अफ्रीका का वो तानाशाह जिसने दरिंदगी की सारी हदें पार कर दीं थी

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देश युगांडा, साल 1972, एक फरमान जारी किया गया कि एशियाई मूल के लोग 80  दिनों के अन्दर इस देश से निकल जाएँ, नहीं तो अंजाम बेहद बुरा होगा. पहले तो लोगों को लगा कि सनकपन में ये ऐलान कर दिया गया है. लेकिन थोड़े दिनों में उन्हें पता चल गया कि उन्हें वहां जीने नहीं दिया जाएगा … ये ऐलान किया था इदी अमीन ने … इदी अमीन, जिसे लोग सनकी कहते थे.. जो यूगांडा का तानाशाह हुआ करता था. ऐसा कहते हैं कि अमीन ने कहा था कि ये सलाह अल्लाह ने उसे सपने में आ कर दी थी, लेकिन असल में इसकी प्रेरणा उन्हें लीबिया के तानाशाह कर्नल ग़द्दाफ़ी से मिली थी.

अमीन अपने फ़ैसले पर अड़े रहे. भारत सरकार ने मौके का जाएज़ा लेने के लिए भारतीय विदेश सेवा के एक अधिकारी निरंजन देसाई को कंपाला भेजा था, वहां का मंजर बेहद ही दर्दनाक था, लोग किसी तरह जैसे तैसे वहां से निकल रहे थे, कोई भी अपनी पूरी संपत्ति साथ नहीं ले जा सकता था, लोगों को सिर्फ 55 पाउंड और 250 किलो समान ले जाने की ही इजाज़त थी, 80000 से भी ज़्यादा भारतीयों को वहां से भागना पड़ा, उनमे से कितने थे जिन्होंने कभी यूगांडा के बाहर कदम भी नहीं रखा था, वो वहां ब्रिटिश शासन के दौरान बसे थे.

ये वो इदी अमीन था जिसके कारनामों को दुनिया भुला नहीं सके गी, वो इदी अमीन जिसे यूगांडा का कसाई कहा करते थे, दुनिया के लिए वो सिर्फ एक ग़रीब देश का तानाशाह था…. जो आये दिन अपनी अजीबों गरीब हरकतों की वजह से खबरों में बना रहता था लेकिन हकीकत में उसने अपने देश में जुल्म की सारी हदें पार कर दी थी, उसके सनकपन के चलते हजारों बेगुनाह लोगो के गले काट दिए गए, उसके रहते किसी में सर उठा कर चलने की हिम्मत तक नहीं हुआ करती थी, जब तक अमीन की हुकूमत ख़त्म हुई…. युगांडा में 5 लाख से भी ज़्यादा लोगों का कत्ल हो चुका था….. दूसरे शब्दों में कहें तो युगांडा में होने वाले 60 मौतों में से 1 ईदी अमीन की देन हुआ करती थी….

युगांडा अफ्रीका का एक छोटा सा देश है, तंज़ानिया केन्या और मेसोडान के बीच बसा ये देश 1962 में अंग्रेजों से आज़ाद हुआ था, ईदी अमीन का कबीला हमेशा से ही दरिंदगी और दुश्मनों को कैदी बनाने के लिए जाना जाता था, इदी अभी छोटा ही था कि उसके पिता की मौत हो गयी, उसकी माँ को फौज में भर्ती होने पड़ा था,

1964 में यदि किंग्स ऑफ अफ़्रीकन राइफल्स में शामिल हो गए, सर्विस रिकॉर्ड से मालूम होता है कि हमेशा से ही फौजी कमान उसे काफ़ी पसंद किया करते थे, फौजी ऑफ़र्स उसपर बेहद विश्वास किया करते थे, उसने कमांडिंग ऑफिसर बनने के लिए काफी मेहनत की थी लेकिन ना काम रहा, ट्रेनिंग के लिए उसे इंग्लैंड और इजराइल भेजा गया लेकिन वहां भी वो नाकाम रहा…. लेकिन वहां मिली ट्रैनिंग के बदौलत जब वो वापस आया तो उसे 1965 में डिप्टी मिलिट्री कमांडर बना दिया गया,

कहते हैं कि यूगांडा वापस आने से पहले केन्या में माओ बगावत का मुकाबला करने के लिए इदी को तैनात किया गया था, उस वक्त उसने जॉन कबेल्का को गिरफ्तार कर लिया था और वहां मौजूद उनके समर्थकों को अमीन ने एक साथ इकट्ठा कर धमकी दी कि वो उन्हें तेज़ आरी से नामर्द बना देगा, इसके बाद ईदी ने कई कत्ल किये, उसको 1962 में तुरकन कबीले के लोगों के कत्ल में ज़िमेदार बताया जाता है, ये उसकी हौवा’नीयत की शुरुवात थी, उसके सपने भी उसकी क्रूरता की ही तरह बढ़ते गए, उसने आर्मी को मिलने वाले फंड्स में भ्रष्टाचार शुरू कर दिया, तहकीकात के बाद भी अमीन गिरफ्तारी से बच गया, उस वक्त अमीन युगांडा के president मिल्टन ओबोटे का राइट हैंड हुआ करता था, जब ओबोटे के खिलाफ यूगांडा के कबाइली विरोध पर उतर आए थे तब ओबोटे ने अमीन की मदद ली और अमीन से डर कर कबाइलियों का मुखिया किंग फ्रेडी देश छोड़ कर भाग गया, अगले कुछ सालों तक अमीन ओबोते का करीबी बना रहा….. लेकिन ताना’शाही की चाह उसके मन में पनपती रही और फिर 1971 में जब ओबोते एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए देश से बाहर गए… तो अमीन ने अपनी फौज के बल पर सत्ता हड़प ली, उसका डर वहां के लोगों में इस कदर बैठा हुआ था कि किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि उसका विरोध कर सके, कुछ ही दिनों में अमीन की खिलाफत होने लगी, अमीन को पसंद करने वाले आर्मी अफसर भी उसके गुस्से से बच नहीं पाए और उसी के हाथों मारे गए.

अमीन के रहते यूगांडा के इतिहास में सिर्फ खून खराबा ही दर्ज है, अमीन ने सत्ता तो पा ली लेकिन जनता का समर्थन कभी नहीं पा सका, अमीन के मंत्री हेनरी केयेंबा अपनी किताब ‘अ स्टेट ऑफ़ ब्लड: द इनसाइड स्टोरी ऑफ़ ईदी अमीन’ में लिखते हैं कि ”अमीन ने अपने दुश्मनों का सिर्फ कत्ल नहीं किया बल्कि उनके मरने के बाद भी वी उनके लाशों के साथ बर्बरता करता रहा. युगांडा के मेडिकल society के लिए ये आम बात बन गयी थी कि उनको मिलने वाली लाशों के गुर्दे, लिवर, नाक, होंठ और गुप्तांग गायब ही रहते थे. वो उन मारे हुए लोगों की लाशों से बातें किया करते थे कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि वो अपने दुश्मन का ख़ून पिया करते थे क्योंकि वो काकवा जनजाति से आते थे और ये उनकी पुरानी रस्म मानी जाती है.

वक्त बदलता है, और आठ सालों तक तानाशाही के दौर के बाद अमीन को उसी ढ़ंग से सत्ता से हटाए गए, जैसे उन्होंने सत्ता पर कब्ज़ा किया था.उनको पहले लीबिया और फिर सऊदी अरब ने अपने यहाँ रखा लेकिन 78 की उम्र में वही उसकी मौत हो गयी.