भारतीय राजनीति का सबसे बदकिस्मत योद्धा

0
44

वरुणेन्द्र का शेर है कि,

कभी कुछ पल में उगना है, कभी चुप डूब जाना है,

देश की ये सियासत, सूरजों का आना जाना है.

ये शेर बताता है कि राजनीति अनिश्चितताओं से भरी होती है. ये किसी की अपनी नहीं होती. ये भी एक खेल की तरह है. किस्मतों के खेल की तरह. यहाँ कब कौन नीचे जाए कब कौन ऊपर, पता नहीं. आज हमारी राजनीति की ये कहानी भी ऐसे ही एक नेता की कहानी है.

कांग्रेस के एक नेता रहे हैं एन.डी. तिवारी यानी नारायण दत्त तिवारी. वो अब इस दुनिया में तो नहीं हैं लेकिन राजनीतिक गलियारों में उनके चर्चे तब भी होते थे, अब भी होते हैं और आगे भी होते रहेंगे. उनके बारे में बात करते हुए ज्यादातर लोग उन्हें चचा एनडी तिवारी कहकर संबोधित करते हैं.

18 अक्टूबर 1925 को उत्तराखंड, नैनीताल के बलूती गाँव में एन.डी. तिवारी का जन्म हुआ था. अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद नारायण दत्त तिवारी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी पहुंचे और यहाँ से उन्होंने पोलिटिकल साइंस में एमए किया और फिर वकालत.

लेकिन ये सब करने के बाद भी असलियत में एनडी तिवारी पत्रकार बनना चाहते थे. जूनून था उनमें पत्रकार बनने का. और उनके अन्दर तो पत्रकारों वाला एक गुण भी था कि वो खुद को हमेशा पॉलिटिकली करेक्ट साबित करने की कोशिश किया करते थे.

Source-Deccan herald

वो जब युवा थे तब बहुत तेज़-तर्रार युवा थे. यही वज़ह है कि हर मसले पर आगे रखे जाते थे. साल 1947 में जब देश आज़ाद हुआ तब चचा एनडी तिवारी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाई और राजनीति दोनों एक साथ कर रहे थे.

आज़ादी के बाद नारायण दत्त तिवारी को यूनिवर्सिटी में ‘छात्रसंघ का पहला अध्यक्ष’ चुना गया. इसके बाद नारायण दत्त तिवारी राजनीति में आगे बढ़े तो फिर पीछे हटे ही नहीं. उन्होंने राजनीति में एक लंबा रास्ता चल डाला. वो अलग बात है कि उनका ज्यादातर पॉलिटिकल जीवन कांग्रेस की छाँव तले बीत गया.

इस दौरान वो संगठन और सरकार दोनों के महत्वपूर्ण पदों पर काबिज़ रहे. वो योजना आयोग के उपाध्यक्ष बने, उद्योग मंत्री बने, वित्त मंत्री बने और वाणिज्य पेट्रोलियम मंत्री भी बने. लेकिन कांग्रेस में रहते हुए ही उनके जीवन में एक वक़्त वो भी आया था जब उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर अपनी अलग पार्टी बना ली थी.

ये साल 1995 का था और उनकी ये पार्टी सियासत के ऊंचे-नीचे रास्तों पर अपने पाँव जमाकर चल नहीं पाई और रपटकर गिर गई. चोट आई तो एनडी तिवारी चचा ने फिर से अपने पुराने घर का रुख किया. करीब 2 साल बाद ही वो फिर से कांग्रेस मे घुस तो आए, लेकिन यहाँ लौटकर उन्हें ये भी पता चला कि फिलहाल उनके लिए कोई भी केन्द्रीय भूमिका नहीं है.

एनडी तिवारी एकमात्र ऐसे नेता थे जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री रहे. वो तीन बार यूपी से और एक बार उत्तराखंड से मुख्यमंत्री रहे. लेकिन इस सब के अलावा उनके व्यक्तित्व में कुछ कमियाँ भी थीं. और बहुत से लोग कहते हैं कि इन कमियों के चलते ही उन्हें अक्सर पार्टी में अनदेखा किया जाता रहा.

