इतिहास का वो हादसा जिसने बदल कर रख दिया मगध का इतिहास

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ये एक ऐसी कहानी जो सदियों पुरानी है। जिसमे छल प्रपंच की एक पूरी गाथा है। एक ऐसी इबारत जिसमे अपने विनाश की कहानी अपने  हाथों  से ही लिखी गयी। क्षणिक सुखों और तुच्छ स्वार्थो में अंधे होकर एक रानी नें न सिर्फ नारी जाति को बल्कि समूचे मानव इतिहास को कलंकित किया। ये कहानी है कुणाल की। कुणाल मगध के सम्राट अशोक का पुत्र था। वही अशोक जिसे कुछ इतिहासकारों ने महान बताया तो कुछ ने चन्ड अशोक की उपाधि से नवाजा। 
अशोक की अनेकों रानियाँ थीं। उनमे से एक थी पद्मावती। इससे पहले कि  पदमावती पे कोई भ्रमित हो मैं स्पष्ट कर दूं ये मेवाड़ राजवंश की पद्मावती नही बल्कि मौर्य राजवंश की रानी थी।  कुणाल पद्मावती का पुत्र था। कुणाल की आँखें  बड़ी सुंदर थी। उनमे लोगों को सम्मोहित करने की अद्भुत विशेषता थी। ऊर्जा से भरा पूरा गठीला बदन उसके पौरुष की पहचान थी।


हम भारत वासियों के सौंदर्यबोध की कोई मिसाल नहीं है और हमे इसके लिए तो गर्वित होने का हक बनता है। मानवीय शरीर के विभिन्न अंगों की तुलना प्रकृति में पाए जाने वाले पेड़ पौधों, पुष्पों, पशु पक्षियों आदि से कर आनंदित होने की परंपरा अपने यहाँ रही है। मृगनयनी, राजीवलोचन, कमलनयनी, और ना जाने कितने ही और। हिमालय की तराइयों में पाया जाने वाला एक पक्षी है “कुणाल”. इस पक्षी की आँखों से प्रेरित होकर ही सम्राट अशोक ने अपने पुत्र का नाम ‘कुणाल’ रख दिया होगा शायद।

ये सम्राट अशोक के चौथेपन की अवस्था थी। खुद तो राजा बुजुर्ग थे किंतु उनके रनिवास में हर आयु वर्ग की रानियां थी। उनमे ही एक थी तिष्यरक्षिता। बूढ़े अशोक की सबसे युवा रानी, जिसके सौंदर्य के आगे अप्सराएँ भी शर्मा जाएँ। जिसके सम्मोहन के समक्ष बड़े से बड़ा तपस्वी भी मचल जाए। अपनी अवस्था के कारण अशोक तिष्यरक्षिता की शारीरिक जरूरतों को पूरी करने में पूर्णतः  सक्षम न थे और युवा रानी अंग अंग से कामातुर और कामेच्छाओं से व्याकुल थी।
ऐसे में तिष्यरक्षिता का ध्यान कुणाल की तरफ आकर्षित हुआ। तिश्यरक्षा कुणाल की आँखों के सम्मोहन से  मोहित हो गयी लेकिन कुणाल के साथ किसी भी ऐसे रिश्ते का पनप पाना लगभग असंभव सा था। एक तो तिष्यरक्षिता कुणाल की विमाता थी, दूसरा सम्राट की पटरानी और तीसरा कुणाल स्वयं विवाहित था। उसका विवाह कंचनमाला नामक राजकुमारी से सम्पन्न हो चुका था। कुणाल उच्च आदर्शो और  मूल्यों को मानने वालों में से था। 

किंतु सब जानते समझते हुए भी तिष्यरक्षिता कुणाल के संसर्ग के लिए इतनी आतुर हो गयी की एक दिन कुणाल को अपने कक्ष में बुलाया। कुछ सामान्य शिष्टाचार की बातें करने का बाद अचानक से कुणाल के काफी करीब आ गयी और अपने बाहों में जकड लेती है। इससे पहले की कुणाल कुछ समझ पाता तिष्यरक्षिता अपनी सम्पूर्ण काम कलाएं कुणाल पे आजमाने लगी। ये प्रणय निवेदन की पराकाष्ठा थी।  कुणाल अचंभित था उसने पूरा जोर लगाकर अपने को रानी से अलग किया। धक्का देकर कुणाल क्रोध में उठ खड़ा हुआ और  अपनी विमाता को धिक्कारते हुए, शर्म सर नज़रो से वहां से निकल जाता है। कुणाल ने खुद को कलंकित होने से तो बचा लिया। लेकिन अब जो कुछ भी होने जा रहा था उससे न तो वह बच पाया न ही उसका राजवंश।


