जानिये चुनाव नतीजे से पहले ही विपक्ष की क्या रणनीति चल रही है

लोकसभा चुनाव के सभी चरण अभी पूरे भी नही हुए हैं विपक्ष के नेता अभी से ही रणनीति बनाना शुरू कर दिए हैं. जी हाँ महागठबंधन वाली  रणनीति.. वहीँ महागठबंधन वाली रणनीति जो बनने से पहले ही बिखर गयी थी.. अब इसी महागठबंधन से जुडी अब जो खबर सामने आई है वो एक तरफ तो महागठबंधन के लिए राहत भरी हो सकती है लेकिन दूसरी इसी राहत को ही छीनने वाली सकती है,

दरअसल चुनाव के नतीजे से पहले महागठबंधन को लेकर सुगबुगाहट एक बार फिर शुरू हो गयी है. एक तरफ चंद्रबाबू नायडू ने राहुल गाँधी और ममत बनर्जी के साथ बैठक कर महागठबंधन पर फिर से विचार कर रहे हैं तो दूसरी तरफ तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस गठबंधन की तरफ जोर दे रहे हैं.

दरअसल महागठबंधन के तहत सभी विपक्षियों को एकजुट करने की कोशिश काफी लम्बे वक्त से की जा रही हैं. इसमें एनडीए की विरोधी सभी क्षेत्रीय पाटिर्यों को मुख्य भूमिका में रखा गया है लेकिन महागठबंधन में मतभेद सामने आ चुका है और अब चन्द्र बाबू नायडू को सभी पार्टियों को एकजुट करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है. आपको बता दें कि चुनाव नतीजे से पहले 21 मई को ही राहुल गाँधी, ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू की बैठक होने की खबर है लेकिन चुनाव नतीजे के सामने आने तक इस बैठक को टाला भी जा सकता है चंद्रबाबू नायडू के मुताबिक 22 विपक्षी दल उनके साथ हैं और जरूरत पड़ने पर ये सरकार के खिलाफ़ एक साथ खड़े दिखेंगे….लेकिन सुगबुगाहट शुरू हुई कांग्रेस को साथ में लेकर चलने की तो उधर केसीआर भी तैयार होते दिखाई दे रहे हैं, केसीआर गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस गठबंधन की बात कर रहे हैं.

चंद्रशेखर राव (KCR) चेन्नई में द्रमुक (DMK) प्रमुख स्टालिन से मिलकर क्षेत्रीय दलों के गठबंधन को लेकर बात करने वाले हैं और साथ ही साथ यह भी खबर है कि आने वाले एक दो दिन में KCR जेडीएस प्रमुख देवेगौड़ा से मिलकर भी गैर बीजपी और गैर कांग्रेसी गठबंधन बनाने की कवायद में जुट गए हैं… लेकिन केसीआर के इस चाल से सबसे ज्यादा परेशानी कांग्रेस के लिए हो सकती है… चंद्रबाबू नायडू के लिए झटका साबित हो सकती है. हालाँकि ये देखना दिलचस्प जरूर होगा कि राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर बनने वाले गठबंधन में कौन कौन सा पार्टियां शामिल होती हैं और कौन कौन से पार्टियाँ केसीआर के साथ यानी क्षेत्रिय पार्टी वाली गठबंधन के साथ जाती है. लेकिन एक बात तो स्पष्ट हैं कि केसीआर ने यूपीए में ही सेंध लगाने की कोशिश की है.


दरअसल क्षेत्रीय दल इस बार प्रधानमंत्री बनने के कयाम में हैं. उन्हें लग रहा है कि 1996 के लोकसभा चुनाव के रिजल्ट की तरह इस बार भी हो सकता है , जैसे 1996 देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला था…. लेकिन इस बार बनने जा रहे गठबंधन और महागठबंधन में एकजूटता से ज्यादा फूट दिखाई दे रही है. जो जो पार्टियाँ महागठबंधन में शामिल होने का दावा कर रही हैं वही पार्टियां एक दुसरे को नीचा दिखाने में भी कोई कसर नही छोड़ रही हैं वही बीजेपी और एनडीए दोनों अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं.