जन्मदिन विशेष: बिना लाइसेंस सेकेंड हैंड मारुति 800 चलाने निकले थे सचिन

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एक क्रिकेटर जो खुद भगवान हो गया पर भगवान को बहुत गहराई से मानता है. एक क्रिकेटर जो बहुत बड़ा आदमी होने के बाद भी अपने दोस्तों को नहीं भूला. एक क्रिकेटर जिसने अपनी प्रोफेशनल लाइफ को पर्सनल लाइफ पर कभी हावी ही नहीं होने दिया. एक क्रिकेटर जो अपने परिवार के साथ हमेशा ही जुड़ा रहा. एक क्रिकेटर जिसने सिर्फ खुद के लिए ही नहीं ज़रूरतमंदों के लिए भी पैसा कमाया.

आज उस एक क्रिकेटर का जन्मदिन है. आज जन्मदिन है क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले  सचिन तेंदुलकर का. 24 अप्रैल 1973 को पैदा हुए माहन बल्लेबाज, भारत रत्न सचिन तेंदुलकर आज उम्र के 46 वें पड़ाव पर पहुँच गए हैं.

अक्सर ऐसा देखा जाता है कि वो लोग जो सफलता के शिखर को चूम, बड़े हो जाते हैं, वो बहुत कुछ भूल जाते हैं. लेकिन सचिन को करीब से जानने वाले लोग बताते हैं कि सचिन कुछ भी नहीं भूलते और बड़े इंसान होकर भी बड़े नहीं हैं, वो बस एक अच्छे इंसान बने रहते हैं.

उनके रहन-सहन, परिवार, क्रिकेट करियर और कमाई के बारे में आपमें से बहुत से लोग जानते ही होंगे. लेकिन आज के इस मौके पर हम लाये हैं आपके लिए लाये हैं उनकी ज़िंदगी के कुछ ख़ास हिस्सों की जानकारी.

बचपन के दोस्तों, कॉलोनी और घर से है बेहद लगाव:

मुंबई के बांद्रा में एक कॉलोनी हुआ करती थी जिसका नाम था साहित्य सहवास कालोनी. इसी कॉलोनी  में सचिन ने अपना बचपन बिताया. वो लोग जो बचपन में उनके हर हुल्लड़ और हुडदंग में शामिल हुआ करते थे वो आज भी उनके दोस्त हैं. सचिन उस कॉलोनी में भले ही ना रहते हों लेकिन उनका घर आज भी उनके पास है.

वो कुछ ख़ास मौकों पर हमेशा अपने बचपन के इसी घर में मौजूद होते हैं. उन्होंने अपनी बेटी सारा का पहला जन्मदिन यहीं पर मनाया था. उनकी पत्नी अंजलि भी ‘साहित्य सहवास’ में होने वाले सभी कार्यक्रमों में सचिन का पूरा साथ निभाती हैं. सारा के पहले जन्मदिन पर पूरी कॉलोनी के लोगों को शामिल किया गया था.

सचिन किसी को नहीं भूलते और अक्सर अपने इस घर में जाकर बचपन की यादें ताज़ा कर आते हैं. वो अपनी कॉलोनी में जमकर मस्ती किया करते. उनके बचपन के दोस्त उनके बारे में बात करते हुए उनके खूब किस्से सुनाते हैं. वो सचिन के पेड़ों से फल चुराने के किस्सों के साथ-साथ ये भी बताते हैं कि कैसे सचिन खुद से बड़े लड़कों से लड़ाई मोल ले लिया करते थे.

सचिन को एक बेहतरीन इंसान बनाने वाली एक बहुत बड़ी बात जो कम ही लोग जानते होंगे वो ये है कि, सचिन के सेक्रेटरी रमेश भी सचिन के बचपन के दोस्त ही हैं. सचिन के पिता प्रोफ़ेसर और रमेश के पिता एक वाचमैन थे, लेकिन इसका असर कभी इन दोनों की दोस्ती पर नहीं पड़ा.

दोनों की दोस्ती इतनी पक्की थी कि दोनों बहुत बार एक ही थाली से खाना खा लेते. सचिन को पीने के लिए दूध दिया जाता तो वो इस गिलास को रमेश की तरफ सरका देते. एक वो दिन था और एक आज का दिन है, ऊंचा कद होने के बाद भी सचिन अपने दोस्त को भूले नहीं और दोनों आज भी साथ हैं.

एक और दोस्त हैं सचिन के दलबीर सिंह. इनका नाम तब सुर्ख़ियों में आया था जब इनका एक्सीडेंट हुआ, और इनको इलाज के लिए अहमदाबाद के एक हस्पताल में ले जाया गया. सचिन का उस दिन का शेड्यूल खासा बिजी था, लेकिन वो सबकुछ एक किनारे कर दलबीर को देखने पहुँच गए. उन्होंने दलबीर के इलाज का पूरा खर्च हस्पताल को अपनी जेब से भरा.

बड़े ही धार्मिक इंसान हैं सचिन:

साल 2014 में सचिन तेंदुलकर ने इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास ले लिया. लेकिन फिर भी उनका स्टेडियम में मौजूद होना नये क्रिकेटर्स, और दर्शकों पर जादू कर देता है.

वो एक धार्मिक इंसान हैं और इश्वर में गहरी आस्था रखते हैं. मुंबई में हुए तो सिद्धि विनायक मंदिर में चक्कर लगा आते हैं. एक-दो बार दिन में मंदिर पहुंचे तो उनको देखकर लोगों ने उन्हें घेर लिया. वो शान्ति से भगवन के दर्शन नहीं कर सके तो उन्होंने गणपति बप्पा से मिलने का दूसरा रास्ता निकाल लिया.

