ऑटो सेक्टर में आई सुस्ती के कारणों का विश्लेषण

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ऑटो इंडस्ट्री में सुस्ती के कारणों पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर जो बयान दिया उसपर विपक्ष का हंगामा अब तक शांत नहीं हुआ है. भारत में एक बहुत बुरी आदत है कि किसी के बयानों पर तुरंत निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं, उसे समझने की कोशिश नहीं करते कि उसने किस सन्दर्भ में दिया है या फिर यूँ कहें कि निर्मला जी अपनी बातों को ठीक से लोगों तक पहुंचा नहीं पायीं.

हम वित्त मंत्री का चाहे लाख मज़ाक उड़ायें लेकिन इस सच को नकार नहीं सकते कि बड़े शहरों में पार्किंग और ट्रैफिक की समस्या ने लोगों को खूब परेशान किया है. नोएडा और गुडगाँव में तो पार्किंग ढूँढने के चक्कर में कई बार 2-2 किलोमीटर तक चक्कर लगाना पड़ता है. पार्किंग के चक्कर में दिल्ली में रोडरेज की घटनाएं बढ़ गई है, कई जगह हालात तो इतने विकट हैं कि लगता है कहीं अगला विश्व युद्ध पार्किंग के लिए ही न हो. मैं दिल्ली-NCR का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मैं यहाँ रहता हूँ और खुद भुक्तभोगी हूँ. कई बार मैंने कार छोड़ कर ओला-उबर में ट्रेवल किया है.

सिर्फ ओला उबर ही क्यों? पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बढती सुविधा के कारण भी लोग अपने कार खरीदने के आइडिया को ड्रॉप कर रहे है. मैंने ऐसे कई लोगों से बात की जो ये कहते हैं कि कार लेना तो चाहते हैं लेकिन समस्या पार्किंग और ट्रैफिक की है. जितनी देर पीक आवर में अपनी कार से दिल्ली से गुडगाँव पहुँचने में लगता है उतनी देर में आदमी मेट्रो से गुडगाँव जा कर फिर वापस दिल्ली लौट आये. कई बड़े शहरों में मेट्रो ने दस्तक दे दी है और कई बड़े शहरों में इसका काम तेजी से चल रहा है. दिल्ली –एनसीआर में मेट्रो का जाल जिस तरह से बिछा है उसने लोगों को कार छोड़ पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने को प्रोत्साहित किया है. कई लोग ऐसे हैं जो इलेक्ट्रिक कारों का इंतज़ार कर रहे हैं, जबकि अभी इलेक्ट्रिक कारों का कहीं अता पता भी नहीं है और ना ही कोई डेडलाइन है कि वो कब तक आएगी.

सबसे अजीब विडम्बना तो ये है कि जो लोग कुछ दिनों पहले तक ये कहते फिर रहे थे कि कारों का इस्तेमाल कम होना चाहिए, प्रदुषण काफी बढ़ गया है, वो भी अब ऑटो इंडस्ट्री की सुस्त रफ़्तार को लेकर चिंतित हैं. अरे भाई तो जब तुम सरकार को कोस रहे थे कि सड़कों पर कारों को नियंत्रित करे, मोटर व्हीकल से जुड़े नियम लाये ताकि प्रदुषण कम हो, लोगों से कह रहे थे कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें तब तुम्हे इसका अंदाजा नहीं था कि इसका असर ऑटो सेक्टर पर पड़ेगा? कुछ सोचना नहीं है बस मोर्चा ले कर निकल पड़ना है. पोल्यूशन बढ़ रहा है तो कारों की बिक्री नियंत्रित करो और कारों की बिक्री कम हो गई तो क्यों कम हो गई? कहीं चैन नहीं है लोगों को.

ऐसे में जब देश की आधी से ज्यादा आबादी युवाओं की है तो ये देखना भी जरूरी हो जाता है कि युवाओं का ट्रेंड्स किस तरफ है. युवाओं में भी कारों को लेकर क्रेज कुछ कम हुआ है. युवा कारों पर नहीं इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स पर खर्च करना चाहते हैं. हर साल लांच होते 1,00,000 रुपये तक के अपग्रेडेड मोबाइल को लेकर जो क्रेज युवाओं में है वो क्रेज आज कल कार को लेकर नहीं दिखाई देता. मैं आपने फ्रेंड सर्किल और आस पास अपने हम उम्र कई ऐसे युवाओं को देखता हूँ जो हर साल अपने गैजेट्स बदलते हैं. लेकिन इस बात पर भी हमें गौर करना होगा कि कारों की बिक्री बंद नहीं हुई है बल्कि कम हुई है. गंभीरता से ये आंकलन करना होगा कि किस सेक्टर के ग्राहक किस सेक्टर की तरफ गए. इससे हम इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि किस सेक्टर में आई सुस्ती के कारण किस सेक्टर में ग्रोथ हुआ है. सिर्फ बयान सुन कर उछलने से न तो हम किसी नतीजे पे पहुंचेंगे और हमें न कोई हल मिलेगा.