अरविन्द केजरीवाल की गंदी राजनीती, खेल रहे “Divide And Rule” पालिसी

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जहाँ आग ना लग रही हो वहां भी जाकर यह नेता आग लगा आएं बस इनको वोट देदो.. कभी कभी लगता है आग लगाने की.. बांटने की राजनीति से ऊपर बढ़ ही नहीं पाएँगे.. कभी धर्म के नाम पर बांटना.. कभी जाति के नाम पर.. कभी राज्यों के नाम पर.. अब यह शहरों के नाम पर बांटने लग गए हैं.. हाल ही में ऐसा ही किया गया अरविन्द केजरीवाल ने.. दिल्ली की सत्ता हाथ से जाने ना पाए तो दिल्ली के मुख्यमंत्री ने एक ऐसा बयान दे दिया है जो उनकी घटिया राजनीति और घटिया नीतियों का परिचायक है, केजरीवाल ने अब दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का और दिल्ली के लोगों के लिए आरक्षण का मुद्दा उठा लिया है.. जैसे दिल्ली उनकी है.. भारत का हिस्सा नही.. अपने इस बयान के साथ अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली और दिल्ली वालों को भारत का हिस्सा ना मानने की अपनी सोच का भी  परिचय दे दिया… गलती इनकी भी नही है आज कल इनकी संगत पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ हो रही है ना ये उसी का आफ्टर इफ़ेक्ट है

अब आपको एक बार ये पूरा मामला भी बता देते हैं.. यह वाकया है पूर्वी दिल्ली के लोकसभा प्रत्याशी आतिशी के समर्थन में हो रही एक रैली के दौरान का सीएम ने कहा कि जब दिल्ली पूर्ण राज्य बनेगा तो यहां की 85 प्रतिशत नौकरियां दिल्ली वालों के लिए रिजर्व कर दी जाएंगी. दरअसल अरविंद केजरीवाल इस बार चुनावी रैलियों और जनसभाओं में दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हैं.

दिल्ली को पूर्ण राज्य तो दिल्ली वालों को नौकरी और कॉलेज में आरक्षण दिलाना चाहतें हैं, सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली की नौकरियों और यहां के कॉलेजों में दिल्ली के छात्र/छात्राओं के लिए 85 फीसदी सीटें रिजर्व होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि दिल्ली के पूर्ण राज्य बनते ही वे इसे लागू करेंगे. इतना ही नहीं चुनावी वादों में वो राहुल गांधी से भी आगे निकल चुके हैं एंड गेस व्हाट..? दिल्ली को पूर्ण राज्य ना बनने देने का इलज़ाम भी हमेशा की तरह उन्होंने मोदी और बीजेपी पर लगा दिया है

वादों की बौछार करते हुए सीएम केजरीवाल ने कहा कि पूर्ण राज्य बनते ही दिल्ली के हर वोटर को 10 साल में सरकार एक मकान देगी इसके साथ ही दिल्ली अगर पूर्ण राज्य बनेगी तो सुरक्षा राज्य सरकार की जिम्मेदारी होगी और महिलाएं देर रात तक सड़कों पर सुरक्षित महसूस कर सकेंगी.

केजरीवाल भी उन राजनीतिक पार्टियों की राह पर चल पड़े रहे हैं जो देश को एकजुट नहीं देखना चाहते बेचारे सरदार पटेल अलग अलग रियासतों और ठिकानों को मिला कर एक भारत बनाया और भारत के नेता आज उसे अपनी राजनीति चमकाने के लिए फिर बांटने में लगे पड़े हैं… हर राज्य को अपने राज्य में विकास करने के लिए.. वहां सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखने के लिए उसे अलग राज्य का दर्जा दिलाना चाहतें हैं, वहां अलग कानून लागू करना चाहते हैं.. कोई ताज्जुब की बात नही होगी अगर कुछ वक़्त बाद अपने राज्य को अलग देश बनाने की मांग करने लग जाएँ क्यूंकि यहाँ तो मोदी जी उनको कुछ करने ही नही देते.. पता नही वो खुद कैसे विपक्ष में रहते हुए गुजरात में इतना विकास कर आये बिना आरक्षण और बंटवारे की बात किये.

खैर केजरीवाल की घटिया राजनीति कोई नई बात नहीं है पर इनमें ज्ञान की भी इतनी कमी होगी यह नही पता था.. दरअसल दिल्ली को अलग राज्य का दर्जा दिया ही नहीं जा सकता क्यूँ..?? आपको बताते हैं

भारतीय संविधान के section 239 के अंतर्गत दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है जिसके अधिकार एवं सीमाएं वर्णित हैं। 13 फरवरी 1931 को दिल्ली को आधिकारिक तौर पर राजधानी घोषित किया गया था। आजादी के बाद साल 1956 में दिल्ली को यूनियन टेरिटरी यानी केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था और 1991 में 69वे संविधान संशोधन से दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश (NCT) का दर्जा प्राप्त हुआ तब इसके लिए विशेष तौर पर 239AA जोड़ा गया था। इस अनुच्छेद के तहत यहां उपराज्यपाल की नियुक्ति होती है जो केंद्र सरकार करती है और उपराज्यपाल व मंत्रिमंडल के सामंजस्य से यह प्रदेश चलता है। इस राज्य के पास अपना उच्च न्यायालय, मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद होने के कारण ही 1991 में अर्द्ध-राज्य का दर्जा दिया गया था।  दिल्ली देश की राजधानी है और व देश के अन्य राज्यों से अलग है। यहां डीयू, जेएनयू, इग्नू, जामिया जैसे देश के बड़े विद्यालय हैं जहां देश के सभी छात्रों को अपनी शिक्षा पूरा करने का अधिकार है।

इसी मुद्दे पर केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट की फटकार भी पड़ चुकी है पर यह सुधरने वालों में से कहाँ हैं, दिल्ली के लोगों को बाहरी राज्यों के लोगों के प्रति भड़काकर अपनी राजनीति चमका रहे हैं जबकि वो खुद दिल्ली के नही हैं, उनका जन्म हरियाणा स्थित भिवानी में हुआ था। इसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल में पढ़ाई की। इसके बाद झारखंड के जमशेदपुर में नौकरी की। राजनीति दिल्ली से कर रहे हैं। दिल्ली से न होने के बावजूद वो दिल्ली के मुख्यमंत्री का सुख भोग रहे हैं। इस हिसाब से तो दिल्ली की जनता को सबसे पहले केजरीवाल को ही बाहर निकाल देना चाहिए.. केजरीवाल का लॉजिक तो यही कहता है बाकि दिल्ली की जनता का फैसला