अब वो ऐसे वक़्त पर मंदिर जाने लगे जब वहां बहुत भीड़ ना हो. तब से अबतक वो या तो सुबह तड़के मंदिर जाते हैं, या कि रात को.

साल 2011 की 2 अप्रैल को जब भारतीय टीम विश्व कप फाइनल में जीत की तरफ बढ़ रही थी, तब  अपनी दाढ़ी बढ़ाए हुए सचिन पवेलियन में आँखें बंद कर के इश्वर से इस जीत की प्रार्थना कर रहे थे. जीतने के बाद सचिन सिद्धि विनायक मंदिर भी गए और दाढ़ी भी साफ़ करा दी.

आपने भी हर बार ये देखा ही होगा कि मैदान में उतारते वक़्त और शतक बनाने के बाद सचिन आसमान की तरफ देखते हैं. ये वो वक़्त होता है जब सचिन भगवान से कोई प्रार्थना कर रहे होते हैं, या फिर किसी बात के लिए धन्यवाद दे रहे हैं होते हैं.

ऐसे छपा था अखबार में पहली बार नाम:

पहली बार जब सचिन का नाम अखबार में छपा था तो वो बेहद खुश हुए थे. लेकिन सच ये है कि उनका ये नाम स्कोरर की वज़ह से छपा था. सचिन तब मुम्बई के स्थानीय मैच खेला करते थे और यहाँ के अखबारों का एक नियम था कि जो खिलाड़ी कम से कम 30 रन बनाएगा, उसी का नाम अखबार में छापा जाएगा.

1987 में मुम्बई में एक लोकल मैच हुआ जिसमें सचिन ने नॉटआउट रहकर 24 रन बनाए. सचिन की टीम जीत गई और मैच ख़त्म हो गया. स्कोरर ने नो बॉल, वाइड और लेग बाई से मिले 6 रन भी सचिन के खाते में जुड़वा दिए.

सचिन का स्कोर अब नॉटआउट 24 रन से बढ़कर नॉटआउट 30 रन हो गया था. अब उनक नाम अखबार में छपने लायक हो गया था, और छपा भी. सचिन का नाम अखबार में आया तो उनको जो ख़ुशी हुई, उसकी बात करते हुए वो आज भी मुस्कुरा उठते हैं.

लाइसेंस बनने से पहले ही खरीद लाये थे पहली मारुती 800:

सचिन तेंदुलकर को बचपन से ही कारों का बड़ा शौक है. और उनके इस शौक को बढ़ावा देता था साहित्य सहवास कॉलोनी में उनके घर के करीब मौजूद एक ड्राइव इन थिएटर. वो यहाँ कारों को आते जाते देखते तो उनका खिंचाव कारों की तरफ और बढ़ता जाता.

बड़ी- बड़ी और महंगी कारें हैं आज उनके पास. उनकी इन कारों में मर्सीडीज बेंज, फेरारी, पोर्श, बीएमडब्ल्यू जैसे ब्रांड्स शामिल हैं. लेकिन उन्होंने जो पहली कार ली थी, वो थी एक सेकेंड हैण्ड मारुती 800. साल था 1990 और सचिन ने इंग्लैंड दौरे में अपना पहला टेस्ट शतक जड़कर देश में वापसी की थी. पूरा देश अब उन्हें पहचानने लगा था.

उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस भले ही नहीं था लेकिन अपने देश लौटते ही उन्होंने एक सेकेंड हैण्ड मारुती 800 ज़रूर खरीद डाली. अपने एक दोस्त सुनील को लेकर वो ड्राइव पर निकले तो इस डर से उनका गला सूखा जा रहा था कि कहीं लाइसेंस ना होने की वज़ह से पुलिस वाले उन्हें रोक ना लें.

तेज़ कार चलाने के शौक़ीन सचिन ट्रैफिक के चलते मुम्बई में अक्सर रात को ही ड्राइविंग पर निकलते हैं. लेकिन विदेश में होने पर वो आराम से अपने इस शौक को पूरा करते हैं.

दानधर्म में रखते हैं भरोसा:

सचिन के पिता रमेश तेंदुलकर मराठी के साहित्यकार थे और एक कॉलेज में मराठी के ही प्रोफेसर हुआ करते थे. उनकी तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं थी इसलिए पूरा परिवार बहुत किफायत से खर्चा किया करता था. लेकिन सचिन के पिता उनको और उनके सभी भाई बहनों को दान का महत्व समझाया करते थे.

कम तनख्वाह होने के बावजूद वो खुद ज़रूरतमंदों की मदद करने से पीछे नहीं हटते थे. उनके घर में जो लड़का अखबार डालने आता था, वो उसकी पढ़ाई का खर्चा उठाते थे. काफी पहले एक कार्यक्रम में सचिन ने खुद बताया था कि, बचपन में उनके घर चौकीदार या डाकिया कोई भी आता तो उसे चाय पिए बिना कभी वापस नहीं जाने दिया जाता था.

उनके पिता का ये गुण सचिन में भी मौजूद है. वो अपने पिता को आदर्श मानते हैं और चैरिटी करते रहते हैं. वो समाजिक कार्य करने वाली बहुत सी संस्थाओं से जुड़े हुए हैं और करीब 200 बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च भी उठाते हैं.

जैसा होना वैसा बना रहना आम दुनिया में ही बड़ा मुश्किल है. लेकिन सचिन तेंदुलकर ग्लेमर और चमक-दमक की दुनिया में चोटी पर होने के बाद भी ज़मीन से जुड़े हुए हैं. उनका ये नेचर उन्हें बेहतरीन क्रिकेटर के साथ ही एक बेहतरीन इंसान भी बनाता है. हमारी चौपाल टीम की तरफ से उनको जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई.