राखीगढ़ी में मिले नरकंकालों के रिसर्च से खुलासा, बाहरी और आक्रमणकारी नहीं थे आर्य

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भारत के मूलनिवासी कौन है इस बात को लेकर लम्बे समय से बहस होती रही है. अंग्रेजों के समय से ही इस थ्योरी को परोसा गया कि आर्य बाहर से आये थे और आक्रमणकारी थे. बाद में देश के वामपंथी इतिहासकारों ने भी इस मान्यता को बढ़ावा दिया कि आर्य बाहर से आये थे. लेकिन हरियाणा के राखीगढ़ी में खुदाई में मिले नरकंकालों पर हुए रिसर्च ने इस थ्योरी की धज्जियाँ उड़ा दी है कि आर्य आक्रमणकारी और बाहरी थे.

साल 2015 में वैज्ञानिकों ने हरियाणा के राखीगढ़ी में खुदाई शुरु की. राखीगढ़ी के आसपास 300 एकड़ के इलाके में खुदाई चली और करीब 4500 साल पुराने कंकाल मिले. राखीगढ़ी को सिंधु घाटी सभ्यता का बड़ा केंद्र माना जाता है.

3 सालों तक इन नरकंकालों के डीएनए पर रिसर्च किया गया और फिर ये निकल कर सामने आया कि आर्य बाहर से नहीं आये थे बल्कि यहीं के मूलनिवासी थे. इस रिसर्च में ये भी खुलासा हुआ है कि यहाँ के लोगों ने ही कृषि और पशुपालन की शुरुआत की थी। इसके बाद ये ईरान व इराक होते हुए पूरी दुनिया में पहुंची.

इस रिसर्च को करने वाली टीम में भारत के पुरातत्वविद और हारवर्ड मेडिकल स्कूल के डीएनए एक्सपर्ट शामिल थे. रिसर्च के बाद साइंटिफिक जनरल ‘सेल अंडर द टाइटल’ नाम से रिपोर्ट पब्लिश की गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि राखीगढ़ी में जो नरकंकाल मिले थे, वो करीब 4500 साल पुराने थे. उनके डीएनए के रिसर्च के बाद सामने आया कि 12 हजार साल से एशिया का एक ही जीन रहा है. राखीगढ़ी के रहने वाले लोगों का मध्य एशिया के लोगों से कोई संबंध नहीं था. भारत में विदेशियों के आने की वजह से जीन में मिक्सिंग होती रही. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर हड़प्पा सभ्यता के बाद आर्यन बाहर से आए होते तो अपनी संस्कृति साथ लाते. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. उन्होंने अपनी संस्कृति को यहीं पर विकसित की.

इस नए खुलासे से उन लोगों को तगड़ा झटका लगा है जो आर्यों को आक्रमणकारी और बाहरी बताया करते थे. आर्य आक्रमणकारी और बाहरी थे, इस थ्योरी पर तो दक्षिण भारत की पूरी राजनीति टिकी हुई है. द्रविड़ हमेशा ये कहते आये हैं कि आर्यों ने उनपर हमला किया और उन्हें खदेड़ दिया जिसके बाद वो दक्षिण भारत में बसें. लेकिन नए रिसर्च में सामने आया है कि आर्य और द्रविड़ एक ही थे.

आर्यों को आक्रमणकारी साबित करने अंग्रेजों के द्वारा गढ़े गए शोध का भी बहुत बड़ा योगदान रहा. मैक्समूलर ने भारत में आर्यन इन्वेजन थ्योरी को लागू करने का काम किया था. भारत की सरकारी किताबों में आर्यों के आगमन को आर्यन इन्वेजन थ्योरी कहा जाता है. इन किताबों में आर्यों को घुमंतू या कबीलाई बताया जाता है. यह ऐसे खानाबदोश लोग थे जिनके पास वेद थे, रथ थे, खुद की भाषा थी और उस भाषा की लिपि भी थी. शुरू में ये तथ्य दिए गए कि आर्यों ने ही हड़प्पा और सिन्धुघाटी सभ्यता का अंत कर दिया लेकिन बाद में हुई खुदाई और रिसर्च में ये तथ्य झूठे साबित हुए क्योंकि हड़प्पा में मिले कंकालों पर ऐसे कोई निशान नहीं मिले जो इस तथ्य की पुष्टि करें कि किसी लड़ाई या हमले में उनकी मौत हुई हो.

ऐसा तो आज के युग में भी संभव नहीं है कि कोई बाहरी सभ्यता किसी स्थानीय और पहले से समृद्ध सभ्यता को नष्ट कर दे. जबकि आज के युग में तमाम सुविधाएँ हैं. फिर वैदिक काल में इतनी बड़ी संख्या में आर्य बाहर से आकर समृद्ध हड़प्पा सभ्यता को नष्ट कर के अपनी सभ्यता स्थापित कर दें. ये कोरी कल्पना के अलावा और कुछ नहीं.

आर्य आक्रमणकारी थे इस तथ्य को भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने भी खूब प्रचारित किया. एक पुरानी कहावत है कि अगर किसी पेड़ का जड़ हिल जाये तो उसका सूख जाना निश्चित है. भारतीय सभ्यता का इतिहास बहुत गहरा है और उसकी जड़ों को हिलाने की कोशिशें हमेशा से जारी है. लेकिन अब सच से पर्दा उठने लगा है.