OPERATION CACTUS- जब भारत ने पड़ोसी राष्ट्रपति की जान बचाई

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कुछ ही घंटों में सेना ने सब कुछ अपने नियंत्रण में ले लिया और राष्ट्रपति गय्यूम को सुरक्षित किया। ईलम आतंकियों को भारतीय जवानों ने खदेड़ कर रख दिया।

“देश ने चाहा सेना ने कर दिखाया, पाकिस्तान को घर में घुस कर मारा!”

 “India strikes terror, deep in pakistan.”

पिछले 2-3 साल से इस तरह की हेड्लाइन्स सुर्खियों में है। और हो भी क्यों न भईया ? कभी सर्जिकल स्ट्राइक तो कभी एयर स्ट्राइक! भारतीय सेना ने पाकिस्तान के नापाक इरादों की बैंड जो बजा रखी है! पूरे विश्व में भारतीय सेना का बोलबाला हुआ पड़ा है। लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ। आपको बता दें, इतिहास में हमारी सेना ने ऐसे कई मिशन किए, जिन्हें शायद आज हम भूल गए।

उन्हीं मिशनों में एक ऐसा मिशन भी था जो आज़ाद भारत के इतिहास में अपने तरीके का पहला ही मिशन था। इस मिशन पर जाने से आमेरिका, यूके जैसे देशों ने भी हाथ खड़े कर दिए थे। इसी मिशन के बाद पूरी दुनिया ने भारतीय सेना के वर्चस्व को माना। आपको बता दें, भारत केवल अपने पड़ोसी देश की मदद के लिए ही इस मिशन पर गया, भारत की कोई ‘पर्सनल दुश्मनी’ नहीं थी। पड़ोसी राष्ट्रपति की जान दाव पर लगी थी, उसने मदद के लिए गुहार लगाई तो भारत सबसे पहले वहाँ जा पहुंचा। आज भी इस मिलिटरी ऑपरेशन को दुनिया के सबसे सफल कमांडो ओपरेशनों में गिना जाता है।

सबसे बड़ी बात ये थी कि इस पूरे मिशन में भारतीय सेना के किसी भी जवान को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। हम बात कर रहे हैं, 1988 में मालदीव में भारत के ‘ऑपरेशन कैक्टस’ की। 

क्या था भारतीय सेना का ऑपरेशन कैक्टस?

मालदीव, हमारा पड़ोसी देश, 1965 में ही आज़ाद हुआ। 1968 में वहा पहला चुनाव हुआ, इसी क्रम में 1978 में  ‘अब्दुल्ला यामीन गय्यूम’ वहाँ के राष्ट्रपति बनते हैं। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद 3 बार तख़्तापलट करने की कोशिश की गई। पहली बार 1980 में फिर 1983 में और तीसरी बार 1988 में। पहली दोनों कोशिशों में तख्तापलट नाकामयाब रहा लेकिन 1988 का तीसरा प्रयास काफी ऊचे लेवल का था। जिसकी वजह से भारत को मालदीव की मदद करने जाना पड़ा। और भारतीय सेना की मदद से मालदीव में तख़्तापलट को एक बार फिर रोक लिया गया।

इस तख़्तापलट की कोशिशों के पीछे आखिर था कौन?

दरअसल, 3 नवम्बर 1988 को पीपल्स लिबरेशन  ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ तमिल ईलम के करीब 200 श्रीलंकाई आतंकवादियों ने मालदीव पर हमला कर दिया। इस पूरे हमले में श्रीलंका में कारोबार करने वाले, मालदीव के अब्दुल्लाह लथुफ़ी ने आतंकियों का साथ दिया। असल में ईलम और लथुफ़ी के बीच तख्तापलट को लेकर एक डील हुई थी। लथुफ़ी को राष्ट्रपति बना कर, वहाँ ईलम का एक नया बेस बनाने की डील! 3 नवम्बर की सुबह ईलम के आतंकवादी टूरिस्टों के वेश में श्रीलंका से रवाना हुए । एक स्पीडबोट के जरिये मालदीव की राजधानी, ‘माले’ पहुंचते हैं और माले में घुसते ही सभी इलाकों को अपने कब्जे में कर लेते हैं।

पूरे माले में दहशत का माहौल बन गया। चारों तरफ़ हथियार बंद आतंकवादी ही दिखने लगे । टीवी स्टेशन, रेडियो स्टेशन से लेकर सभी सरकारी बिल्डिंगों पर आतंकियों ने कब्जा कर लिया। आतंकी राष्ट्रपति के घर जा पहुंचे ,वो राष्ट्रपति गय्यूम को अपना शिकार बनाना चाहते थे। लेकिन भईया! गय्यूम साहब की किस्मत का सिक्का चल गया और वहाँ से बचकर फरार होने में वो कामयाब हुए। गय्यूम नेशनल सिक्योरिटी सर्विस हैड्क्वार्टर जा पहुंचे। वहाँ पहुँचते ही उन्होने कई देशों से संपर्क करके, SOS भेजने की कोशिश की। SOS यानि ‘सेव आवर सोल’, SOS एक मदद मांगने का यूनिवरसल सिग्नल है।गय्यूम ने पाकिस्तान, श्रीलंका, अमरीका, यूके, से संपर्क किया