खैर इन सब बातों से अलग हमारी कहानी है उस वक़्त की जब चचा तिवारी देश के प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए. और इस बनते-बनते रह जाने का दुःख उन्हें ज़िंदगी भर सालता रहा. क्योंकि इस चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर खड़े छुटभैये भी दनादन चुनाव जीते थे.

साल 1991 का मई महीना था. लोकसभा चुनाव चल रहे थे और राजनीतिक दल जोर-शोर के साथ अपने प्रचार में लगे हुए थे. इसी महीने की 21 तारीख को राजीव गांधी तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर चुनाव प्रचार के लिए गए हुए थे. एक मानव बम धमाके की आवाज़ पूरे देश को सन्नाटे में डाल गई. इस धमाके में राजीव गांधी की हत्या हो गई थी.

इस घटना ने पूरे देश को कांग्रेस के प्रति सहानुभूति से भर दिया. ये सहानुभूति कांग्रेस के लिए वोट में बदलती गई और कांग्रेस को उस चुनाव की सबसे बड़ी पार्टी बना गई. कांग्रेस की टिकट पर खड़ा लगभग हर छोटा-बड़ा नेता चुनाव जीत रहा था.

ये वो वक़्त था जब चचा तिवारी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार थे और सोनिया गांधी अभी तक राजनीति के मैदान में उतरी नहीं थीं. ऐसे में एनडी तिवारी का प्रधानमंत्री बन जाना निश्चित दिखाई दे रहा था. ये दूसरा मौक़ा था जब गांधी परिवार के बाद, किसी और कांग्रेसी को प्रधानमंत्री बनना था.

इससे पहले सिर्फ लाल बहादुर शास्त्री ही ऐसे एकमात्र कांग्रेसी थे जो गांधी परिवार के ना होकर भी देश के प्रधानमंत्री बने थे. सभी को लग रहा था कि अगले प्रधानमंत्री एनडी तिवारी ही हैं, लेकिन एनडी तिवारी के साथ उस चुनाव में वो हुआ जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी.

भारतीय जनता पार्टी के एक कम अनुभवी उम्मीदवार बलराज पासी ने इसी चुनाव में एन. डी. तिवारी को नैनीताल से हरा दिया था. उस वक़्त बरेली की ‘बहेड़ी’ विधानसभा नैनीताल लोकसभा में हुआ करती थी. हर विधानसभा सीट पर अच्छा खेलने वाले चचा तिवारी इस विधानसभा सीट पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए और हार गए.

बलराज पासी ने 167509 वोट पाए और चचा तिवारी 156080 पर ही रह गए. यही वज़ह रही कि वो प्रधानमंत्री बनते-बनते भी रह गए. थाली में सजा प्रधानमंत्री का पद उनके सामने से गुजरता हुआ पीवी नरसिम्हा राव के सामने जा रुका.

चाचा तिवारी अपनी इस हार का ठीकरा अभिनेता दिलीप कुमार पर फोड़ते थे. उनका कहना था कि 1991 के चुनाव में वो अभिनेता दिलीप कुमार के साथ बहेड़ी गए. यहाँ दिलीप कुमार में जनता से अपील करते हुए कहा कि वो चचा तिवारी को ही जिताए. मगर फिर भी चचा को यहाँ से हार मिली.

एनडी तिवारी को लगने लगा कि ऐसा दिलीप कुमार की वज़ह से हुआ. उनकी मानें तो दिलीप कुमार का नाम यूसुफ़ खान होने की वज़ह से उन्हें हिन्दुओं के वोट नहीं मिले. वो कहते थे कि अगर उन्हें दिलीप कुमार का असली नाम पता होता तो वो कभी उनके साथ बहेड़ी ना जाते.

खैर, चचा तिवारी प्रधानमंत्री नहीं बन सके मगर अब उन्हें राष्ट्रपति पद का दमदार दावेदार माना जाने लगा, लेकिन फिर कांग्रेस ने उनका और उनके समर्थकों का ये सपना भी तोड़ दिया. जब दोनों पद हाथ से निकले तो किसी ने कहा शायद उप राष्ट्रपति बनाए जायेंगे. लेकिन परदे के पीछे से आदेश हुआ और इस पद के लिए भी उन्हें नहीं चुना गया.

