एक वक़्त था जब अपनी बेटियों का नाम इंदिरा रखते थे यहाँ के लोग

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान के हवाई रास्ते को अंगूठा दिखाते हुये ओमान के रास्ते हुए किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हैं. वज़ह है शंघाई कॉरपोरेशन आर्गेनाईजेशन की बैठक में शामिल होना. ये पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी ने बिश्केक की यात्रा की है. साल 2015 में भी वो यहाँ की एक यात्रा कर चुके हैं.

बहुत से लोगों को प्रधानमंत्री मोदी का यहाँ जाना अच्छा नहीं लगेगा. हो सकता है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग इस यात्रा के लिए प्रधानमंत्री मोदी का मज़ाक भी उड़ाने लगे. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि आखिर क्यों प्रधानमंत्री मोदी दूसरी बार बिश्केक की यात्रा पर गए हैं? क्या आप जानते हैं कि भारत और बिश्केक के बीच सम्बन्ध क्या है? आखिर क्यों ज़रूरी था प्रधानमंत्री मोदी का बिश्केक जाना और क्या शंघाई कारपोरेशन आर्गेनाईजेशन की बैठक में शामिल होना ही एक वज़ह थी जिसके चलते मोदी बिश्केक गए हैं?

नहीं पता? तो आइये जानते हैं, भारत और किर्गिस्तान के बिश्केक का रिश्ता कोई नया नहीं है. दोनों देशों के बीच ये रिश्ता एक लम्बे वक़्त से चला आ रहा है. फिर चाहे वो राजनीतिक रिश्ता हो, शैक्षिक रिश्ता हो, धार्मिक रिश्ता हो या कि फिर व्यापारिक. दोनों देशों को धर्म, सिक्षा, राजनीति और व्यापार एक लम्बे अरसे से जोड़े हुए है.

मिश्केक, फ्रूंज़ और बिश्केक, ये सभी वो नाम हैं जो शहर के बसने से लेकर अबतक इस जगह को दिए जा चुके हैं. दुनिया के किसी भी शहर की तरह ही यहाँ भी शासन बदलता गया शासक बदलते गए और बदलते गए शहर के नाम.

खैर साल 2019 के चुनाव के बाद जब 30 मई को प्रधानमत्री मोदी ने जब दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तो किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सोरोनबाय शारिपोविच जीनबेकोव इस शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद रहे. उनका दिल्ली में मौजूद होना यह बताता है कि भारत और किर्गिस्तान के बीच राजनीतिक संबंध काफी पक्के हैं.

इस बार की बिश्केक यात्रा में सम्मलेन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुलाक़ात चीन और रूस के नेताओं से होगी. ऐसे में तीनो ही देशों के बीच आतंकवाद के मसले पर भी बात ज़रूर ही होगी. ये पहली बार होगा जब मसूद अजहर को इंटरनेशनल टेररिस्ट घोषित करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग आमने सामने होंगे, और साथ ही आमने-सामने होंगे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वाल्दिमिर पुतिन.

आतंकवाद के खिलाफ चीन के अचानक बदले रुख के बाद शायद दोनों देश एक-दूसरे के साथ मिलकर आतंकवाद के मसले का हल निकालने के लिए किसी योजना पर बात करें. लेकिन क्या कुछ होगा ये बातें तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.

फिलहाल हम बात कर रहे हैं बिश्केक और भारत के संबंधों पर तो कोई भी जानकार इंसान इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि भारत किर्गिस्तान के बिश्केक से सेना के मतलब का बहुत सा सामान तो खरीदता ही है साथ ही राजमा भी खरीदता है. और ये बात भी सच है कि किर्गिस्तान के बिश्केक और भारत के आपसी रिश्ते को मजबूत करने में राजमा एक अहम् भूमिका निभाता है. उज्बेकिस्तान और कज़ाकिस्तान की तरह ही किर्गिस्तान भी कभी सोवियत संघ का हिस्सा रहा है, और प्राकृतिक संपदा के मामले में बहुत संपन्न देश नहीं है. यही वज़ह है कि देश की अर्थव्यवस्था ने बहुत बुरे वक़्त को भी झेला है.

लेकिन किर्गिस्तान और बिश्केक की एक बात जो बहुत अच्छी है वो है इसके मेहनतकश लोग. ये मेहनतकश लोग इस देश को कृषि और पशुपालन की मदद से ऊंचाई पर ले जाते हैं. यहाँ की चूय वैली अनाज, फल और सब्जियों की भारी पैदावार के लिये जानी जाती है.

बहुत सी तुर्किश कम्पनियां हैं जो यहाँ पर राजमा की पैदावार करती हैं. यहाँ की ज़मीन राजमा की पैदावार के लिए काफी अनुकूल है. यहाँ पैदा होने वाला राजमा बाहरी देशों को निर्यात किया जाता है, और जिन देशों को ये राजमा निर्यात किया जाता है, भारत उन देशों में से एक है.

