पिता ड्राईवर और माँ चाय के बागानों में मजदूरबेटा बन गया मंत्री

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30 मई 2019 की शाम, डिब्रूगढ़ के सांसद रामेश्वर तेली ने जब मोदी सरकार में कैबिनेट राज्यमंत्री की शपथ ली तो उनके नाम ने मीडिया को अपनी तरफ खींच लिया. लोग गूगल करने लगे कि आखिर कौन है ये नेता जिसका पहले कभी नाम तक नहीं सुना गया.

उनके बारे में जिसने भी जाना वो दंग रह गया और उनकी सादगी को देखकर उनका कायल हो गया. सिर्फ अभीअभी उनको जानने वाले लोगों के साथ ही ऐसा नहीं हुआ बल्कि वो लोग भी उनकी सादगी और मुस्कुराते हुए चेहरे के कायल हैं जो उनके क्षेत्र से हैं, और उनको सालों से जानते हैं.

10 सालों तक विधायक, पांच सालों तक सांसद रहें के बाद इसबार राज्यमंत्री बने रामेश्वर तेली अब तक खेतों में सामान ढोने का ठेला खींच लेते थे. वो बांस और टिन से बने हुए एक घर में अपनी माँ के साथ ही रहते हैं.

तो आइये आपको बताते हैं उनके बारे में कुछ ख़ास बातें.

सालों पहले छत्तीसगढ़ की तेली जनजाति से एक परिवार, चाय के बागानों में मजदूरी करने के लिए असम में बस गया. आर्थिक तंगी में जी रहे इसी परिवार में कुछ पीढ़ियों बाद बुद्धू तेली और दुक्ला तेली के घर एक बेटा पैदा हुआ जिसका नाम उन्होंने रखा रामेश्वर तेली.

बुद्धू तेली ड्राईवरी करते थे और दुक्ला तेली चाय के बागानों में मजदूरी. यही दो साधन थे जिनसे उनके परिवार की रोटी चलती थी. तंगी में जी रहे इस परिवार में रामेश्वर के बाद उनके तीन और छोटे भाई-बहन हुए. और कम आय के चलते इन चारों भाई-बहनों की ज़िंदगी भी तंगी में ही कटने लगी.

ऐसे हालातों में रामेश्वर तेली अपने परिवार की मदद के लिए कभी पानसुपारी बेचते तो कभी सड़क किनारे सब्जी. यही तंगहाली और जिम्मेदारियां रहीं जिनके चलते वो बहुत ज्यादा पढ़ाई तक ना कर सके.

लेकिन जितनी भी पढ़ाई की वो मन से की. लोगों के लिए काम करने का जज्बा रामेश्वर में शुरू से था इसलिए वो चाय जनजाति स्टूडेंट्स यूनियन के नेता बन अपनी जनजाति के लिए काम करने लगे.

लम्बे वक़्त तक काम करते रहने के बाद साल 1999 में रामेश्वर भारतीय जनता पार्टी से जुड़े. उस वक़्त असम में कांग्रेस एक बड़ी पार्टी बनकर आगे बढ़ रही थी और भारतीय जनता पार्टी की हालत खस्ता थी.

उस वक़्त असम में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष हुआ करते थे राजेन गोहेन. कमज़ोर पार्टी होने के चलते पार्टी की टिकट उन दिनों आसानी से मिल जाया करती थी. साल 2001 आते-आते रामेश्वर तेली चाय जनजाति वालों के बीच एक जाना-माना नाम बन चुके थे.

उन दिनों दुलियाजान सीट असम में कांग्रेस का अभेद किला मानी जाती थी. ऐसा कहा जाता था कि इस सीट से कांग्रेस को हरा पाना मुमकिन ही नहीं है. 2001 के विधानसभा चुनाव में रामेश्वर तेली को भारतीय जनता पार्टी से टिकट दे दिया गया और उन्होंने इस सीट को भारी बहुमत से जीत लिया.

इसके बाद अगले चुनाव में भी इस सीट से रामेश्वर ही जीते लेकिन साल 2011 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. उनके विरोधियों ने कहा कि उन्होंने विधायक बन क्षेत्र का विकास नहीं किया और समर्थकों का मानना है कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने के चलते उन्हें ऐसा मौक़ा नहीं मिला.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने रामेश्वर को डिब्रूगढ़ से सांसद का टिकट दिया और रामेश्वर ने पार्टी को दी डिब्रूगढ़ से अपनी जीत.

