पूर्वांचल के पूरे राजनीतिक समीकरण को समझिये इस भाग में

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चुनावी घमासान के बीच, आज की चुनावी चौपाल में हम आपके सामने लेकर आए हैं, पूर्वांचल के राजनीतिक माहौल का तीसरा और आख़िरी हिस्सा. और इसकी शुरुआत हम करेंगे जिला मऊ से…

मऊ (घोसी)

उत्तर प्रदेश के कुछ महत्वपूर्ण जिलों में से एक जिला है मऊ. इस जिले की पहचान दिग्गज नेता कल्पनाथ रॉय के नाम से भी होती है, क्तोंकी यही वो नेता है जिनकी वज़ह से मऊ को जिले का दर्ज़ा मिला. ये उन जिलों में से एक है जिन्हें कांग्रेस का गढ़ नहीं कहा जा सकता. इस जिले की लोकसभा सीट का नाम है  घोसी. कांग्रेस के टिकट पर यहाँ से 2 बार चुनाव जीत चुके कल्पनाथ रॉय दोनों बार  बार अपनी व्यक्तिगत छवि के कारण जीते ना कि कांग्रेस के नाम पर. इसका सबूत ये है कि कांग्रेस छोड़ देने के बाद जब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा तब भी उन्हें यहाँ से जीत ही मिली.

घोसी लोकसभा सीट पूर्वांचल की एकमात्र ऐसी सीट है जो वामपंथ का गढ़ कही जा सकती है. सीपीआई यानी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया कई सालों तक इस सीट पर अपना कब्ज़ा जमाती रही है. साल 1957 में पहली बार इस सीट पर चुनाव हुए थे, और तब से अब तक हुए कुल 16 चुनावों में 4 बार कांग्रेस और 5 बार सीपीआई को जीत मिली है.

मऊ जिले के अंतर्गत 4 विधानसभा  सीटें आती हैं. इनके नाम घोसी, मधुबन, मऊ सदर, मोहम्मदाबाद- गोहना है. जिसमें से मुहम्मदाबाद- गोहना सीट ही अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है.

साल 1999 में कल्पनाथ राय का निधन हुआ, और उनके निधन के बाद 1999 में बहुजन समाज पार्टी, 2004 में समाजवादी पार्टी,  2009  में फिर बहुजन समाज पार्टी को, और 2014 में भारतीय जनता पार्टी  को इस सीट से जीत मिली. और साल 2014 में मिली जीत भारतीय जनता पार्टी की पहली जीत है.

यहाँ मधुबन से भाजपा के दारा सिंह चौहान विधायक हैं, घोसी विधानसभा सीट पर भाजपा के फागू चौहान का कब्जा है. मुहम्मदाबाद-गोहना क्षेत्र की रिजर्व विधानसभा सीट है, और यहाँ भाजपा के श्रीराम सोनकर कुर्सी पर हैं. इसके अलावा यहाँ की चौथी और अंतिम विधानसभा सीट मऊ सदर से, बसपा के बाहुबली मुख्तार अंसारी विधायक हैं. बाहुबली मुख्तार अंसारी का नाम पूर्वांचल के दबंग नेताओं में शुमार होता है. वह पांचवीं बार यहां से विधायक चुने गए हैं.

मऊ जिले की कुल 4 विधानसभा सीटों में से 3 पर भारतीय जनता पार्टी का बर्चस्व है, और एक पर बसपा कब्ज़ा जमाये हुए है.

कयास तो यही लगाए जा रहे हैं कि इस बार भारतीय जनता पार्टी का यहाँ से दबदबा रहेगा लेकिन नतीजा क्या होता है, ये तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा.

मिर्ज़ापुर

मिर्ज़ापुर, पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक ऐसा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र, जो पर्यटन की नज़र से भी काफी महत्वपूर्ण जिला है. क्षेत्र की प्राकृतिक ख़ूबसूरती लोगों के ध्यान को अपनी तरफ खींच लेती है, और साल भर यहाँ पर्यटकों का तांता लगा रहता है.

ये चर्चित विध्यांचल धाम का शहर है, और माता विन्द्यावासिनी ने इस शहर को सुन्दरता भी खूब दी है. यहाँ बहुत कुछ है जो देखने लायक है. विन्ध्याचल धाम के साथ ही यहां सीता कुण्ड, मोती तालाब, लाल भैरव मंदिर, टंडा जलप्रपात, तारकेश्वहर महादेव, विन्धाम झरना, महा त्रिकोण, शिव पुर, गुरुद्वारा गुरु दा बाघ, चुनार किला, पुण्यजल नदी और रामेश्वपर भी देखने लायक जगहें हैं.