एक शहर है यहाँ तलास. इस शहर को लोग यहाँ होने वाली आलू की पैदावार के लिए जानते हैं. यही वज़ह है कि इस शहर में भारत की तरफ से आलू के चिप्स बनाने वाली एक फैक्ट्री खोल रखी है.

बिश्केक एजुकेशनल इंस्टिट्यूटस के लिए भी दुनिया में एक अलग पहचान रखता है. रूस, तुर्की, अमरीका और चीन जैसे देशों ने बिश्केक में अपनी यूनिवर्सिटीज बना रखी हैं. इन सभी देशों की तर्ज़ पर भारत ने भी यहाँ अपनी एक यूनिवर्सिटी बनाने का वादा किया था जो अभी तक अधूरा है. यहाँ के मेडिकल कॉलेजों से बेहतरीन डॉक्टर्स निकलते हैं. यही वज़ह है कि यहाँ के अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में करीब 1000 से ज्यादा भारतीय छात्र मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं.

किर्ग़िस्तान के विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में 1,000 से अधिक भारतीय छात्र मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दौरे के बाद शायद भारत यहाँ अपनी यूनिवर्सिटी बनाने के अपने वादे को पूरा करने पर भी काम करे. अगर ऐसा होता है तो भारत और बिश्केक के रिश्तों में और मजबूती आयेगी.

प्राकृतिक संपदा में कमज़ोर बिश्केक ने एक ऐसा वक़्त भी देखा है जब इसे लोग इसे सोवियत संघ का स्विट्ज़रलैंड कहा करते थे. सोवियत संघ तब टूटा नहीं था और देश इससे कटकर अलग नहीं हुए थे. बिश्केक की खूबसूरत वादियाँ लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचती थीं और अपनी इसी ख़ूबसूरती के चलते शहर सोवियत का स्विट्ज़रलैंड कहलाता था.

ऐसा नहीं है कि ये शहर अब खूबसूरत नहीं रहा है. इसकी ख़ूबसूरती बरकरार है, बस सोवियत संघ नहीं रहा है. संघ रहा हो या नहीं मगर शहर का नक्शा और पुरानी इमारतें आज भी सोवियत आर्किटेक्चर की याद दिलाती हैं.

सोवियत संघ में शामिल रहा ये शहर सोवियत आर्किटेक्चर के ग्रिड पैटर्न पर बसा है. इस पैटर्न में बड़े-बड़े बागों के स्थ शहर में दोनों तरफ पेड़ मौजूद होते हैं. शहर अब आधुनिक होने लगा है, यहाँ की इमारतें आधुनिक होने लगी हैं लेकिन फिर भी इसकी पुरानी इमारतें अपने ऊपर से सोवियत युग का नाम हटने ही नहीं देतीं.

स्टॅलिन के वक़्त इस शहर में करीब 80 देशों के लोगों को जबरन बसाया गया. तब से इनके परिवार आजतक यहाँ बसते हैं. ये अकेला शहर राशियन, जर्मन, उज़बेक, यहूदी, कोरियाई, उइगर, अजारी, यूक्रेनी, तुंगन, दागिस्तानी और आर्मेनियन जैसे ना जाने कितने देश के लोगों से आबाद है.

यही वज़ह है कि इस देश में बहुत से ऐसे रेस्तरां हैं जो अलग-अलग देशों का खाना परोसते हैं. यहाँ बहुत से ऐसे रेस्तरां हैं जो रूसी, चीनी, यूरोपियन और भारतीय खाना परोसते हैं. शहर में मुख्य रूप से रशियन ही बोली जाती है लेकिन अब वक़्त के साथ अंग्रेज़ी भी रोज़मर्रा की भाषा बनी जा रही है.

यहाँ पर कुछ ऐसे भारतीय रेस्तरां भी हैं जो पश्चिम के लोगों में काफी जाने-माने हैं और इनका खाना सभी बहुत पसंद करते हैं.

एक और चीज़ हैं इस शहर के पास जो अंग्रेजों जैसी है. इस शहर के बीचोबीच एक इमारत है जिसका नाम है वाइट हाउस. हाँ ये उस वाइट हाउस जितनी बड़ी और खूबसूरत नहीं है लेकिन शहर में अपनी एक अलग जगह रखती है. इस वाइट हाउस के ठीक सामने एक मूर्ति भी लगी है पौराणिक राजा मानस की.

प्रधानमंत्री मोदी के रुकने का इंतजाम इसी शहर में किया गया है. वो यहाँ स्टेट कॉटेज में रुकेंगे जो कि अला-अरछा की बर्फ से लदी पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है.

