पांच साल से मृत पड़ा शव, लोगों को जिन्दा होने की उम्मीद

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डॉक्टरों द्वारा किसी को क्लीनिकली डेड घोषित करने के बाद उसे मृत मान लिया जाता है, लेकिन कई बार लोगों को फिर भी यकीन नही होता इसके बाद भी लोग उस मृत शरीर को जिंदा होने की आस लगाए बैठे होते है ऐसी कहानियां हमने शायद कई बार सुनी भी होंगी…

दरअसल पंजाब के लुधियाना में आशुतोष महाराज एक बाबा थे जिनकी मौत साल 2014 में हो गई थी देशभर में उनके 100 केंद्र संचालित हैं और जालंधर में उनका आश्रम करीब 40 एकड़ में फैला हुआ है आशुतोष महाराज नूरमहल डेरा के प्रमुख और दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के संत थे आशुतोष महाराज को सीने में दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल ले जाया गया था जहां पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था

इस घटना को पांच साल से भी ज्यादा हो गए लेकिन भक्तों की आस्था और विश्वास के आगे किसी की कहां चलती है डॉक्टरों के मृत घोषित करने के बाद भी लोग उनके मृत शरीर को जिंदा होने की आस लगाए बैठे है 

बाबा के शरीर को -22 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर फ्रीजर में रखा गया है और जिस कमरे में बाबा के शरीर को रखा गया है उसकी सुरक्षा के लिए 20 भक्त 24 घंटे खड़े रहते हैं इतना ही नहीं दिव्य ज्योति जागृति संस्थान ने डॉक्टरों की एक टीम बनाई है जो प्रत्येक चार रातों में आशुतोष महाराज के शव का चेकअप करती है

दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के वकील सुनील चड्ढा ने आशुतोष महाराज को जिंदा साबित करने के लिए कई सारे चोंकाने वाले इतिहास के उदाहरण बताए हैं। जिसमे उन्होंने कहा कि रमन महाऋषि 16 साल की उम्र में समाधि में चले गए थे और लोगों ने उन्हें मृत मान लिया था लेकिन वह वापस जीवन में लौट आए इसके अलावा 1962 में श्रीधर स्वामी दो सालों के लिए समाधि में रहे थे, लेकिन दो साल बाद उनकी आत्मा वापस शरीर में लौट आई थीउनका शव खराब ना हो इस पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने तीन डॉक्टरों का पैनल बनाया है यह पैनल हर छह माह में आशुतोष महाराज के शव का परीक्षण करता है….है ना गजब ….

अब आपको एक ऐसे गांव के बारे में बताते है जहां हर घर के किसी ना किसी सदस्य का संबंध सेना से है अपनी जान की परवाह किये बिना जवान देश की सेवा करने के लिए सेना में भर्ती होते है लेकिन इस गांव की कहानी बेहद दिलचस्प है इस गांव से सेना का रिश्ता 300 साल पुराना है यहां रहने वाले हर एक इंसान की अपनी ही एक वीर कहानी है 

यह आंध्र प्रदेश में गोदावरी जिले का माधवरम गांव है इस गांव के लोगों का सेना से इस हद तक लगाव है कि यहां लोगों को सूबेदार, मेजर, कैप्टन जैसे नामों से संबोधित किया जाता है गजपति राजवंश के राजा माधव वर्मा का यह गांव सैनिकों का ठिकाना हुआ करता है। अब जाहिर सी बात है कि उस दौरान कई सैनिकों को यहां लाकर बसाया गया। किले से लेकर हथियारों तक का जखीरा माधवरम गांव में लाया जाता था प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्व में भी माधवरम गांव के सैनिकों ने अपना अहम योगदान दिया था।
वर्तमान समय में माधवरम इस  गांव के लोगों ने यहां के सैनिकों के बलिदान और सेवा की स्मृति  में सैनिक स्मारक का निर्माण कराया है है ना बेहद दिलचस्प



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