इस प्रकार तिरस्कृत किया जाना तिश्यरक्षा के लिए असहनीय था। जीवन मे पहली बार किसी ने उसके सौंदर्य के आगे घुटने टेकने से मना कर दिया था। ये पहला मौका था जब तिष्यरक्षिता को किसी ने इतनी हेय दृष्टि से देखा था।
क्रोध से काँपते हुए अपनी शैय्या में गिर कर लोटने लगती है। कुछ देर बाद सहज होकर ये  निश्चय करती है कि वह उन आँखों से बदला लेगी जिसने उसे आसक्त किया था। वह उस कुणाल से बदला लेगी जिसने उसके सौंदय का भोग करने से मना कर दिया था। काम वासना में अंधी रानी अब वो करनी वाली थी जो विनाश का कभी न भूल पाने अध्याय बन गया।

कुछ दिन बीत गये। तक्षशिला से समाचार मिला कि वहाँ का राज्यपाल बग़ावत पर उतारू है। सम्भवतः ये तिष्यरक्षिता के षणयंत्र का ही ताना बाना था। उसे नियंत्रित करने के लिए सम्राट अशोक ने अपने पुत्र कुणाल को चुना। कुणाल अपनी पत्नी कंचनमाला को साथ ले, एक सैनिक टुकड़ी के साथ तक्षशिला की ओर कूच कर गया।
इधर संयोग कहिये या दुर्योग सम्राट की तबियत कुछ ज्यादा ही नासाज हो गयी चूंकि तिष्यरक्षिता ही सम्राट के सबसे करीब रहती थी तो उसने ही उनकी देखभाल के जिम्मा उठाया। उसकी सेवा जतन रंग लाई सम्राट पुनः स्वस्थ्य हुए और अपनी रानी पे प्रसन्न हुए और कुछ उपहार देने की सोचे। पूछा होगा बताओ क्या चाहिए, तिष्यरक्षिता ने मौके का फायदा उठाते हुए कहा कुछ नही चाहिए मुझे अगर देना ही है तो राजपत्रित मुहर लगी कुछ कोरे पत्र दे दीजिये मुझे जो भी चाहिए होगा राज्यकर्मियों को अदेशीत कर उसी से मंगा लुंगी। राजपत्रित मुहर से मतलब आज के किसी भी ऑफिसियल लेटर से समझिए जिसके लिखे निर्देशों को अधिकारीयों मानना पड़ता है। सम्राट पूरे मूड में उन्होंने जैसा तिष्यरक्षिता नें कहा उन्होंने उपलब्ध करवा दिया। तिश्यरक्षा मानो ऐसे ही किसी अवसर के फिराक में थी। उसने तुरंत राजपत्रित मुहर लगा एक पत्र तक्षशिला के राज्यपाल को लिख दिया और सख्त निर्देश दिया कि कुणाल को अंधा कर जान से मार दिया जाए।
जैसे तक्षशिला के अधिकारियों को ये पत्र मिला उनके तो हाथ पांव फूल गए। भावी सम्राट को अंधा करने का फैसला वो राजा की तरफ से, हैरान करने वाला था। लेकिन मानना मजबूरी थी जैसा क्रूर इतिहास अशोक रहा था उसे देखते हुए तो न चाहते हुए भी उसके आदेश को मानना ही था। अधिकारियों को भी लगा होगा जो व्यक्ति सत्ता के लिए अपने 99 भाइयों का सर काट सकता है उसे अपने अनेक पुत्रों में से एक को मारने में शायद सम्राट की कोई कूटनीति हो।
बहरहाल कुणाल को गिरफ्तार कर उसे राजा का आदेश बताया जाता है। पितृ भक्ति में अंधा कुणाल बिना किसी बागवत के अपने जीवन मे अंधा को तैयार हो जाता है। उच्च नैतिकता के मानदण्ड स्थापित करने के इरादों से उसने अपने उज्ज्वल भविष्य को अंधेरे में धकेल लिया। हालांकि तक्षशिला के अधिकारियों ने उसे जीवनदान दे दिया उन्हें लगा अंधे होने के बाद वैसे भी वो किसी काम का नही फिर हत्या  का पाप अपने सर क्यों लेना।

