कैसे बने लाल बहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री ?

4345

‘जय जवान जय किसान’ का नारा देने वाले एक ऐसे नेता जिसका प्रधानमंत्री बनना भारत के लोकतन्त्र की पहली और सबसे बड़ी मिसाल बनी। एक गरीब और आम परिवार से उठकर राजनीति में कदम रखा। जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद भी एक गाड़ी लेने के लिए भी लोन लेना पड़ा। आज़ादी के बाद से ही मंत्री पद संभाले और साल 1964 में भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। जी हाँ! आप सही समझ रहे हैं। हम बात कर रहे हैं लाल बहादुर शास्त्री की। शास्त्री जी की जयंती 2 अक्टूबर को मनाई जाती है। हम आपको उनके पीएम बनने के पीछे की कोंटरोवरशियल कहानी बताने जा रहे हैं।

बात है 27 मई 1964 की, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया था। भारत को आज़ाद हुए केवल 16-17 साल ही हुए थे। नेहरू की हुई अचानक मौत के बाद एक नया ही युग आ गया था। एक ऐसा युग जिसमे देश की अखंडता संकट में आ गई थी। पूरे देश के सामने एक ही सवाल खड़ा हो गया था- हू आफ्टर नेहरू? नेहरू के बाद कौन? आखिर देश की बागडोर किसके हाथ में दी जाए?

1962 के चुनाव में पूर्ण बहुमत से जीती काँग्रेस पार्टी ने तय किया कि वह सभी की सहमति से ही एक नया प्रधानमंत्री चुनेगी। और एक योग्य प्रधानमंत्री चुनने तक, गुलज़ारी लाल नन्दा साहब को टेम्पररी बेसिस पर प्रधानमंत्री बना दिया गया। काँग्रेस में प्रधानमंत्री बनने की रेस में कई दिग्गज नेताओं के नाम उछल रहे थे। जिसमे शास्त्री जी, जेपी नारायण और मोरारजी देसाई की दावेदारी टॉप पर चल रही थी।
पार्टी के अधिकतर लोग शास्त्री और नेहरू के पर्सनल रिश्तों को देखते हुए, शास्त्री को ही उनके उत्तराधिकारी के रूप में देख रहे थे। कुछ लोगों का कहना था कि नेहरू भी यही चाहते थे वरना वो शास्त्री को अपने कैबिनेट में ‘मिनिस्टर विदाउट पोर्टफोलियो’ न बनाते। वहीं शास्त्री चाहते थे कि जेपी नारायण या इन्दिरा गांधी को प्रधानमंत्री बना दिया जाए। उनके हिसाब से ये दोनों ही नेहरू की लेगेसी को आगे लेकर जा सकते थे। अब आप सोचेंगे काँग्रेस के बड़े नेता मोरारजी देसाई का इस पर क्या विचार था?

प्रयागराज में बैठे मोरारजी के पास उनकी राय जानने के लिए पत्रकार कुलदीप नैयर को भेजा गया। कुलदीप को ‘शास्त्री का आदमी’ भी कहा जाता था। मोरारजी ने तो सीधा ही कह दिया कि वे स्वयं पीएम बनना चाहते हैं। वह शास्त्री को बिलकुल सपोर्ट नहीं करेंगे। जेपी और इन्दिरा गांधी के बारे में पूछने पर उन्होने कहा कि उनके हिसाब से जयप्रकाश नारायण एक बहुत ही confused आदमी थे और इन्दिरा गांधी तो एक छोटी सी लड़की थी।
असल में काँग्रेस के अध्यक्ष के॰ कामराज और पार्टी में मेजोरिटी चाहती थी कि शास्त्री जी को ही प्रधानमंत्री बनाया जाए। कामराज तो नेहरू के निधन से पहले ही मोरारजी के प्रधानमंत्री बनने के सख्त खिलाफ थे। काँग्रेस में काफी वाद विवाद हुआ। ऐसे समय में के. कामराज के सामने सबसे बड़ा चैलेंज था पार्टी की एकता को बनाए रखना। अब कॉम्पटिशन में शास्त्री और देसाई खड़े थे कि इतने में एक नया ‘ट्विस्ट’ सामने आ जाता है।

कुलदीप नैयर, मोरारजी के करीबियों के हवाले से एक ऐसी खबर जारी कर देते हैं, जिससे शास्त्री की प्रधानमंत्री बनने की दावेदारी और भी मजबूत हो जाती है। दरअसल, नैयर ने मोरारजी की प्रधानमंत्री पद को लेकर दावेदारी की खबर छाप दी। इस सनसनीखेज खबर से पार्टी के लोगों के साथ साथ आम जनता भी नाराज़ हो गई। मोरारजी समर्थकों का कहना था कि कुलदीप नैयर ने ऐसा मोरारजी को नुकसान और शास्त्री को फायदा पहुँचाने के लिए छापा था। उस समय तो पत्रकार साहब का कहना था कि भैया मैंने किसी भी पक्ष के फायदे या नुकसान के लिए ऐसा नहीं किया।

हालांकि बाद में कुलदीप ने अपनी आत्मकथा ‘Beyond the Lines’ में यह माना कि उन्होने ऐसा शास्त्री कि छवि को फायदा पहुँचाने के लिए ही किया था।
बहस बाज़ी का अंत होता है, ‘आफ्टर नेहरू हू?’ का जवाब मिलता है और तारीख आती है 9 जून 1964, अब शास्त्री जी को पार्टी नेता चुन लिया गया था। वह भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। लेकिन किसे ही पता था कि इतने संघर्ष और वाद विवाद के बाद चुने गए प्रधानमंत्री को हम केवल 18 महीनों में ही खो देंगे।

शास्त्री जी, पाकिस्तान के साथ 1965 की जंग को खत्म करने के लिए समझौते पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए 10 जनवरी 1966 को ताशकंद गए थे। वहीं पर उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। आप को बता दें, कुलदीप नैयर साहब की आत्मकथा, जिसका ज़िक्र हमने पहले किया, उसी में कुलदीप खुलासा करते हैं कि इन्दिरा गांधी दिल्ली में लाल बहादुर शास्त्री की समाधि बनाने के पक्ष में नहीं थी। लेकिन शास्त्री कि पत्नी, ललिता शास्त्री ने जब आमरण अनशन पर बैठने की धमकी दी तो इन्दिरा गांधी को दिल्ली में ही शास्त्री जी की समाधि बनानी पड़ी।