रामेश्वर तेली खुद भी चाय जनजाति से ही हैं. वो ऑल असम टी ट्राइब स्टूडेंट्स यूनियन में छात्रनेता रहे, और यहीं से उन्होंने अपने लिए राजनीति की नींव डाली. जब वो छात्र राजनीति में थे तभी उनके इलाके में उनकी पकड़ मज़बूत हो गयी थी.

इस बार, यानी 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार में रामेश्वर तेली को Ministry of Food Processing Industries के राज्यमंत्री की कमान सौंपी गई है. खेतों में ठेला खींचने वाले, बचपन में सड़क किनारे सब्जी बेंचने वाले रामेश्वर तेली के लिए ये एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है.

रामेश्वर तेली के पिता अब बुद्धू तेली अब इस दुनिया में नहीं हैं. रामेश्वर के चाचाओं में से कोई ठेला चलता है, कोई गैस सिलिंडर पहुंचाता है, तो कोई लोगों के घरों में अखबार डालने जाता है.

एक चर्चित मीडिया संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार रामेश्वर को जब मंत्रीपद दिया गया तो उनकी माँ दुक्ला बहुत खुश हुईं. वो रामेश्वर के पद के बारे में बहुत कुछ नहीं जानती लेकिन फिर भी उन्होंने रामेश्वर से कहा कि,

‘तुम जैसे पहले थे वैसे ही रहना और सबके लिए काम करना.’

48 साल के रामेश्वर तेली के लिए ये ज़िम्मेदारी एकदम नई है. एक चर्चित मीडिया संस्थान को दिए अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वो Ministry of Food Processing Industries की केन्द्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल से विभाग के बारे में सीख रहे हैं. साथ ही अधिकारियों से भी जानकारी ले रहे हैं, साथ ही. वो हर तबके के लिये बराबर सोचना चाहते हैं.

रामेश्वर तेली की ज़िंदगी कितनी सादगी और ईमानदारी से भरी है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि 2011 में चुनाव हारने के बाद उन्होंने खर्चा चलाने के लिए मुर्गी पालन शुरू कर दिया.

लेकिन एक बात ये भी सच है कि जिसकी तारीफें बहुत ज्यादा होती हैं उसी की बुराइयां भी सबसे ज्यादा की जाती हैं. रामेश्वर तेली के लिए भी क्षेत्र में ऐसा कहा जाता है कि वो मुस्लिमों के प्रति भेदभाव करते हैं, लेकिन बीबीसी को दिए अपने एक इंटरव्यू में वो कहते हैं कि,

“ऐसा बस कुछ लोगों की सोच में ही है. मोदी सरकार की उज्ज्वला योजना के तहत सबसे ज्यादा सिलिंडर उन्होंने मुस्लिम बहनों को ही बांटे हैं.”

असम में हिमंत विश्व शर्मा और सर्वानंद सोनोवाल जैसे बड़े भाजपा नेताओं के होने के बाद भी शायद रामेश्वर तेली की यही ईमानदारी और सादगी उन्हें केन्द्रीय राज्यमंत्री की कुर्सी तक खींच ले गयी. लेकिन अब ये कुर्सी मिल जाने के बाद उनके ऊपर बहुत सी ज़िम्मेदारियाँ भी गयी हैं.

उन्हें मंत्रालय संभालने के साथ-साथ चाय जनजाति के मजदूरों की खस्ता हालत को सुधारने के लिए भी काम करना होगा, क्योंकि वो खुद इस जनजाति से हैं और बदतर जीवन जी रहे उनकी जनजाति के लोगों को उनसे बहुत उम्मीदें भी हैं.

अब अगर ऐसे में वो अपने क्षेत्र में जनजातियों और अल्पसंख्यकों के लिए कुछ अच्छा कर जाते हैं तो फिर ये बात तो निश्चित है कि वो असम की राजनीति का एक बड़ा नाम बनकर उभरेंगे. हमारा चौपाल परिवार रामेश्वर तेली को अभी के लिए बहुत-बहुत बधाई और भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएं देता है.

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