‘फ़ादर ऑफ़ नेशन’ पर संविधान क्या कहता है ?

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साल था 2012, लखनऊ शहर से एक छठी कक्षा की छात्रा, ऐश्वर्या! ऐश्वर्या को एक ऐसी बात जाननी थी जिसका जवाब न उसकी माँ उसे दे पाती थी और न ही टीचर्स। लेकिन ऐश्वर्या उस सवाल से परेशान होने लगी तो उसने राइट टू इंफॉर्मेशन, आरटीआई का इस्तेमाल करते हुए, सवाल सीधा प्रधानमंत्री कार्यालय भेज दिया। सवाल था- किस तरह के और कौनसे आर्डर के तहत महात्मा गाँधी को ‘फादर ऑफ़ नेशन’ का टाइटल दिया गया?

हाउडी मोदी कार्यक्रम में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पीएम मोदी को ‘फादर ऑफ़ इंडिया’ कहा। अब भला इस बात पर भारत में विपक्षी नेता और इंटेलेक्चुअल गैंग शांत कैसे ही रह सकते थे ? ट्रम्प के इस बयान पर पुरे देश में बहस-बाज़ी चालू हो गई। सभी विपक्षी दल एकजुट हो कर इसे महात्मा गाँधी का अपमान बता रहे हैं और गाँधी जी को ही राष्ट्रपिता मानने की बात कर रहे हैं।

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, अगर ट्रंप को मालूम होता तो इस तरह की जुमलेबाज़ी नहीं करते।  गांधी को राष्ट्रपिता का खिताब इसलिए मिला, क्योंकि उन्होंने यह हासिल किया था। लोगों ने उनकी कुर्बानी को देखकर उन्हें यह उपाधि दी थी। इस तरह के खिताब दिए नहीं जाते, हासिल किए जाते हैं। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी ने कहा कि ‘फादर ऑफ इंडिया’ एक ही व्यक्ति हो सकता है, जो अहिंसा और मानवता का पुजारी हो। विश्व बंधुत्व को मानता हो और इसमें सबसे उपयुक्त महात्मा गांधी है। वह भारत ही नहीं दुनिया में पूजनीय है।

इस बहस और बयानबाज़ी के चलते कोई भी असल फैक्ट्स या इतिहास के बारे में बात करने को तैयार नहीं। आखिर गाँधी जी को ये उपाधि मिली कहाँ से ? क्या भारत के संविधान में इसका कोई प्रावधान है? 

चलिए वापस चलें लखनऊ, छठी कक्षा की छात्रा के द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी आरटीआई चिट्ठी के जवाब के बारे में बात करने।

ऐश्वर्या की उस चिट्ठी के जवाब में गृह मंत्रालय ने कहा कि, “संविधान सिर्फ शैक्षिक और सैन्य बल को ही कोई उपाधि देने की अनुमति देता है।  संविधान का अनुच्छेद 18 (1) कहता है कि शिक्षा और सैन्य बल को छोड़कर किसी भी उपाधि की अनुमति नहीं है।”

गृह मंत्रालय के 2012 के इस बयान से एक बात तो साफ़ है कि संविधान में ‘राष्ट्रपिता’ उपाधि को लेकर कोई प्रावधान नहीं है। अब सोचने वाली बात ये है कि भैया आखिर भारत के इतिहास में महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी किसने?

असल में 4 जून 1944 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में एक रेडिओ संदेश प्रसारण के दौरान गाँधी जी को पहली बार ‘राष्ट्रपिता’ कह कर संबोधित किया। इसी किस्से के बाद से गाँधी जी को राष्ट्रपिता कहा जाने लगा। बता दें, 30 जनवरी 1948 को गाँधी जी की हत्या के बाद भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने रेडियो पर देश को संदेश दिया और कहा “राष्ट्रपिता अब नहीं रहे”। इस तरह गाँधी जी के नाम के साथ राष्ट्रपिता उपाधि लग गई, जिसका भारत के संविधान में कोई भी प्रावधान नहीं है। समय के साथ लोगों की भी आदत हो गई और उनके नाम के साथ परमानेंट राष्ट्रपिता लग गया।