क्षेत्र की ख़ूबसूरती और धार्मिक माहौल इसे हर नज़र से ख़ास बनाते हैं. खैर, अब बात करते हैं यहाँ के चुनावी माहौल  की. यहाँ से सांसद हैं अपना दल की अनुप्रिया पटेल. 1989 तक जिला सोनभद्र भी इसी में शामिल था, और ये जिला उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला था.

दस्यु सुन्दरी कही जाने वाली फूलन देवी यहीं से चुनाव लड़कर सांसद बनी थी. ये सीट भारतीय जनता पार्टी के लिए कभी बहुत अच्छी नहीं रही है. हाँ साल 2014 का लोकसभा चुनाव और 2017 का उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव अपना दल ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर लड़ा था, और जीत हासिल की थी.लोकसभा में फिलहाल अपना दल के डो सांसद मौजूद हैं, और विधानसभा में 8 विधायक भी.

साल 2014 में यहाँ दूसरे नंबर पर बहुजन समाज पार्टी और तीसरे नंबर पर कांग्रेस रही है. यहाँ की करीब 91 प्रतिशत आबादी हिन्दू है और 7 प्रतिशत हिन्दू. फिलहाल यहाँ चुनावी सरगर्मी तेज़ है. किसी भी एक पार्टी का का गढ़ बनकर ना रहने वाली यह सीट सभी अनुमानों से एकदम परे है. इसलिए इस सीट पर हमें भी आपकी तरह ही ये  देखना है कि इस बार जनता यहाँ किसको क्षेत्रीय राजनीति की कमान सौंपती है.

सोनभद्र

देश बहार में बिजली उत्पादन के लिए जाना जाने वाला एक जिला है सोनभद्र.  बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और झारखंड की सीमाओं को छूने वाला उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिला देश के एक बड़े हिस्से तक बिजली पहुंचाता है. लेकिन देश के कितने ही घरों को रोशन करने वाला ये जिला आज भी विकास से बहुत दूर खड़ा नज़र आता है.

जिले का मुख्यालय है राबर्ट्सगंज. और यही इस क्षेत्र की लोकसभा सीट भी है. राबर्ट्सगंज लोकसभा के अंतर्गत 5 विधानसभा क्षेत्र आते हैं. इनका नाम चकिया, घोरावल, राबर्ट्सगंज, ओबरा और दुद्धी है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में यहाँ मोदी लहर ने अपना कमाल दिखाया था, और  भारतीय जनता पार्टी के छोटेलाल को जीत मिली थी. छोटेलाल बहुजन समाज पार्टी के शरद प्रसाद को हराकर आगे निकले थ.

यूपी में एसपी-बीएसपी के महागठबंधन के बाद आगामी लोकसभा चुनाव में इस सीट पर जोरदार टक्‍कर के आसार हैं।

सोनभद्र जिला 6788 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, और राज्य के सबसे ज्यादा क्षेत्रफल वाले जिलों में शुमार है. यहां की कुल आबादी करीब 18,62,559 है.

आदिवासी बाहुल्य वाली राबर्ट्सगंज लोकसभा सीट पिछले कई दशकों से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. भारतीय जनता पार्टी की स्थिति क्षेत्र में ठीक- ठाक रही है. क्षेत्र की जनता ने कई बार भारतीय जनता पार्टी को मौक़ा दिया है. वर्तमान समय में भी यहाँ भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी छोटेलाल सांसद हैं.  उन्होंने साल 2014 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी  के शरद प्रसाद को हराकर यहाँ अपनी जीत का परचम लहराया था.

2019 लोकसभा चुनावों में इस सीट को लेकर चुनावी पंडितों का फिलहाल यही मानना है कि, समाजावादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन इस बार भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरे का सबब बन सकता है, लेकिन असल नतीजे तो क्षेत्र के विकास पर ही निर्भर करेंगे.  

संत रविदास नगर (भदोही)

भदोही जिला उत्तर प्रदेश का एक ऐसा जिला है जो अपनी कालीनों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. कालीनों का श्श्स्र कहा जाने वाला जिला भदोही, क्षेत्रफल के हिसाब से उत्तर प्रदेश का सबसे छोटा जिला है. शहर ज्ञानपुर इस जिले का मुख्यालय है.

