दूरदर्शन हुआ 60 साल का, हमने क्या खोया और क्या पाया?

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करीब 500 चैनलों को अपनी उँगलियों पर नचाने वाली डिजिटल पीढ़ी को दूरदर्शन का मतलब शायद ही पता होगा. वो तो ये भी नहीं जानते होंगे कि दूरदर्शन होने का मतलब क्या होता है. लेकिन ये दूरदर्शन उनकी यादों में बसा है जिन्होंने बिजली और 2 मंजिला घर इतने ऊँचे खम्बों पर टंगे एंटीना के सहारे चौकोर डब्बे पर बोलती तस्वीरें देखी है. ये सुख तो बस वो ही जानते हैं जिन्होने राम और कृष्ण को अपनी आँखों के सामने जीवंत होते देखा हो. तब भौकाल मारने के लिए न आईफोन था, न वन प्लस वन और न 64 इंच का स्मार्ट टीवी. तब तो जिसके छत पर टीवी का एंटीना लगा हो प्रतिष्ठा उसकी होती थी.

दूरदर्शन के प्रसारण की शुरूआत भारत 15 सितंबर, 1959 को हुई. नियमित दैनिक प्रसारण की शुरुआत 1965 में आल इंडिया रेडियों के एक अंग के रूप में हुई और बाद में तब कि बम्बई और अमृतसर तक विस्तारित की गई. राष्ट्रीय प्रसारण 1982 से शुरू हुई और उसी साल ब्लैक एंड वाइट दूरदर्शन रंगीन हो गया .

हमारे देश में 60 साल कि उम्र को वृद्धावस्था का पड़ाव माना जाता है. ये उम्र रिटायर होने की उम्र है दूरदर्शन भी 60 सालों का हो वृद्ध हो गया लेकिन एक पीढ़ी के लिए ये हमेशा उनकी स्मृतियों में युवा बना रहेगा.

सन् 87 की जनवरी, भारतीय लोकमानस के लिए एक प्रसन्नता भरी खबर लेकर आई. और वो था, हफ्ते में एक बार टीवी पर “रामायण” का प्रसारण. आज अगर कोई सीरियल छूट जाता है तो हम उसे यूट्यूब पर, हॉट स्टार पर देख लेते हैं लेकिन वो दौर ऐसा था जब रामायण का प्रसारण होता तो न केवल सड़कें सुनसान हो जाती थीं बल्कि मोहल्ले में जिसके घर में टीवी होता था वहां चादरें बिछा कर पूरा मोहल्ला रामायण देखने इकठ्ठा हो जाता था. उस दौरान भारत में टीवी की बिक्री में बेतहाशा वृद्धि हुई रामायण की वजह से. लोगों ने उन चेहरों को सजीव होते देखा जिसकी तस्वीरें देख कर पूजा किया करते थे.

उसके बाद जब बी आर चोपड़ा महाभारत ले कर आये तो उसके कृष्ण आज तक हमारी स्मृतियों में इस कदर बसे हैं कि कृष्ण का स्मरण करते ही नितीश भारद्वाज का चेहरा सामने आता है. महाभारत देश का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला शो था. उसके बाद चंद्रकांता, बुनियाद, हमलोग, जंगल बुक, शक्तिमान, शांति इनसब ने दूरदर्शन को बुलंदियों पर पहुंचा दिया. आज भले ही सैकड़ों चैनल और माध्यम हो लेकिन जो ख़ुशी और संतुष्टि हमें दूरदर्शन ने दी थी वो देना किसी के बस की बात नहीं.