जाटलैंड हरियाणा में इस तरह 2 सीटों से बुलंदी पर पहुंची भाजपा

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साल 2014, हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 90 में से 47 सीटें जीत कर पूर्ण बहुमत हासिल किया. उसकी इस सफलता ने सबको चौंका दिया, चौकना स्वाभाविक भी था क्योंकि 5 साल पहले तक पार्टी के पास सिर्फ 4 सीटें थी और वो राज्य में अपना वजूद तलाश रही थी. सिर्फ 4 सीटों वाली पार्टी बिना मुख्यमंत्री का चेहरा लिए चुनावी मैदान में उतरे और पूर्ण बहुमत पा जाए किसी को भी आश्चर्य होगा. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि ये सफलता रातों रात मिली हो. इसके लिए भाजपा ने 34 सालों का लम्बा इंतज़ार किया था.

1 नवम्बर 1966 को हरियाणा एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया. उस वक़्त भाजपा नाम की कोई पार्टी नहीं थी लेकिन भारतीय जनसंघ नाम की एक पार्टी हुआ करती थी. उन दिनों हरियाणा कि राजनीति में देवी लाल, बंसी लाल और भजन लाल का दबदबा हुआ करता था. करीब चार दशक तक हरियाणा की राजनीति इन्ही तीनों लाल के इर्द गिर्द सिमटी रही. देवीलाल ने पहले लोकदल और फिर इंडियन लोकदल की स्थापना की, बंसीलाल ने हरियाणा विकास पार्टी और भजनलाल ने हरियाणा जनहित कांग्रेस की स्थापना की. ये तीनों लाल बारी बारी से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होते रहे और हरियाणा की पहचान इन्ही तीनों लाल के नाम से होती रही.

फिर 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई. अपने जन्म के 10 साल तक भाजपा हरियाणा में दूसरी पार्टियों के बैशाखी के सहारे खुद को खड़ा करने की कोशिश करती रही. 1982 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने चौधरी देवीलाल की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल के साथ मिलकर 24 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6 सीटें जीतने में कामयाब रही. 2 साल पहले जन्मी पार्टी के लिए ये एक बहुत बड़ी सफलता थी. उसके बाद 1987 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 20 सीटों पर चुनाव लड़कर 16 सीटें हासिल की तो जैसे तहलका मच गया. अब तक भाजपा ने इंडियन नेशनल लोकदल के सहारे अपना आधार बनाया था लिहाजा अब पार्टी को ऐसा महसूस होने लगा कि उसे अब ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए.

1990-91 का वक़्त हरियाणा की राजनीति में अस्थिरता का वक़्त था. महज एक साल में ही राज्य ने 5 मुख्यमंत्री देख लिए थे. भाजपा को लगा कि उसे इस अस्थिर राजनितिक माहौल का फायदा उठाना चाहिए. लिहाजा उसने अपने बूते 1991 के चुनाव में उतरने का फैसला किया लेकिन इस चुनाव ने पार्टी की महत्वकांक्षाओं और हौसलों को जमीन पर ला पटका. भाजपा 89 सीटों पर चुनाव लड़कर मात्र 2 सीटें हासिल कर पाई. 1991 के चुनाव ने इस बात पर भी मुहर लगा दी कि तीन क्षेत्रीय दलों और एक राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के बीच अपनी जगह बनाना भाजपा के लिए दूर की कौड़ी है. लिहाजा 1996 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने चौधरी बंसीलाल की पार्टी हरियाणा विकास पार्टी का हाथ पकड़ा और 25 सीटों पर चुनाव लड़कर 11 सीटें हासिल करने में कामयाब रही.

भाजपा हरियाणा में अपना अस्तित्व तलाश रही थी और इस चक्कर में वो तीनों क्षेत्रीय दलों के हाथों में झूलती रही. साल 2000 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी का दामन छोड़ कर एक बार फिर देवीलाल की इन्डियन नेशनल लोकदल का दामन थामा. इस बार भाजपा 29 सीटों में से सिर्फ 6 सीटें जीत पाई. 2005 तक भाजपा के गठन के 25 साल हो चुके थे. पार्टी ने 2005 के विधानसभा चुनाव में फिर से अकेले उतरने का फैसला किया लेकिन एक बार फिर 2 सीटों पर सिमट गई.

भाजपा के पास हरियाणा में कोई ऐसा चमत्कारी नेता नहीं था जो उसे बुलंदियों पर पहुंचा सके. हरियाणा की सियासत में अब तक देवीलाल, बंसीलाल और भजन लाल के बाद उनकी अगली पीढ़ी दस्तक दे चुकी थी और 2004 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस भी राज्य में वापसी कर चुकी थी लेकिन भाजपा अब तक राज्य में नेतृत्व की समस्या से जूझ रही थी. साल 2009 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा अकेले दम पर मैदान में उतरी लेकिन 4 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई. उस दौरान भाजपा न सिर्फ राज्य में बल्कि केंद्र में भी मजबूत नेतृत्व की समस्या से जूझ रही थी.

फिर आया 2014 का दौर. 2014 में न सिर्फ देश का इतिहास बदला बल्कि हरियाणा का भी इतिहास बदल गया. केंद्र में भाजपा मोदी लहर पर सवार हो कर अकेले दम पर सत्ता में आई और राज्य में भी दुसरे की बैसाखियों को अलविदा कह कर अकेले दम पर सत्ता में आई. पार्टी ने 90 में से 47 सीटें हासिल की. सबसे ख़ास बात ये रही कि पार्टी के पास राज्य में तब भी कोई चेहरा नहीं था लेकिन केंद्र में उसके पास नरेंद्र मोदी का चेहरा था और उसी चमत्कारी चेहरे के बूते भाजपा बिना मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किये भी पूर्ण बहुमत पाने में सफल रही.

जाट बहुल हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर मुख्यमंत्री बने जो गैर जाट बिरादरी के थे और उन्होंने 5 साला तक सफलतापूर्वक सरकार चलाई. एक बार फिर हरियाणा में चुनावी बिगुल बज चूका है. 6 महीने पहले ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा दूसरी बार केंद्र की सत्ता में आ चुकी है और अब पार्टी के पास राज्य में एक स्थापित चेहरा भी है जिसके बूते उसने 90 में से 75 सीटें हासिल करने का लक्ष्य रखा है.