भदोही जिले को उत्तर में जौनपुर, पूर्व में वाराणसी, दक्षिण में मिर्जापुर और पश्चिम में प्रयागराज जिले छूते हैं. ये एक मुस्लिम बाहुल्य इलाका है और यहाँ की करीब 86 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है और 12 प्रतिशत हिन्दू.

जिले  के करीब 32 लाख लोग बुनाई के काम से किसी ना किसी तरीके से जुड़े हुए हैं. यही वज़ह है कि इसे कारपेट सिटी भी कहा जाता है. पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान रखने के बाद भी ये जिला विकास से बहुत दूर है.

इसके अंतर्गत 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इनके नाम प्रतापपुर, ज्ञानपुर, हंडिया, औराई और भदोही हैं. औराई की विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. भदोही में पहले आम चुनाव साल 2009 में हुए, और जीत मिली बहुजन समाज पार्टी के गोरखनाथ पाण्डेय को.

उसके बाद साल 2014 में यहाँ से जीते भाजपा के वीरेंद्र सिंह मस्त. वो पेशे से किसान हैं और भारतीय जनता पार्टी के किसान मोर्चा के अध्यक्ष भी हैं.

साल 2014 में हुए चुनावों में भदोही से बहुजन समाज पार्टी दूसरे, समाजवादी पार्टी तीसरे, जेडीयू चौथे नंबर पर रही थी. फिलहाल माहौल पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के खेमे में, लेकिन फिर भी, राजनीति है साहब, और इसका कोई भरोसा नहीं होता.

संत कबीर नगर

वो जगह जहां संत कबीर को निर्वाण मिला, वो ‘मगहर’ इसी जिले में है. इसी वज़ह से तो इसका नाम पड़ा है संत कबीर नगर. साल 2014 में यहां की लोकसभा सीट पर जीत हासिल की भारतीय जनता पार्टी के शरद त्रिपाठी ने.

इस सीट पर पहली बार 2009 में चुनाव हुए और इस चुनाव में जीत मिली बहुजन समाज पार्टी के भीष्‍मशंकर तिवारी को. अभी तक कुल दो बार हुए चुनावों में एक बार बसपा और एक बार भाजपा ने इस सीट को अपना बनाया है.

इस लोकसभा सीट के अंतर्गत 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इनके नाम खलीलाबाद, घनघटा, मेंहदावल, अलापुर और खजनी हैं. खजनी विधानसभा सीट गोरखपुर जनपद में आती है. आद्योगिक स्थिति की बदहाली से जूझ रहा संत कबीर नगर कभी बुनकरों और जूट उद्योग के लिए बहुत प्रसिद्द हुआ करता था.

इस जिले का मुख्यालय खलीलाबाद है. यह जिला सिद्धार्थ नगर, महाराजगंज, गोरखपुर और अम्बेडकर नगर जिले से और पश्चिम में बस्ती जिले से घिरा हुआ है.

अभी हाल में एक सभा के दौरान मेहंदावल विधायक राकेश बघेल के साथ शरद त्रिपाठी की हाथापाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, और इस वीडियो के चलते शरद त्रिपाठी लम्बे वक़्त तक सुर्ख़ियों का हिस्सा बने रहे.

मीडिया में और सोशल मीडिया पर पार्टी के दोनों नेताओं की बहुत किरकिरी हुई, साथ ही लोगों ने पार्टी पर भी सवाल उठाया. अभी हाल ही में आई एक खबर से ये पता चला की भाजपा ने शरद त्रिपाठी को इस बार पार्टी से टिकट नहीं दिया है.

खबर से पता चला कि भारतीय जनता पार्टी ने सांसद शरद त्रिपाठी का टिकट काट दिया है, और उनकी जगह इस बार टिकट दिया गया है प्रवीण निषाद को. सांसद शरद त्रिपाठी का टिकट कटने की वज़ह हाथापाई की उस घटना को ही माना जा रहा है.

भारतीय जनता पार्टी का ये कदम बताता है कि पार्टी अपनी छवि को लेकर कितनी जागरूक है. क्षेत्र में फिलहाल भारतीय जनता पार्टी की ही हवा है. और ऐसा लगता है कि जीत भी भारतीय जनता पार्टी को ही मिलेगी.

