चुनाव में शर्मनाक हार के लिए राहुल ने की इस्तीफे की पेशकश, पार्टी ने किया नामंजूर

106

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद आज दिन भर कांग्रेस में इस्तीफे का ड्रामा चलता रहा लेकिन शाम होते होते नतीजा वही निकला जिसकी सब उम्मीद कर रहे थे. हार पर मंथन के लिए कांग्रेस वर्किंग कमिटी की मीटिंग बुलाई गई, जिसमे पार्टी की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गाँधी, नयी नयी महासचिव बनी प्रियंका गाँधी वाड्रा, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत कांग्रेस शासित कई राज्यों के मुख्यमंत्री और कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए.

राहुल गाँधी ने 23 मई को ही प्रेस कांफ्रेंस में हार की पूरी जिम्मेदारी ली थी और अध्यक्ष पद से अपने इस्तीफे की बात कही थी. वर्किंग कमिटी की मीटिंग में पहुंचे राहुल गाँधी ने इस्तीफ़ा देने का पूरा मन बना लिया था, या यूँ कि वो अपना इस्तीफ़ा देने के लिए आये थे. लेकिन उन्हें इस्तीफ़ा नहीं देने के लिए उनकी माँ सोनिया गाँधी, बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मनाते रहे.

मनमोहन सिंह ने तो यहाँ तक कहा कि चुनाव में हार जीत तो लगी रहती है लेकिन इस वक़्त पार्टी को उनकी जरूरत है. लेकिन राहुल नहीं माने. मीटिंग में अपने भाषण के दौरान उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की. राहुल ने कहा – चुनावी हार मेरे लिए जिम्मेदारी और जवाबदेही की बात है, इसलिए मैं इस्तीफा दूंगा. लेकिन पार्टी की कार्यसमिति ने इस्तीफे को खारिज कर दिया. वर्किंग कमिटी के सदस्यों ने सर्वसम्मति से राहुल का इस्तीफ़ा नामंजूर करने का प्रस्ताव पास किया. पारित प्रस्ताव में कहा गया है- कांग्रेस कार्यसमिति उन चुनौतियों, विफलताओं और कमियों को स्वीकार करती है, जिनकी वजह से ऐसा जनादेश आया. प्रतिकूल व चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में पार्टी को श्री राहुल गांधी के नेतृत्व व मार्गदर्शन की आवश्यकता है। कांग्रेस कार्यसमिति पार्टी के हर स्तर पर संपूर्ण आत्मचिंतन के साथ साथ कांग्रेस अध्यक्ष को अधिकृत करती है कि वो पार्टी के संगठनात्मक परिवर्तन एवं विस्तृत पुर्नसंरचना करें.

चुनाव में हार को लेकर चली मंथन में राहुल की टीम पर सवाल उठाये गए. राहुल को सलाह दी गई कि आप चाहे तो पूरी टीम बदल दें लेकिन अपने टीम में उन लोगों को जगह दें जिनका कोई राजनीतिक वजूद हो, जिनके पास राजनीतिक समझ हो. राहुल की टीम में ऐसे लोग फैसले लेते हैं जिनकी कोई राजनीतिक समझ नहीं है और इसी कारण हम जनता की नब्ज पहचान नहीं पाए. उन लोगों पर भी सवाल उठाये गए जिन्होंने मोदी पर हमले करने की रणनीति बनायी और साथ ही ये देख कर की जनता पर राफेल मुद्दे का कोई असर नहीं हो रहा. बार बार राफेल मुद्दे उठाये गए. पार्टी के कुछ नेताओं की बेतुके बयानबाजियों को भी पार्टी की हार का जिम्मेदार माना गया.

कुल मिला कर कांग्रेस के वर्किंग कमिटी की मीटिंग में तमाम बातों को कांग्रेस के हार का जिम्मेदार माना गया सिवाए कांग्रेस अध्यक्ष के, जिनके नेतृत्व में नीतियाँ बनी और चुनाव लड़ा गया. ये पहली बार नहीं है, कांग्रेस की ये परंपरा रही है. साल 2014 में भी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी और उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने इस्तीफ़ा देने की पेशकश की थी लेकिन वर्किंग कमिटी ने उनमे आस्था जताते हुए उनके इस्तीफे को खारिज कर दिया था.

पार्टी तबाह होने के कगार पर पहुँच गई. लगातार 10 साल अब सत्ता से बाहर रहना पड़ेगा. 5 सालों में पार्टी की सीटें 44 से बढ़कर 55 तक पहुंची लेकिन पार्टी के किसी नेता / कार्यकर्ता में ये हिम्मत नहीं कि वो कह सके पार्टी के संगठन में बदलाव की जरूरत है. आपको एक उद्धरण देता हूँ, 2004 से 2014 तक भारतीय जनता पार्टी सत्ता से बाहर रही थी लेकिन इस दौरान उसने कई अध्यक्ष देखे- नितिन गडकरी से ले कर राजनाथ सिंह तक. लेकिन असफलताओं के बाद कांग्रेस में पार्टी को बचाने के बजाये गाँधी परिवार को बचाना पहला धर्म माना जाता है. देश की सबसे पुरानी पार्टी का ये हाल देख दुःख होता है लेकिन कांग्रेस ये मान चुकी है कि नेहरू गाँधी परिवार के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है.