एक गलत सूचना के आधार पर ही सही पर जो होना था वो अब हो चुका था। तिष्यरक्षिता अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए,  अपने अहम को शांत करने के लिए इतनी क्रूरता कर ही चुकी थी। तभी वापस से स्वस्थ होकर राज काज में लौटे राजा को इस घटनाक्रम की जानकारी हुई। समझने में ज्यादा देर न लगी कि ये आदेश किसने दिया था। प्रारम्भिक जांच पड़ताल के बाद ही, अब तिष्यरक्षिता बेनकाब हो चुकी थी। एक बार फिर महान और शांत अशोक अपने प्रबल प्रचंड अशोक के रूप में आता है और अपने प्रधानमंत्री यश, के सलाह पर तिष्यरक्षिता को ज़िंदा जला देने का आदेश देता है। कामवासना में जलते जलते तिष्यरक्षिता अब अग्नि में जलकर खाक हो गई।
लेकिन कहानी अभी खत्म नही हुई, अब जंग उत्तराधिकार की थी। मगध का सम्राट बनना था जिस कुणाल को वो तो अब अंधा बन चुका था तो अगला उत्तराधिकारी कौन होगा ?
जहाँ अशोक अपने दूसरे पुत्रों में सम्भावना देखने लगा वहीं कुणाल तक्षशिला में ही अपने अधिकारों को लेकर मंथन में था।
कुणाल को जब ये पता चला कि सम्राट किसी और को उत्तराधिकारी बना देंगे तो वह चल पड़ा पाटलिपुत्र की ओर। पाटलिपुत्र पहुंचकर उसने अपनी पत्नी के संग मिलकर एक संगीतकार का वेश बनाया। आज के परिवेश में देखा जाए तो कुणाल बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। आकर्षक तो था ही युद्ध कौशल में निपुण, और रही बात गीत संगीत की तो उसकी पत्नी कंचनमाला गीत संगीत में विदुषी थी जिसने कुणाल को इस क्षेत्र में भी निपुण किया।चातुर्य में तो कुणाल का कोई सानी न था।

उसे पता था सम्राट को खुश होकर वचन देने का एक गन्दी लत है। जिस लत का वो शिकार हुआ है उसी के सहारे अब उसे न्याय भी चाहिए था। राजदरबार में प्रस्तुति देने के नाम पे महल में उसे प्रवेश मिला। उसने अपनी प्रस्तुती से सभी दरबारियों और स्वयं सम्राट को भी मुग्ध कर दिया। सम्राट अशोक बड़ा गदगद हुआ, उसने कहा बताओ क्या चाहिए? जो चाहिए ले लो ये मेरी आज्ञा है। बस इसी की तो ताक में था कुणाल, वो अपने असली रूप में आता है और कहता है
 “मै कुणाल हूँ, मुझे साम्राज्य चाहिए”।
 अशोक  पहले तो चौंकता है फिर उसे इस हाल में देखकर बड़ा व्यथित होता है और कहता है कि अंधत्व के कारण तुम अब इस योग्य नहीं रहे। तब कुणाल बताता है कि साम्राज्य उसे नहीं वरन उसके पुत्र के लिए चाहिये।
पुत्र..?? आश्चर्य से अशोक पूछता है कि तुम्हे पुत्र कब हुआ? कुनाल कहता है “संप्रति” सम्प्रति अर्थात अभी अभी सम्प्रति प्राकृत भाषा का शब्द है जो उन दिनों मौर्य साम्राज्य की आधिकारिक भाषा हुआ करती थी। और अशोक चाहते हुए भी इंकार न कर सका। उसे कुणाल की बात माननी पड़ी। सहानुभूति हो, या विवशता अशोक नें कुणाल को उसका अधिकार दिया।


हालाँकि कुणाल का पुत्र अभी माँ के गर्भ में था। जिसका  बाद में नाम ही “सम्प्रति” रख दिया गया। उसे अशोक का उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया गया। अशोक के बाद, पहले सम्प्रति के संरक्षक के रूप में 8 वर्षो तक कुणाल। फिर उसके बाद युवा होने  के बाद स्वयं सम्प्रति 9 वर्षों तक मगध के सम्राट के रूप शासन किया। अंत भले ही सुखद हुआ हो परन्तु सोचिए अगर वैसा न हुआ होता तो क्या पता कुणाल का नाम भी अपने पराक्रमी पुर्वजों और गुप्त वंश के महान शासकों की भांति इतिहास में महान सम्राट के रूप में लिया जा रहा होता। कुणाल का भी एक दौर रहा होता और उसे इतिहास के पन्नो में गुमनाम नही कर दिया गया होता।

लेखक, कवि, पत्रकार, The Chaupal के सम्पादक के रूप में कार्यरत है। सोशल मीडिया पर अपने बेबाक़ राय के लिए जाने जाते है। इनकी कविताएँ और कहानियाँ समय समय पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती है। शृंगार रस इनकी रचनाओं में पसंदीदा है। राजनैतिक मामलों और इतिहास के अच्छे जानकार है। अपने प्रशसंको में प्रोपेगैंडा क़िलर के नाम से मशहूर है।