जिनपिंग से बोले मोदी भारत शान्ति चाहता है पर पाकिस्तान नहीं

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प्रधानमंत्री मोदी बहुत विदेश दौरे करते हैं. अभी फिर वो किर्गिस्तान की खूबसूरत राजधानी बिश्केक के दौरे पर हैं. वो यहाँ शंघाई कारपोरेशन के शिखर सम्मलेन में शामिल होने गए हैं. इस सम्मलेन में प्रधानमंत्री मोदी के अलावा, वाल्दिमीर पुतिन, शी जिनपिंग और इमरान खान भी शामिल हुए.

सम्मलेन से अलग उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़ात कर बातचीत भी की. इस मुलाक़ात का समय 20 मिनट निर्धारित था, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इसमें अपने निर्धारित समय से ज्यादा वक़्त लगा. इस मुलाक़ात में मुख्य रूप से पाकिस्तान और आतंकवाद को लेकर बात हुई.

कुछ इलज़ाम और हैं जो देश का बुद्धिजीवी तबका अक्सर मीडिया और सोशल मीडिया की मदद से प्रधानमंत्री मोदी पर लगाता रहता है. और कुछ सवाल भी जो इस तबके द्वारा अक्सर सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी से पूछने की बात कही जाती है.

प्रधानमंत्री मोदी उन देशों के नेताओं से भी मिलते हैं जो हमको आँख दिखाते हैं या हमारी पीठ पर वार करते हैं. प्रधानमंत्री मोदी शी जिनपिंग से ना जाने कितनी बार मिल चुके हैं. उनकी और शी जिनपिंग की मुलाक़ात किस तरह से देश के लिए फायदेमंद है?

ऐसे बुद्धिजीवियों को हम बताना चाहते हैं कि पिछले पांच साल के आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच पिछले पांच सालों में करीब 10 मुलाकातें हुईं. इन मुलाकातों से हुआ फायदा जो लोगों को दिखाई नहीं देता वो है चीन की नीची होती आँखें और आतंकवाद की खिलाफत के साथ भारत का समर्थन.

यूनाइटेड नेशन में हर बार भारत के खिलाफ अपने वीटो का इस्तेमाल कर आतंकी मसूद अजहर को बचाने वाला चीन इस बार भारत के साथ खड़ा नज़र आया. इसका नतीजा ये हुआ कि कई बार ग्लोबल टेररिस्ट घोषित होने से बचता आया मसूद अजहर इस बार बच नहीं सका और भारत वो करने में सफल हुआ जिसमें उसे चीन की वज़ह से एक लम्बे वक़्त से असफल होना पड़ता था.

यही वज़ह है कि बिश्केक पहुँचने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे पहले शी जिनपिंग से ही मुलाक़ात और बात की. यूनाइटेड नेशन में मसूद अजहर को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित कराने में भारत की मदद करने के बाद, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से ये प्रधानमंत्री मोदी की पहली मुलाक़ात थी.

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच हुई इस मुलाक़ात के निर्धारित समय को बढ़ाया गया क्योंकि दोनों ने आतंकवाद और पाकिस्तान को लेकर विस्तार से बातचीत की.

बताया जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग से पाकिस्तान के बारे में बात करते हुए जो कुछ कहा, सरल शब्दों में उसका सार ये है कि,

“हमने कोशिश की कि पाकिस्तान दोनों तरफ से बातचीत कर मसले को सुलझाए लेकिन हमारी सभी कोशिशों को दरकिनार कर दिया गया. पाकिस्तान को अपने देश में आतंकवाद मुक्त माहौल बनाना चाहिए, लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा. हमें उम्मीद है कि पाकिस्तान इस बारे में ठोस कदम उठाएगा.”

इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग के साथ अपनी इस मुलाक़ात को फायदेमंद बताया. उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट से ट्वीट करते हुए लिखा कि,

“राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुलाक़ात बेहद फायदेमंद रही. हमारी बातचीत में भारत-चीन रिश्तों के सभी आयामों पर चर्चा हुई. अपने देशों के आर्थिक और सांस्कृतिक रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए हमें साथ काम करते रहना होगा.”

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अगले एक साल में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच तीन और मुलाकातें हो सकती हैं. अभी करीब 15 दिनों के बाद ओसाका में जी-20 मीटिंग होने वाली है. दोनों की एक मुलाक़ात यहाँ होगी. इसके बाद ब्रिक्स में भी इनकी दूसरी मुलाकात होगी, और इनकी तीसरी मुलाक़ात होगी भारत की अनुप्चारिक शिखर वार्ता में.

बिश्केक में हुई अपनी इस मुलाक़ात के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग को इस शिखर वार्ता में आने के लिए आमंत्रित भी किया. ऐसा बताया जाता है कि शी जिनपिंग ने इस आमंत्रण पर हामी भी भर दी है.

इसके अलावा शी जिनपिंग ने प्रधानमंत्री मोदी को इसी साल हुए लोकसभा चुनावों में भारी बहुमत से जीतने पर बधाई दी. जीत के लिए बधाई दी.

इन सभी बातों को एक लाईनमें रखकर इनपर गौर किया जाए तो समझ आ जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी के शी जिनपिंग से मिलने के क्या फायदे हुए हैं, लेकिन काश हम देश के बुद्धिजीवियों को फैक्ट्स के साथ कहीं से वो नज़र भी दिला पाते जो इनको सच देखने की ताकत दे सकती.

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