कवि तिरूवल्लुवर पर भाजपा के एक पोस्ट से जल उठे कुछ लोगों ने की ये नीच हरकत

तमिल के एक महान कवी दार्शनिक तिरूवल्लुवर की मूर्ति पर चार नवंबर को कुछ अज्ञात लोगों ने गोबर फेंक दिया, जिसके बाद से ही तमिलनाडु में इस बात को लेकर हंगामा खड़ा हो गया. अब आप सोच रहे होंगे कि तिरूवल्लुवर थे कौन और उनकी मूर्ति के साथ कुछ विशेष लोगों ने ऐसी हरकत की क्यों?

तो आपको बता दें कि 2050 साल पहले तिरुवल्लुवर तमिलनाडु में रहा करते थे. उन्होंने तिरुक्कुरल नामक एक किताब लिखी है, जिसमें 133 अध्याय और 1330 छंद हैं. ये पुस्तक नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाती है और इसे तमिल भाषाओं के प्रतिष्ठित साहित्य में से एक माना जाती है.

अब इस हरकत के पीछे का कारण भी जानिए, हुआ ये कि तमिलनाडु की भाजपा इकाई ने उन्हें सम्मानित करने के लिए twitter पर एक पोस्ट डाला जिसमे उन्होंने भगवा कपड़े पहन रखे हैं, और गले में रुद्राक्ष पहन रखा है, लोगों ने बवाल इसी फोटो पर मचाना शुरू कर दिया, कहा ये गया कि उनका विश्वास किस धर्म के प्रति था, ये दावे के साथ नहीं कहा जा सकता, तो इस तस्वीर का प्रयोग किसी भी सूरत में नहीं किया जाना चाहिए ये उनका अपमान है. अरे महाशयों 2050 सालों पहले इस देश में कितने धर्म थे, जिस कारण आपको तिरुवल्लुवर कि धर्मिक मान्यताओं को जानने में दिक्कत हो रही है.

भाजपा को नीचा दिखाने के चक्कर में कुछ लोग इतने गिर गए हैं कि उन्होंने तिरुवल्लुवर को भी नहीं छोड़ा, तंजावुर जिले के पिल्लैयारपट्टी इलाके में तिरुवल्लुवर की एक प्रतिमा पर कुछ अज्ञात लोगों ने चेहरे और गर्दन पर गोबर फेंक दी. फिर क्या लोगों का गुस्सा भड़कना तो जायज़ था, इस वाकिये के बाद से ही, गांव वाले प्रतिमा के सामने विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. तंजावुर पुलिस ने मामला दर्ज तो कर लिया लेकिन घटना को अंजाम देने वालों का अभी तक पता नहीं चला है.

जिन लोगों को तमिलनाडु बीजेपी के उस चित्र के इस्तेमाल से दिक्कत थी वो अब ज़रा ये तस्वीर भी देख लें, ये तस्वीर जानी पहचानी लग रही होगी, क्यूंकि ये jesus christ की तस्वीर है, लेकिन स्वरूप तो देखिये, इसको देख कहीं से भी लगता है कि ये उनकी किसी भी असल प्रतिमा से मेल खाती है? नहीं न, लेकिन ये पिक्चर पिछड़ी जनजातियों में इसाईयत के प्रचार के लिए खूब इस्तेमाल की जाती है, ताकि उन्हें भटकाया जा सके ये दिखा कर कि वो किसी बाहरी धर्म को नहीं अपना रहे हैं ये उनकी ही संस्कृति का हिस्सा हैं.

इस पर इन कुछ विशेष लोगों को आपत्ति क्यों नहीं होती और इस पर आप सबको भी कोई अप्पति क्यों नहीं होती….? कि आपके पोशाक, आपके तौर तरीके का इस्तेमाल किसी ऐसी चीज़ के प्रचार प्रसार में हो रहा है जिसका इस संस्कृति और सभ्यता से कोई ताल्लुक नहीं है. फिर आप इस पर नहीं बोलंगे, लेकिन हमारे ही देश के एक महान कवी की चित्र अगर यहाँ कि सांस्कृतिक पोशाक से मेल खा जाये तो इस पर लोग अपना आपा खोने लग जाते हैं.

खैर इन सबके बाद अब हिंदू मक्कल काची के सदस्यों ने पिल्लारपट्टी में तिरुवल्लुवर की उस मूर्ति पर फूलों के माला चढाई. साथ ही रुद्राक्ष और एक भगवा ‘अंगवस्त्रम’ को उनकी मूर्ति के ऊपर पहनाया. कितनी अजीब बात है ना किसी की भावनाओं की कद्र करना तो छोड़ ही दीजिये यहाँ लोग वैचारिक मदभेद के चलते भी ऐसे महान दार्शनिक कवियों का अपमान करने से भी पीछे नहीं हटते.