जगन मोहन रेड्डी के इस कदम को क्यों ठहराया जा रहा है हिन्दू विरोधी

पिछले हफ्ते एक खबर आई कि आंध्र प्रदेश की तिरुमला तिरुपति मंदिर ने एक फैसला किया कि अब से किसी भी गैर हिन्दू को मंदिर परिसर में काम नहीं दिया जाएगा। अब ये बात सुनते ही द वायर, स्क्रॉल इन और न जाने ऐसे कितने न्यूज़ पोर्टल इस फैसले की निंदा करने में लग गए और fundamental rights का हवाला देने लग गए। जब हम ने ये खबर सुनी तो हम ने सोचा मामले की तह तक जाएं.

दरसअल मामले ने तूल तब पकड़ा जब BJP के national secretary सुनील देवधर ने सोशल मीडिया पर तिरुमला की बस टिकट की एक फोटी शेयर की जिसके पीछे Christian लोगों के लिए जेरुसलम यात्रा का add छपा हुआ था। ये बात समझ से परे है कि जब वहां आने वाले लोग मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं तो यात्रा की टिकट पर तिरुमला नहीं बल्कि जेरूसलम का विज्ञापन क्यों लगा हुआ है, ? अब आप इस तस्वीर को देखिए एक ट्विटर यूज़र ने शेयर किया है, जिसमे cross का symbol तिरुमला की पहाड़ी पे बना दिख रहा है जो कि तिरुमला की प्रॉपर्टी में आता है.

अब आप सोच रहे होंगे कि इन बातों का तिरुमला में गैर हिंदुओं को काम न देने से क्या वास्ता, तो बात ये हैं कि ऐसी कई खबरें आ रही थीं कि तिरुमला में लोगों का धर्मांतरण करवाने की कोशिश की जा रही हैं, इससे जुड़ा एक वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमे मंदिर के ठीक सामने ही एक father लोगों को ईसाई धर्म के बारे में बताता पाया गया, हालांकि वो वीडियो अब सोशल मीडिया से डिलीट कर दिया गया हैं.

जो भी गैर हिन्दू लोग यहां काम करते हैं इन कामों में उनका भी हाथ हो सकता है ये सोच कर तिरुमला बोर्ड ने उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट करने का निर्णय भी लिया ताकि उनकी रोज़ी रोटी पे कोई असर न पड़े, ये सब सिर्फ तिरुमला की autonomy को बचाने के लिए किया गया है, साथ ही वहां आने वाले लोगों को लालच दे कर
इस कदम से लेफ्ट leaning लोगों को बहुत दिक्कत हो रही हैं, वो इसे fundamental rights का उलंघन मानते हैं, आप आप ज़रा ये बताएं कि कितने ऐसे church हैं जहां हिंदुओं को कम पर रखा जाता है, कितने ऐसे मदरसे हैं जहां हिन्दू काम करते हैं, मेक्का मदीना हो या वैटिकन इसमे से किसी भी धार्मिक स्थल पर उस धर्म के लोगों के अलावा किसी गैर को जाने की इज़्ज़त नहीं होती.

हम ये नहीं कह रहे कि ये सही है, लेकिन अगर भारत की बात की जाए तो आप देखेंगे कि इस देश में किसी भी मंदिर में गैर हिंदुओं के काम करने से कभी नहीं रोक गया है। हिन्दुओं के धार्मिक कार्यक्रमों में बाकी सभी धर्म के लोग बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं, इसका हमेशा से स्वागत किया जाता रहा है, तिरुमला और जगनाथ पूरी को अगर अपवाद मान लें तो किसी भी मंदिर में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि यहां कोई गैर हिन्दू काम नहीं कर सकता, उदाहरण के तौर पर ही देख लें योगी आदित्यनाथ के शहर गोरखपुर में तो गोरखनाथ मंदिर में 40% से ज़्यादा मुस्लिम काम करते हैं, ये तो एक उद्धरण था, लेकिन इस मामले के सामने आने के बाद जब वहां के लोगों ने YSR के खिलाफ विरोध किया तो कुछ मीडिया websites ने इसे हिन्दू बनाम christian का मुद्दा बना दिया. जबकि ये लोगों की भावनाओं और धर्म परिवर्तन से जुदा संवेदनशील मुद्दा था.

मीडिया यहाँ ये दिखाना चाह रही है की मंदिर प्रशासन और रेड्डी सरकार दोनों ही एंटी minority हैं जो की सच नहीं है, आप खुद सोचिये कि अगर ऐसा किसी अन्य धर्म के पवित्र स्थल के पास किया गया होता तो .. अगर दुसरे धर्म के स्थलों पर हिन्दू चिन्ह अंकित कर दिए जाते तो अब तक देश के सेक्युलर फैब्रिक पर खतरा आ चुका होता. अब तक देश असहिष्णु हो चुका होता, देश में लोगों को डर लगने लगता है और इसके समर्थन में कदम उठाने वाली सरकार लिबरल कहलाती.

मंदिर के परिसर में किसी भी तरह के ऐसे धार्मिक कार्य नही होने चाहिए जिसके चलते बवाल होने की संभावना हो..लड़ाई होने की संभावना हो लेकिन देश में कुछ लोग तो चाहते ही यही है कि दंगे हो लड़ाई हो और फिर उन्हें रोटी सेंकने का मौका मिला