समझिए पूंजीवाद और साम्यवाद का अतंर जिसने लील ली करोडों जानें

दुनिया में आए दिन कई विचार पनपते हैं, कुछ अच्छे कुछ बुरे, लेकिन इस दुनिया में दो ऐसी विचारधाराएँ मौजूद हैं जिन्होंने लाखों क्या करोड़ों जाने ली हैं. 20वी सदी इन दोनों व्यवस्थाओं से काफी ज़्यादा प्रभावित रही है.
पूंजीवादी या capitalism एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें देश के साधनों पर निजी कंपनियां या फिर आम लोग का दावा होता है. यानी कि अगर आपके देश में तेल, कोयला, लोहा या ऐसे साधन मौजूद हैं तो उसे इस्तेमाल में लाना, उत्पादन करना या बेचना इन सबका हक़ आम लोगों के पास होता है.

लेकिन ऐसा साम्यवादी व्यवस्था में नही होता. साम्यवादी व्यवस्था में इन संसाधों पर आपका या हमारा नहीं बल्कि सरकार का हक़ होता है, उसे इस्तेमाल में लाना या ना लाना ये हम या आप नहीं बल्कि सरकार तय करती है.
मान लीजिए आपके दिमाग में एक नई और high-tech किस्म की कार बनाने का इरादा है. अगर आप एक कैपिटलिस्ट इकॉनमी का हिस्सा हैं तो न सिर्फ आप ये कार बना सकते हैं बल्कि उसे बेच भी सकते हैं. और बनाने में जो भी साधन की आपको जरूरत महसूस हो उन्हें आप उपलब्ध्ता अनुसार इस्तेमाल भी कर सकते हैं. लेकिन यही काम आप साम्यवादी देश में नहीं कर सकते. क्योंकि ऐसी व्यवस्था में सारी कंपनियां सारी फैक्ट्रियां सरकार के अंडर होती हैं, तो ये कार जो आप सोच रहे हैं, उसे बनाने का और बेचने का हक़ सिर्फ सरकार को है, आपको नहीं. आप सिर्फ इतना कर सकते हैं कि अपने विचार को कॉपी में लिख लें ताकि भूल ना जाएं.

आप बताइए आपको जिन चीजों की जरूरतें होती है उन्हें आप कैसे पूरा करते हैं? बाज़ार से उन चीज़ों को खरीद कर, अगर आप एक पूंजीवादी देश में रहते हैं तो आपकी जरूरतों की चीजें बनाने वाले लोग आप में से ही एक होंगे. Amazon को ही देख लीजिए, वहाँ करोड़ों प्रोडक्ट्स बेचे जाते हैं जिनके रिटेलर होते हैं आम लोग, हम और आपमें से ही एक, जबकि साम्यवादी इकॉनमी में हमे किन चीजों की जरूरत है और हमे या उपलब्ध होगा ये बात सरकार तै करती है. अब आपकी जरूरतों को बेहतर कौन समझ सकता है ये आपकी सोच पर निर्भर करता है आप बताएं आपकी जरूरतें कौन बेहतर समझ सकता है? आपके जैसी ही लोग या फिर सरकार.
एक और ख़ास बात है इन दोनों व्यवस्थाओं की, एक कैपिटलिस्ट economy में market कॉम्पिटिशन नाम की चीज़ होती है. यानी कि सारे निजी उद्योग एक दूसरे से अलग और बेहतर प्रोडक्ट डिलीवर करने की कोशिश में रहते हैं. इनकी success या downfall consumers यानी आम लोगों के हाथ में होती है. इस लिए बेहतरी और innovation की होड़ मची ही रहती है. लेकिन ऐसा socialist economy में नहीं होता. यहां पर सरकार decide करेगी कि market में क्या उपलब्ध होना चाहिए और नहीं. उसमें तब्दीलियां लाने की गुंजाईश भी कम ही होती है. इसकी वजह से advancement और ग्रोथ थम से जाते हैं.

अब आप जोमाटो, swiggy और उबेर ईट्स को ही देख लें. तगड़े competition की वजह से ये कंपनियां अपने उपभोगताओं को नए नए ऑफर्स, schemes और discounts देते ही रहते हैं. लेकिन सोचिए अगर इनमे से सिर्फ एक ही होता जो पूरे मार्किट को डोमिनेट करती जिसे सरकार चला रही होती तो शायद वो आपका भरोसा जीतने और आपके पसंदीदा बने रहने की इतनी कोशिश कभी ना करते जितनी वो अभी करते हैं. इसीलिए ना तो आपके प्रोडक्ट में variety रहती है और ना ही quality improvement.

लेकिन इन सबसे बड़ा अंतर है जो कि साम्यवाद और पूंजीवाद के बीच है वो है आर्थिक डिवीज़न का.
पूंजीवाद फ्री मारकेट इकॉनमी है जिसमे कोई भी अपनी काबिलियत के दम पर आगे बढ़ सकता है. जिसमे ये काबिलियत होती है वो न सिर्फ पैसे बनाते हैं बल्कि दूसरों को रोजगार भी देते हैं. लेकिन हर कोई एक जैसा नहीं होता, सबकी क्षमताएं अलग अलग होती है, ऐसे में समाझ में क्लास डिवीज़न की स्तिथि पैदा हो जाती है. समाझ में तीन तबके पनपते हैं, जैसे अपर क्लास मिडिल क्लास और लोवर क्लास. धीरे धीरे ये अंतर बढ़ता जाता है यानी गरीब और गरीब होता जाता है और अमीर और भी अमीर. एक समय में जो गरीब तबका है उसे अपनी मेहनत के हिसाब से पैसे भी नहीं मिलते. यही कह कर साम्यवाद पनपा, लेकिन इस व्यवस्था ने समाझ में समानता लाने की जगह लोगों को ऊपर उठने से रोकना शुरू कर दिया. जिस लड़ाई की शुरुआत व्यवस्था को कुछ चंद लोगों के हाथ से निकाल कर, सबमे समानता लाने के मकसद से लाया गया था. आज ये व्यवस्था उसी दलदल में फस कर रह गई है.