सिद्धार्थ नगर

भगवान गौतम बुद्ध की ज़िंदगी से जुड़ा हुआ जिला है सिद्धार्थ नगर. यही वज़ह है कि इसका नाम भी उनके बचपन के नाम पर रखा गया है.  सिद्धार्थ नगर का जिला मुख्यालय है नौगढ़ शहर. गोरखपुर-आनंदनगर-गोंडा ब्रॉड-गेज लाइन पर नौगढ़ रेलवे स्टेशन मौजूद है.

ये जिला बस्ती मंडल का हिस्सा है. और नेपाल के कपिलवस्तु, रुपन्देही से जुड़ा हुआ है. इसकी सीमाएं महाराजगंज, बस्ती, संत कबीर नगर, और बलरामपुर जिलों से मिलती हैं. इस लोकसभा सीट के अंतर्गत कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इनके नाम शोहरतगढ़, कपिलवस्तु, बांसी, इटवा और डुमरियागंज हैं.

कपिलवस्तु की सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. कपिलवस्तु में शाक्य वंश के राज प्रसाद और भगवान बुद्ध के काल में बने बौद्ध बिहारों के खण्डहर मिले, और शाक्य मुनि के अस्थि अवशेष भी पाये गये. दिनांक 29 दिसम्बर, साल 1988 में बस्ती के उत्तरी भाग को बस्ती से अलग कर सिद्धार्थनगर को एक अलग जिला बना दिया  गया.

यहाँ के वर्तमान सांसद हैं भारतीय जनता पार्टी के जगदम्बिका पाल. ये जगदम्बिका पाल वही हैं जिनको भारतीय राजनीति में ‘वन डे वंडर’ के नाम से भी जाना जाता है. उनको ये नाम इसलिए दिया गया क्योंकि साल 1998 में कुछ सियासी हालातों के चलते वो एक दिन लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन बैठे थे.

साल 2009 में यही जगदम्बिका पाल कांग्रेस के टिकट पर यहाँ से जीते और सांसद बने थे. साल 2014 में लोकसभा चुनाव से बस कुछ वक़्त पहले ही उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया, और टिकट लेकर जीतने के बाद फिर से लोकसभा पहुँच गए.

साल 2014 के चुनाव में यहाँ से दूसरे नंबर पर बहुजन समाज पार्टी, और तीसरे पर समाजवादी पार्टी रहीं.लेकिन अब देखने वाली बात ये है कि इस बार जीत का सेहरा किसके सिर रखा जाता है.

प्रतापगढ़

हमारा राजनीतिक इतिहास बताता है कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जब अपना राजनीतिक करियर शुरू किया तो प्रतापगढ़ से किया. राष्ट्रीय कवि हरिवंश राय बच्चन का जन्म भी इसी जिले में हुआ.

आज़ादी के बाद 1958 में जब पहली बार प्रतापगढ़ को जिला बनाया गया, तो इसे नाम दिया गया बेल्हा प्रतापगढ़. इसकी वज़ह था सई नदी के किनारे बना माता बेल्हा देवी का मंदिर. लेकिन इतना चर्चित और ख़ास होने के बाद भी ये जिला देश के पिछड़े हुए जिलों में शुमार होता है.

वर्तमान समय में यहाँ के सांसद हैं अपना दल के कुंवर हरिबंश सिंह. साल 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी को हराकर ये जीत हासिल की. 2014 के चुनावों में बहुजन समाज पार्टी का दूसरा, कांग्रेस का तीसरा और समाजवादी का चौथा स्थान रहा.

इस लोकसभा सीट के अंतर्गत 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इनके नाम रामपुर ख़ास, विश्वनाथ गंज, प्रतापगढ़, पट्टी और रानीगंज हैं. 2014 के चुनाव में अपना दल, भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरा था.

प्रतापगढ़ एक हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है. यहाँ की 85 प्रतिशत आबादी हिंदू और 14 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है.

साल 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में यहाँ भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है, लेकिन 2014 में अपना दल के कुंवर हरिवंश सिंह और मोदी लहर ने साथ मिलकर इस सीट पर जीत हासिल की.

फिलहाल का चुनावी माहौल गोरखपुर से भी भारतीय जनता पार्टी के ही संकेत दे रहा है, लेकिन फिर भी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के बाद, मुकाबला काफी दिलचस्प होगा.

ये था चुनावी चौपाल में पूर्वांचल के गलियारों से अबतक का राजनीतिक माहौल. और इसी तरह देश भर के चुनावी माहौल से अपडेट रहने के लिए जुड़े रहिये हमारे साथ. नमस्कार.