RSS के लोग कश्मीरी मुसलमानों पर अत्याचार करते थे- इतिहासकार इरफ़ान हबीब

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इतिहास, यानी बीती हुई बात. वर्तमान जिसे कहानियों की तरह पढ़ कर अपनी धारणा बनाता है, वो इतिहास ही है. वर्तमान जिससे सबक ले कर भविष्य को संवारता है वो इतिहास ही है . आपका वर्तमान या भविष्य कैसा होगा ये बहुत हद तक इतिहास पर निर्भर करता है और ये इतिहास निर्भर करता है उस इतिहासकार पर जिसने इसे लिखा है. इतिहास की बातें आज यूँ ही नहीं कर रहा, आज ये बात करनी जरूरी है. अगर हमसे कोई इतिहासकार का नाम पूछे तो चंद नाम हैं जिन्हें हम पहचानते हैं और इसकी वजह ये है कि हम जो इतिहास पढ़ कर बड़े हुए हैं या आज बच्चे जो इतिहास पढ़ रहे वो इन्होने ही लिखे हैं. राम गुहा, रोमिला थापर, विपिन चन्द्र, इरफ़ान हबीब. ये चंद नाम हैं जो इतिहासकार है, यानी इतिहास के रचयिता. आज हम बात करेंगे इरफ़ान हबीब की.

कश्मीर से आर्टिकल 370 के निरस्त होने के बाद 87 वर्षीय इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने दावा किया कि कश्मीर में आर्टिकल 370 यूँ ही नहीं था बल्कि इसके पीछे एक वजह थी. इसे लागू करने के पीछे एक मजबूरी थी और मजबूरी ये थी कि संघ परिवार के लोग कश्मीरी मुसलमानों का उत्पीडन करने लगे थे. वो उनपर हमले करते थे और उनकी जमीने छीन लेते थे इसलिए सरदार पटेल कश्मीर में परमिट सिस्टम पर राजी हुए ताकि बाहरी लोगों को कश्मीरी लोगों की जमीने छीनने से रोक सकें. इरफ़ान हबीब की ये बातें द टेलीग्राफ में छपी है. हबीब ने कहा कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय का विरोध किया और राज्य की स्वायत्तता की पैरवी की इसके बावजूद भाजपा हमेशा उनकी तारीफ़ करती रही. उन्होंने कहा, ‘आर्टिकल 370 को खत्म करने का सवाल उठता ही नहीं अगर महाराजा जम्मू-कश्मीर के साथ किसी अन्य राज्य की तरह ही बर्ताव किए जाने की तत्कालीन केंद्र सरकार की इच्छा से सहमत हो जाते. ये बातें बता रहे हैं इरफ़ान हबीब, वही जो खुद को इतिहासकार कहते हैं या इतिहासकार होने का दावा करते हैं.

कश्मीर के बारे में हज़ारों डाक्यूमेंट्स पब्लिक डोमेन में हैं . अखबारों के पन्ने भरे हुए हैं कश्मीर की कहानियों से. देश में शायद ही कोई ऐसा हो जो कश्मीर के इतिहास से परिचित ना हो. शायद ही कोई ऐसा हो जो ये न जानता हो कि किन परिस्थितियों में कश्मीर का भारत में विलय हुआ था. लेकिन इरफ़ान हबीब अब नया इतिहास ले कर आ गए, या यूँ कहें कि उन्होंने एक नए इतिहास की रचना कर दी. इसलिए मैंने कहा इतिहास निर्भर करता है उस इतिहासकार पर जिसने इसे लिखा है. इरफ़ान हबीब ने इतिहास की नयी व्याख्या की है. अगर एजेंडा सेट करना हो, अगर प्रोपगैंडा चलाना हो तो नया इतिहास लिख दो.

कश्मीरी मुसलमानों ने बन्दूक और हिंसा के बल पर कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से भगा कर पुरे कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया और इरफ़ान हबीब नया इतिहास बता रहे हैं कि संघ परिवार ने कश्मीरी मुसलमानों का शोषण किया.

इरफ़ान हबीब ने बुढापे में ये जिस जहरीले इतिहास की रचना की है उससे ये आशंका जाहिर होती है कि जवानी में उन्होंने कैसा जहरीला इतिहास लिखा होगा. इरफ़ान हबीब आरएसएस के घनघोर विरोधी है और ये बात उन्होंने अपने बयानों से साबित किया है. साल 2015 में इरफ़ान ने आरएसएस की तुलना इस्लामिक आतंकवादी संगठन ISIS से कर दी थी. उन्होंने कहा था -“राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और इस्लामिक स्टेट में बौद्धिक आधार पर ज्यादा अंतर नहीं है.” इरफ़ान को अपने इस मानसिक दिवालियापन के लिए काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था. कई वरिष्ठ लोगों ने इरफ़ान को सलाह दी थी कि अब उन्हें इतिहास लिखना छोड़ देना चाहिए. जिस इतिहासकार को आतंकी संगठन और सांस्कृतिक संगठन में समानता नज़र आती हो तो उनके लिखे इतिहास पर शक होना लाजिमी है . नेहरू युग के इन एजेंडावादी इतिहासकारों का ये प्रोपगैंडा अब सबके सामने है.