साल था 1941 बौर ओडेसा मिलिट्री एविएशन पायलट्स स्कूल को फ्रूंज में फिर से बनाया गया. इस बार इसे एक नया नाम दिया गया फ्रूंज़ मिलिट्री स्कूल फॉर यूएसएसआर एयरफोर्स पायलट. शीत युद्ध हुआ तो इस स्कूल से कई बेहतरीन पायलट्स निकले. इसी स्कूल ने भारत को भी बहुत से बेहतरीन एयर फ़ोर्स ऑफिसर्स दिए. और इन्ही बेहतरीन ऑफिसर्स में से एक हैं एयर मार्शल दिलबाग सिंह.

यहाँ से सिर्फ 20 किलोमीटर की दूरी पर ही रूस ने अपना एयरबेस बना रखा है. एक और बात है जो बिश्केक को भारत से जोड़ती है. यहाँ ही बनी है एक बेहतरीन सैन्य साजो-सामन बनाने वाली कम्पनी दास्तान. ये वही दास्तान है जो इलेक्ट्रिक टॉरपीडो बनाने के लिए जानी जाती है.

इस कम्पनी में ही मॉडर्न ऑक्सीजन टॉरपीडो 53-65KE और इलेक्ट्रिक टॉरपीडो SET-92HK बनाई जाती है, और यही वज़ह है कि इंडियन एयरफोर्स और दास्तान के सम्बन्ध काफी गाढ़े हैं. सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान रूस ने यहाँ औद्योगिकीकरण की कोशिश के चलते बहुत सी फैक्ट्रियां लगाईं. इन्ही बहुत सी कंपनियों में से एक है लेनिन वर्क्स. लेनिन वर्क्स कारतूस बनाती है. हर तरह की बंदूकों के कारतूस. भारत को इस कम्पनी के कारतूसों के बड़े खरीददारों में गिना जाता है.

इस शहर और भारत की दोस्ती तब की है जब ये सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था. ये बात 1950 नके करीब की है जब इंदिरा गांधी एक बार फ्रूंज़ गए थीं. उस वक़्त यहाँ के लोग उनसे इतने प्रभावित हुए कि अपनी बच्चियों का नाम तक इन्दिरा रखने लगे. इंदिरा नाम बिश्केक में आज भी सुनने को मिल ही जाता है.

ये सम्बन्ध बस इतना ही नहीं है. इसके बाद साल 1985 में राजीव गांधी का भी बिश्केक जाना हुआ तो उन्होंने यहाँ के चौराहे पर एक पेड़ रोप दिया. इसके बाद आया साल 1992 और बिश्केक में भारतीय मिशन की शुरुआत हुई, और भारत बिश्केक में अपना राष्ट्रीय झंडा फहराने वाले पहले राष्ट्रों में से एक बना.

इसके बाद बिश्केक से भारत के सम्बन्ध दिन पर दिन गाढ़े होते गए. सन 1995 में किर्गीज संसद के दोनों सदनों के संयुक्त सत्र को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने भी संबोधित किया.

अगर थोड़ी दूर तक इतिहास में चला जाए तो पता चलता है कि भारतीय व्यापारियों ने सिल्क रूट की मदद से बौद्ध धर्म को यहाँ तक पहुंचा दिया था, और यहाँ की चुय घाटी में ग्रीकों-बौद्ध धर्म, गांधार और कश्मीरी बौद्ध धर्म के पुरातात्विक अवशेष आज भी देखने को मिलते हैं.

ये सारे अवशेष सिल्क रूट पर ही मौजूद हैं. ये पुरातात्विक अवशेष चीन और भारतीय यात्रियों को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं. यहाँ के बहुत से बौद्ध स्थानों का सम्बन्ध कश्मीर के बौद्ध केन्द्रों में से था.

एक और संबंध रहा है भारत और बिश्केक के बीच जो बनाया था 12वीं सदी के जाने माने सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने. इन्ही संत ने दिल्ली में चिश्ती सिलसिले की शुरुआत की. दिल्ली के महरौली में उनकी दरगाह है और इस दरगाह पर हर साल उनकी याद में एक उर्स का आयोजन किया जाता है.

बिश्केक से करीब 220 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील इस्केक-कुल. इस झील के पास ही मौजूद है यूटीआर यानी उलान टॉरपीडो रेंज. इस रेंज को पनडुब्बियों का परीक्षण करने के लिए रूस द्वारा डेवेलप किया गया. इंडियन नेवी साल 1997 से यहाँ अपने प्रोटोटाइप टारपीडो के परीक्षण में जुटी है. और हर साल भारत की तरफ से यहाँ करीब 20 परीक्षण तो किये ही जाते होंगे.

कुल मिलाकर बिश्केक बहुत से मामलों में भारत का दोस्त बनकर सामने आता है. और इस बार तो ये नए-नए दोस्त बन रहे चीन को भी भारत से संभलकर मिलने का मौक़ा दे रहा है. ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का बिश्केक जाना बिलकुल सही सा लगता है. हमें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी केइस सम्मलेन में शामिल होने के बाद बहुत से नए रास्ते खुलेंगे.

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