प्रियंका गांधी वाड्रा के लिए चुनावी परिणाम बुरे सपने से कम नहीं

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Lok Sabha Election 2019 की मतगणना जारी है. बताने की ज़रूरत नहीं की जीत किसकी होगी। हर तरफ़ से पीएम मोदी को बधाई आना शुरू हो चुका है। एक बार फिर से देश की जनता पीएम के  तौर पर मोदी को आज़माने को तैयार है। लेकिन इन सब के  बीच बड़ी बात जो है वो है की कांग्रेस ने बहुत उमीद से प्रियंका गांधी को चुनावी मैदान में उतारा था , लेकिन इन सब के  बाद भी प्रियंका गांधी वाड्रा का जादू नहीं चल पाया। अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी बड़ी बहन एवं पार्टी की पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा के लिए बुरे सपने से कम नहीं हैं।

काफ़ी लोगों को उमीद थी की कुछ तो नया होगा। शायद प्रियंका अपनी पार्टी के  लिए लकी चार्म बन कर निकलेंगी लेकिन हुआ उसका उलटा। जब तक प्रियंका गांधी ने पार्टी में कोई पद नहीं संभाला था और सिर्फ अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी की रायबरेली और अमेठी सीटों पर प्रचार तक खुद को सीमित रखा था । काफ़ी रैली, सभाए, करने बाद भी उनके  हाथ कुछ नहीं आया और एक बार जीत फिर से नरेंद्र मोदी के  झोली में जा गिरी। उनकी तुलना अक्सर उनकी दादी इंदिरा गांधी  से की जाती रही है। इस लोकसभा चुनाव के दौरान प्रचार में उन्होंने इसकी झलक भी दिखाई लेकिन यह किसी काम नहीं आई।

काफ़ी सारे सवाल उठ रहे हैं की आख़िर इसमें ग़लती किसकी है?  कही ग़लती उनके  के  भाई राहुल गांधी की तो नहीं। लेकिन इसमें कम ग़लती प्रियंका गांधी वाड्रा की भी काम नहीं है। अब देखिए ना प्रियंका गांधी ने वाराणसी सीट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने की इच्छा जताकर अपने कदम वापस खींच लिए। अगर वह पीएम के खिलाफ चुनाव लड़तीं तो पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के उत्साह में इजाफा होता।  लेकिन उनके  पीछे हटने से पार्टी को काफ़ी नुक़सान हुआ।राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की उत्तर प्रदेश में जो बुरी गत हुई है, वह पार्टी के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है।  चुनावों के बीच राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका ने काफ़ी सारे सवाल उठाए मोदी पर। यह तक कि सप्रीम कोर्ट ने Chowkidar Chor Hai पर राहुल गांधी को फटकार भी लगाई, राहुल ने माफ़ी तक माँगी।जाहिर है, अगर कांग्रेस को अपनी खोई जमीन वापस पानी है तो उसे वंशवाद का सहारा छोड़कर प्रतिस्पर्धी राजनीति का दामन थामना पड़ेगा।