70 सालों तक राज करने वाली कांग्रेस क्या अब हो गई है अछूत?

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उत्तर प्रदेश , पश्चिम बंगाल , तेलंगाना, बिहार और महाराष्ट्र में महागठबंधन का हाल कुछ ठीक सा नहीं लग रहा है . वैसे तो कांग्रेस का साथ निभाने का वदा कई पार्टियों ने किया था लेकिन अब आलम कुछ अलग सा है
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चुनाव के तारिख की घोषणा होने के बाद राजनीतिक पार्टियों में हलचल मच गई है . कहीं सीट बटवारे को लेकर पार्टियाँ असमंजस में है वहीं दूसरी तरफ गठबंधन को लेकर . “महागठबंधन”  पिछले कई महीनों से काफी चर्चे मैं है और चुनावी रणनीति का बहुत अहम हिस्सा भी.

पश्चिम बंगाल में मंगलवार  को ममता बनर्जी ने यह सपष्ट कर दिया है कि वह अब कांग्रेस से अलग है और अब उनकी जंग केवल भाजपा के अगुवाई  वाले राज्यों से नहीं है,बल्कि कांग्रेस से भी है . वहीं बसपा नेत्री मायावती ने भी मंगलवार को  कांग्रेस से पल्ला झाड़ते हुए यह कहा कि वह किसी भी राज्य में कांग्रेस के साथ समझौता नहीं करेंगी. तो! “क्या महागठबंधन का नारा समाप्त होने की कगार पर है ?”

शायद हाँ! तभी तो किसी गठबंधन में सीट बटवारा नहीं हुआ तो कहीं कांग्रेस को महागठबंधन का हिस्सा नहीं माना जा रहा.

जाहिर है कि सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और तीसरे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में संभावित सहयोगियों के रुख ने न सिर्फ महागठबंधन को खारिज कर दिया है बल्कि कांग्रेस के लिए दूसरे राज्यों में भी चुनौतियां बढ़ा दी हैं। खासकर बिहार में इसका असर दिख सकता है। भाजपा के खिलाफ विपक्ष का बड़ा धड़ा बनाने की कांग्रेस की मुहिम और ‘फ्रंट फुट’ पर खेलने की रणनीति संकट में पड़ती दिख रही है।

बहरहाल कुछ दिनों पहले कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 10 सीटों पर अपने उम्मीदवारों का एलान कर दिया था। खासकर सपा की अंदरूनी चाहत को देखते हुए यह सीधा संदेश था कि बसपा-सपा गठबंधन इन सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी माने या फिर इसके लिए तैयार रहे कि कांग्रेस ‘फ्रंट फुट’ पर खेलेगी। इसका नुकसान न सिर्फ भाजपा को उठाना होगा बल्कि गठबंधन को भी। मंगलवार को खुद बसपा नेत्री मायावती ने स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस के साथ किसी भी राज्य में कोई समझौता नहीं होगा।

दरअसल  बसपा-सपा गठबंधन मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में भी दावा ठोक रहा है। मायावती का यह रुख चुनाव से पहले बहुत कुछ कहता है और चुनाव के बाद की स्थिती में बधाए उत्प्पन भी करता है।दूसरी ओर, पिछले एक साल से लगातार विपक्षी दलों की बैठक में शामिल हो रहीं और अपने मंच पर कांग्रेस समेत दूसरे दलों को आने के लिए बाध्य कर रहीं ममता बनर्जी ने बंगाल की सभी 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं।

वहां कांग्रेस और वामदलों के बीच सामंजस्य तैयार हो रहा है। हालांकि यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या केरल में मुख्य प्रतिद्वंद्वी वामदल और कांग्रेस एक दूसरे से हाथ मिलाएंगे? यह तय हो गया है कि पश्चिम बंगाल में भी त्रिकोणीय लड़ाई होगी और उत्तर प्रदेश में भी। यह भी याद रहे कि एक महीने पहले संसद सत्र के दौरान जब कांग्रेस सांसदों ने सारधा चिटफंड का मामला उठाया था तो ममता ने खुद संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी से कहा था, ‘मैं याद रखूंगी.

वहीं अन्य दलों के भी मिजाज़ कुछ बदले बाले से है :

लालू प्रसाद यादव चुनाव को लेकर हुए सख्त

बिहार में चुनाव के तारीख की घोषणा भले ही हो चुकी है लेकिन  राजद और कांग्रेस के बीच अभीतक सीटों का बटवारा नहीं हुआ है. बताया जा रहा है कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने सहयोगी दलों को साफ संकेत दे दिए हैं कि वे अपनी राजनीतिक हैसियत से ज्यादा न मांगे, पहले पहलवान (मजबूत उम्मीदवार) दिखाएं फिर सीटों की बात करें। यह बयान कांग्रेस के लिहाज से इसलिए अहम है क्योंकि पार्टी ने वहां 15 सीटों से मांग शुरू की थी और अब संभवत: 12 पर आकर टिकी है। जबकि राजद कांग्रेस को 8-9 सीटें देना चाहता है।

बदले बदले से है चन्द्र बाबू नायडू के तेवर

तेलंगाना के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़े  आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के तेवर अब बदले बदले से हैं . वो राज्य की जनता को यह बताते फिर रहे हैं कि केंद्र में कांग्रेस के साथ अलग रणनीति है लेकिन राज्य में उससे कोई मतलब नहीं.

कांग्रेस को मिला दोहरा झटका महाराष्ट्र में

महाराष्ट्र के प्रमुख दलित नेता और डॉ. भीमराव आंबेडकर के पौत्र प्रकाश आंबेडकर ने कांग्रेस से पल्ला झाड़ लिया है। उनकी पार्टी वंचित बहुजन आघाड़ी ने राज्य की सभी 48 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने की घोषणा कर दी है। दूसरी ओर,महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल के बेटे डॉ. सुजय विखे पाटिल मंगलवार को भाजपा में शामिल हो गए।

बहरहाल अब यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि विपक्षी दलों का एक साझा घोषणापत्र तैयार करने की जो कवायद शुरू हुई थी अब उसका क्या होगा। ध्यान रहे कि अब तक विपक्षी दलों के जमावड़े में 21 दलों को गिना जाता था और इसमें बसपा, सपा, तृणमूल कांग्रेस, टीडीपी और आप भी शामिल हुआ करती थीं।

जहाँ कलतक कांग्रेस अन्य दलों को समर्थन दिया करती थी, शायद उसको अब अपने अस्तित्व को बचने की जरूरत आ गई है. पहले चुनाव चपका के विरूद्ध हुआ करता था . लेकिन अब आलम कुछ ऐसा है कि दोस्तों से भी दुश्मनी हो गई है जिसकी वजह से चुनाव के परिणाम पर असर देखने को मिलेगा . वैसे भी ये राजनीति है पल पल बदलना तो इसके फितरत में है .