उत्तर प्रदेश से उत्तरखंड के अलग हो जाने के बाद साल 2002 में कांग्रेस की तरफ से उन्हें उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया. बहुत से लोग पैराशूट मुख्यमंत्री कहकर उनकी आलोचना भी करने लगे. लेकिन एनडी तिवारी मुख्यमंत्री बने रहे.

इसके बाद जब साल  2007 में कांग्रेस को हार मिली तो इन्हें आंध्रप्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया. लेकिन महज़ एक साल बाद ही कुछ ऐसा हुआ जिसने एनडी तिवारी पर बहुत बड़ा धब्बा लगा दिया.

साल 2008 में रोहित शेखर ने एनडी तिवारी के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा कर ये दावा किया कि वो एनडी तिवारी के बेटे हैं. मामला देखते ही देखते मीडिया में छा गया और सुर्खी बन गया. लेकिन असली बवाल तब बढ़ा जब कोर्ट ने डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया.

चचा तिवारी अपना नमूना देने से मुकर गए. बहुत बवाल हुआ, मीडिया ने मामले को घसीट फेंका, कोर्ट में भी केस बंद नहीं हो सका, और आखिरकार एनडी तिवारी ने रोहित को अपना बेटा मान लिया और अपनी जायदाद का वारिस करार दिया.

उनकी उम्र 88 साल थी और उन्होंने इस उम्र में अपनी पुरानी प्रेमिका, रोहित की माँ उज्जवला से शादी की.

इसके अगले साल, उनके आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहने के दौरान ही 2009 में उनका एक टेप सार्वजनिक हो गया. इस वीडियो में चचा तिवारी एक महिला के साथ आपत्तिजनक अवस्था में नज़र आए. हर तरफ उनकी बड़ी छीछालेदर होने लगी.

और ये छीछालेदर जब बढ़ती गई तो कांग्रेस ने भी उन्हें किनारे कर दिया और करीब-करीब उनसे पल्ला ही झाड़ लिया था. एनडी तिवारी अब राजनीति के हाशिए पर खड़े थे.

कभी कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले एनडी तिवारी अपने आखिर के दिनों में कांग्रेस से रूठे हुए थे. इसके अलावा ऐसी चर्चाएँ सुनने को मिल रही थीं कि वो भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने वाले हैं.

इसमें कितना झूठ है और कितना सच ये तो हमें नहीं पता लेकिन अपनी पत्नी और बेटे के साथ उन्होंने अमित शाह से दिल्ली में मुलाक़ात ज़रूर की थी. साल 2017 की  शुरुआत में वो अपने बेटे रोहित और पत्नी उज्ज्वला को पकड़कर लड़खड़ाते हुए, कांपते हुए  भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह से दिल्ली में मिलते नज़र आए.

खबर आई किउनके बेटे इसी दौरान भारतीय जनता पार्टी में शामिल भी हो गए थे. लेकिन चचा तिवारी शामिल हुए या नहीं इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी थी. वो किसी पार्टी में शामिल हुए हों या ना हुए हों लेकिन इतना तो साफ़ था कि एक वक़्त भारतीय राजनीति के धुरंधर कहे जाने वाले चचा तिवारी साल 2017 तक पहुँचते हुए आम इंसानों की तरह ही बूढ़े, असहाय, और बीमार हो चले थे.

उनके व्यक्तिगत जीवन को किनारे कर दिया जाए तो दिग्गज तो वो थे ही. अबतक उनके बारे में जितना जाना उससे ये भी समझ आया कि कुछ गलतियां ना हुई होतीं तो राजनीति के दिग्गज तो वो थे ही. यहाँ तो उनका हाथ पकड़ने वाले बस गिने-चुने लोग ही थे.

साल 2017 के बाद बीच-बीच में उनकी एक-आध खबर सुनने में आ जाती. राजनीति में उनका कुछ सुनने को नहीं मिला, और कुछ मिलता उससे पहले 18 अक्टूबर 2018 को उनके निधन की खबर आ गई. यह भी महज़ एक इत्तेफाक ही था कि उनका दुनिया से जाना भी उसी तारीख को हुआ जिस तारीख को वो दुनिया में आए थे.

देकिये हमारा वीडियो: