक रात

रोकर गुजार दे या हंस कर गुजार दे

रात तो वक्त की पाबंद है कट जाएगी

देखना ये है कि चरागों का सफर कितना है

जब तक मिले न थे जुदाई का मलाल था,

अब ये मलाल है कि तमन्ना निकल गई