सऊदी अरब और इरान क्यों बन बैठे एक दुसरे के दुश्मन ?

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पिछले दो महीनों में दो बार दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देश सऊदी अरब के सरकारी तेल कंपनी अरामको पर ड्रोन हमले ने पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया है. अमेरिका और सऊदी अरब दोनों इसके पीछे इरान का हाथ बता रहे हैं लेकिन इरान इससे इनकार कर रहा है. आरोप प्रत्यारोपों के बीच इस हमले की जिम्मेदारी यमन में विद्रोहियों के गुट हुती ने ली. हुती को इरान का ना सिर्फ समर्थन प्राप्त है बल्कि वो उन्हें हथियारों की सप्लाई भी करता है.

इरान और सऊदी अरब दोनों ही मुस्लिम देश है. दोनों के पास तेल का अकूत भण्डार है. दोनों देश अमीर भी हैं फिर भी ये दोनों देश लम्बे समय से एक दुसरे के खिलाफ खड़े हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि दोनों ही देश इस्लाम के अलग अलग पंथ को मानते हैं. इरान शिया बहुल है जबकि सऊदी अरब सुन्नी बहुल देश है. मध्य एशिया और खाड़ी देशों में जब भी कोई विवाद होता है तो शिया देश इरान की तरफ मदद के लिए निहारते हैं और सुन्नी देश सऊदी अरब की तरफ. दोनों देशों के बीच के विवाद के इतिहास को समझने के लिए आपको शिया और सुन्नी के बीच के विवाद को समझना होगा.

सुन्नी पैगम्बर मोहम्मद के अनुयायी है. सुन्नी उन सभी पैगंबरों को मानते हैं जिनका जिक्र कुरान में किया गया है. दूसरी ओर शियाओं का दावा है कि मुस्लिमों के नेतृत्व का अधिकार शियत अली और उनके वंशजों का ही है. शियत अली, पैगम्बर मोहम्मद के चचेरे भाई और दामाद थे.

दुनिया में कुल मुस्लिम आबादी में तकरीबन 85 फीसदी सुन्नी हैं जबकि शियाओं कि आबादी सिर्फ 15 फीसदी है. इरान और सऊदी अरब में टकराव की शुरुआत सन 1979 में हुई. 1979 वो साल था जब इरान में इस्लामिक क्रांति की शुरुआत हुई. इस क्रांति के जरिये इरान में उग्र शिया इस्लामी एजेंडे की शुरुआत हुई . इरान ने दुनिया भर में फैले शिया गुटों को समर्थन देना शुरू किया तो इसे सुन्नी सरकारों ने, खासकर खाड़ी के देशों ने एक चुनौती के रूप में लिया और सुन्नी संगठनों को बढ़ावा देना शरू किया. सुन्नी संगठन अक्सर शिया नेताओं को निशाना बनाने लगे और उनकी हत्या करने लगे.

2003 में जब अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाया तो वहां सऊदी अरब ने अपना प्रभुत्व बढाने की कोशिश की, चुकीं ईराक शिया बहुल देश है तो इरान ने वहां सऊदी के हस्तक्षेप का विरोध किया और दोनों के बीच मतभेद बढ़ने लगा.

साल 2010-11 में कई इस्लामिक देशों में आन्दोलन हुए और इस कारण राजनितिक अस्थिरता पैदा हुई. सऊदी अरब और इरान ने इस मौके का फायदा उठाने की कोशिश की और सीरिया, ईराक, यमन जैसे देश अशांत हो उठे. सीरिया में इरान ने रूस के साथ मिलकर सऊदी अरब के समर्थन वाले गुट को हटा दिया. उसके बाद इरान ने सुन्नी बहुल यमन में शिया गुट हुती को समर्थन देना शुरू कर दिया. जिसके बाद सऊदी अरब ने यमन में जंग छेड़ दी और इसके बाद इरान के साथ उसका विवाद और बढ़ गया. दोनों देश युद्ध के मुहाने पर आ खड़े हुए. अमेरिका, इजरायल जैसे देशों ने इरान के खतरे को देखते हुए सऊदी अरब को समर्थन और हथियार देना शुरू किया. जवाब में इरान ने यमन के सऊदी अरब के खिलाफ हुती गुट को समर्थन देना शुरू कर दिया. ये वही हुती गुट है जिसने सऊदी अरब में सरकारी तेल कंपनी अरामको पर बीते दिनों हमला किया.

इन हमलों के बाद एक बार फिर दोनों देश युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं.अगर दोनों देशों में युद्ध हुआ तो पूरी दुनिया पर इसका असर पड़ेगा. क्योंकि युद्ध के हालात में तेल की सप्लाई रुक जायेगी और तेल नहीं तो कुछ नहीं.