सभी देशों ने किया इंकार, भारत आया आगे

पाकिस्तान ने तो सीधे मना कर दिया, USA और यूके ने दूरी का बहाना बना दिया। वहीं श्रीलंका ने भी बीच में आने से मना कर दिया। हालांकि श्रीलंका ने तमिल मिलिटेंट्स के डर से अपनी आर्मी को स्टैंड बाय पर रखा हुआ था। किसी का भी पॉज़िटिव रेस्पोंस नहीं आया तो गय्यूम साहब ने भारत का दरवाजा खटखटाया। जैसे ही माले से भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पास एमरजन्सी मैसेज आया, तो उन्होने बिना किसी देरी के कैबिनेट मीटिंग बुला ली। आपको जान कर हैरानी होगी, जहां सभी देशो ने मालदीव की मदद करने से इंकार कर दिया, वहीं संदेश आने के 9 घंटे के भीतर ही इंडियन एयरफोर्स की पैराशूट ब्रिगेड के 300 जवान हुलहुले एयरपोर्ट पहुँच गए।

और फिर शुरू होता है, ऑपरेशन कैक्टस!

भारतीय सेना को देख ईलम के हथियारबंद उग्रवादियों का मनोबल ही टूट जाता है। सेना ने पहुँचते ही सबसे पहले हुलहुले एयरपोर्ट को अपने नियंत्रण में लिया और उसके बाद भारतीय सेना के विमान एक के बाद एक हुलहुले एयरपोर्ट पहुंचने लगे। कोच्चि से भी जवानों को माली भेजा गया। आतंकियों के साथ भारतीय सेना की ज़बरदस्त मुठभेड़ हुई। लेकिन भारतीय जवानों के सामने आतंकी कितनी ही देर टिकक्ते ? कुछ ही घंटों में सेना ने सब कुछ अपने नियंत्रण में ले लिया और राष्ट्रपति गय्यूम को सुरक्षित किया। ईलम आतंकियों को भारतीय जवानों ने खदेड़ कर रख दिया।

श्रीलंका से माले तक आतंकियों की सप्लाई लाइन को काट दिया गया। कुछ आतंकी तो जान बचा कर वापस श्रीलंका की ओर भागने लगे। उन्होने श्रीलंका जाते एक जहाज को अगवा कर लिया। लेकिन उन्हें शायद इस बात का आइडिया नहीं था कि भारतीय सेना उन्हें छोडने वाली नहीं है। अगवा जहाज पर आईएनएस गोदावरी से एक हेलीकाप्टर के जरिए मरीन कमांडों उतारे गए। मरीन कमांडो ने आतंकियों को मार गिराया। इस तरह भारत ने माले में होने वाले तख्तापलट को नाकाम किया।  

भारत के ऑपरेशन कैक्टस पर जाने के कई कारण रहे

दरअसल, उस समय श्रीलंका में एक्टिव लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम ने भारत की नाक में दम किया हुआ था। इसलिए भारत नहीं चाहता था कि तमिल मिलिटेंट्स का कोई और बेस बने। साथ ही कुछ जियो-पॉलिटिकल कारण भी रहे। जानकारी के लिए बता दें, मुंबई-गुजरात का ईस्ट एशिया या चीन के साथ जितना भी व्यापार होता है वो इंडियन ओशीयन में मालदीव और श्रीलंका दोनों के बीच से हो कर ही जाता है। यही कारण है कि दोनों ही देशों के साथ अच्छे संबंध रखना भारत के लिए ज़रूरी है।खैर, अब मालदीव सुरक्षित था।

प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ राष्ट्रपति गय्यूम

गय्यूम 2008 तक मालदीव के राष्ट्रपति रहे, विश्व ने की तारीफ

आज़ाद भारत के इस तरह के पहले विदेशी मिशन के बाद, भारतीय सेना की प्रशंसा होने लगी । यूनाइटेड नेशन, अमरीका से लेकर ब्रिटेन तक ने भारत की तारीफ की लेकिन श्रीलंका ने इसका विरोध किया। ऑपरेशन कैक्टस की सफलता का श्रेय भारतीय सेना और उस समय सेना को लीड करने वाले ब्रिगेडियर फारुख बुलसारा को जाता है।